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अनुच्छेद 370 की दागबेल का मिटना

06/08/2019

 सियाराम पांडेय 'शांत' 

 म्मू-कश्मीर के भारत में सीमित विलय के पक्षधर लोगों को जोर का झटका लगा है। ऐसा झटका जिससे उनके पैरों के नीचे से तुष्टिकरण की जमीन फिसल गई है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त कर दिया गया है। उसका केवल एक खंड लागू रहेगा जो यह कहता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। जो लोग इस बात का कयास लगा रहे थे कि अनुच्छेद-370 के हटते ही जम्मू-कश्मीर पर भारत का नियंत्रण खत्म हो जाएगा, उन्हें इस बात का अंदाज तो लग ही गया होगा कि लोकसभा और राज्यसभा में इस प्रस्ताव को नरेन्द्र मोदी ने बहुत ही सूझ-बूझ के साथ पेश किया था जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी बची रहे। 6 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह ने विलय संधि पर हस्ताक्षर किए थे। अनुच्छेद 370 की दागबेल तो उसी वक्त पड़ गई थी जब समझौते के तहत केंद्र को सिर्फ विदेश, रक्षा और संचार मामलों में दखल का अधिकार मिला था। 17 अक्टूबर 1949 को अनुच्छेद 370 को पहली बार भारतीय संविधान में जोड़ा गया था। उस समय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसका यह कहते हुए विरोध किया था कि संविधान का अनुच्छेद-370 भारत को कमजोर करेगा। उनकी यह आशंका निर्मूल साबित नहीं हुई। भारत में आतंकवाद के संबर्धन की मूल में इस अनुच्छेद का बड़ा योगदान रहा। जम्मू-कश्मीर अगर देश की राष्ट्रीय धारा से कटा रहा तो इसके लिए जिम्मेदार यह अनुच्छेद ही था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटते ही भाजपा के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जम्मू-कश्मीर को लेकर देखा गया सपना पूरा हो गया है। वे पहले नेता थे जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में 'एक देश-दो विधान नहीं चलेंगे' का नारा लगाया था मुखर्जी  इस निमित्त बलिदान भी हुए थे। भाजपा और संघ के लोग हमेशा यह नारा लगाते रहे कि 'जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है।' अब जाकर कश्मीर सही मायने में भारत का हुआ है। 
1964 में प्रकाशवीर शास्त्री ने संसद में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने संबंधी विधेयक प्रस्ताव पेश किया था जिसे उस समय कम्युनिस्ट पार्टी का भी समर्थन हासिल हुआ था। उस विधेयक के पक्ष में डॉ. राम मनोहर लोहिया और मधुलिमये ने भी अपना मत दिया था लेकिन जब 6 दिसंबर 1968 को अटल बिहारी वाजपेयी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने का संसद में विधेयक प्रस्ताव पेश किया तो कम्युनिस्ट पार्टी ने उसे अनुचित बताया था। अटलजी ने संसद में सवाल उठाया था कि एक ही विधेयक चार साल पहले उचित और चार साल बाद अनुचित कैसे हो सकता है? उन्होंने अनुच्छेद-370 को जम्मू-कश्मीर की जनता के मन में दुविधा पैदा करने वाला बताया था। अटलजी ने कहा था कि संविधान निर्माताओं की मंशा अनुच्छेद-370 को कुछ समय के लिए जोड़ने की थी। यह उपबंध अल्पकालिक था लेकिन इस अस्थायी उपबंध को स्थायी बनाने का प्रयास हो रहा है। अटलजी की चिंता को उस समय किसी ने नहीं समझा। लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने अनुच्छेद-370 हटाने संबंधी चार बड़े और कड़े निर्णय लेकर एक तरह से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि पेश की है। 
 आज जब भारत सरकार ने अनुच्छेद-370 हटा दिया तो पाकिस्तान का भी गुस्सा खुलकर सामने आ गया है। भारत सरकार के इस बड़े कदम से बौखलाए पाकिस्तान ने सभी संभावित विकल्पों के इस्तेमाल की धमकी दी है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत ने कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा छीनकर अवैध कदम उठाया है। भारत में भी कुछ दलों की सोच लगभग पाकिस्तान जैसी है। पिछले कई दिनों से कश्मीर घाटी में विपक्ष की बैठक हो रही थी कि घाटी में सैनिकों की संख्या बढ़ाकर, अमरनाथ यात्रा रोककर आखिर केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में करना क्या चाहती है? उसे लग रहा था कि मोदी सरकार पहले अनुच्छेद-35ए को हटाएगी। लेकिन सरकार ने अनुच्छेद-370 हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अलग विशेष राज्यों का दर्जा देकर विपक्ष को जोर का झटका दिया है। इस निमित्त मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन विधेयक को पेश किया है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर दिया गया है। लद्दाख को बिना विधानसभा केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया है। लद्दाख के लोगों की लंबे समय से मांग भी यही रही है कि उसे केंद्र शासित राज्य का दर्जा दिया जाए। 
   केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मानें तो जम्मू-कश्मीर दिल्ली और पुड्डुचेरी की तरह केंद्र शासित प्रदेश रहेगा। यानी वहां विधानसभा रहेगी। लद्दाख की स्थिति चंडीगढ़ की तरह होगी, जहां विधानसभा नहीं होगी। मतलब अब जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री कोई भी हो, उससे अधिक अधिकार उप राज्यपाल के होंगे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने इसे जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ बड़ा मजाक बताया है। उन्होंने कहा है कि कश्मीर में लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है। पीडीपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इसे लोकतंत्र का काला दिन बता रही हैं। उनका आरोप है कि भारत ने कश्मीर पर अपना वादा नहीं निभाया। गुलाम नबी आजाद अगर 1968 में वाईवी चह्वाण के अटल बिहारी वाजपेयी को दिए गए जवाब का ही स्मरण कर लेते तो उनकी शंका का बहुत हद तक समाधान हो जाता। श्री चह्वाण ने कहा था कि मैंने कभी यह नहीं कहा कि अनुच्छेद-370 जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच सेतु है। यह घाटी में ज्यादा से ज्यादा संवैधानिक धाराएं लागू कराने का सहायक सेतु हैं। संवैधानिक सेतु। जवाहर लाल नेहरू जानते थे कि शेख अब्दुल्ला महाराज हरि सिंह की पसंद नहीं हैं। इसलिए उनकी संतुष्टि के लिए उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल को जम्मू-कश्मीर मामले से दूर रखा और इस मामले को अपने हाथ में रखा। शेख अब्दुल्ला की संतुष्टि के लिए ही संविधान में अनुच्छेद 370 का पुछिल्ला जोड़ा गया। इसकी वजह से संसद में पारित कई कानून जम्मू-कश्मीर में लागू ही नहीं हो पाते थे। लेकिन 70 साल बाद ही सही जम्मू-कश्मीर में अब कोई भी भारतीय जमीन खरीद सकेगा। वहां बस सकेगा। अभी तक पाकिस्तानी नागरिक तो जम्मू-कश्मीर में बस सकता था लेकिन भारतीय नहीं। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर के विकास में विभेदकारी था। अभी तक यहां कोई गैर कश्मीरी मुख्यमंत्री नहीं बना। इसका खामियाजा जम्मू और लद्दाख को विकासगत उपेक्षा के रूप में भुगतना पड़ा। पीडीपी के दो सांसदों ने जिस तरह राज्यसभा में संविधान की प्रति फाड़ने की कोशिश की, उससे इतना तो पता चलता ही है कि भारतीय संविधान को लेकर उनके दिल में कितनी हिकारत का भाव है। 
अनुच्छेद-370 कश्मीर से हटाने का मतलब है कि कश्मीर को इस अनुच्छेद के तहत जो स्वायत्तता मिलती थी, जो अलग अधिकार मिलते थे, वे सब हट गए हैं। एक देश में दो निशान, दो विधान, दो प्रधान की अवधारणा समाप्त हो गई है। अनुच्छेद 370 का खण्ड एक लागू रखकर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और हमेशा रहेगा। पहले भारतीय संसद के कई संवैधानिक फैसले कश्मीर पर लागू नहीं होते थे। लेकिन वे अब पूरे देश की तरह वहां भी लागू होंगे। वित्तीय फैसले भी जो अब तक लागू नहीं होते थे, वे भी लागू होंगे। अब देश का कोई भी नागरिक कश्मीर में उसी तरह रह या बस सकेगा, जिस तरह वह अन्य राज्यों में रह या बस सकता है। यह और बात है कि विपक्ष कश्मीरियों को भड़काने का प्रयास करेगा। पाकिस्तान भी इसे हवा देगा। लेकिन जिस तरीके से वहां सैनिकों की तैनाती हो रही है। इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाई गई है। उससे लगता है कि केंद्र सरकार घाटी के तनाव से जल्द मुक्त हो जाएगी।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।) 


 
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