यथावत

Blog single photo

जम्मू कश्मीर की पंचायतें सबसे मजबूत

06/08/2019

जम्मू कश्मीर की पंचायतें सबसे मजबूत

र्तमान समय में केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर के जनजीवन को खुशहाल व शांतिपूर्ण बनाने के लिए कई तरह के प्रयास कर रही है। इसके लिए बनाई गयी रणनीति के शीर्ष प्राथमिक उपायों में वहां की पंचायत व्यवस्था को मजबूत एवं प्रभावी बनाना भी शामिल है। इसी के अंतर्गत वर्ष 2018 के अंत में एक लम्बे अर्से के बाद पंचायत के चुनाव कराये गए तथा ग्राम पंचायतों का विधिवत गठन किया गया है। इससे पूर्व 2018 में ही राज्य के पंचायतीराज अधिनियम में कुछ बड़े महत्वपूर्ण बदलाव भी किए गए। राज्य में सत्ता का विकेन्द्रीकरण जहां एक ओर नागरिकों को राज्य में स्थानीय स्तर पर लोक जीवन की व्यवस्था के संचालन का अवसर देता है,वहीं दूसरी ओर उन्हें स्वयं के विकास के लिए योजना बनाने से लेकर उसके क्रियान्वयन तक में पूरी तरह से सहभागी बनाता है। इससे कई तरह की समस्याओं का स्वत: निराकरण हो जाता है। भारत में प्राचीन काल से पंचायतों का एक लम्बा इतिहास है जो अलग-अलग कालों में, अलग-अलग रूपों में विद्यमान रहा है। वैदिक काल से लेकर रामायण और महाभारत काल तक गांव की व्यवस्था वहीं के निवासियों द्वारा ही होती रही है। यह व्यवस्था सभा व समिति के माध्यम से होती थी जिसे स्थानीय स्तर पर पंचायत कहा जाता था। फिर सोलह महाजनपदों के काल, मौर्य और गुप्त काल के साथ चोल राजवंश के समय भी यह व्यवस्था बहुत मजबूत थी।

जम्मू कश्मीर की ग्राम पंचायतों के इतिहास में साल 2018 मील के पत्थर की तरह है। अब राज्य की पंचायतों को 21 विभागों अथवा विषयों के कार्य, कर्मी व कोष मिलते हैं जो अपने आप में एक उल्लेखनीय प्रावधान है। यह प्रावधान देश के अन्य राज्यों के लिए उदाहरण है।

भरहटा शासनकाल में पंचायत के फैसलों पर ब्राह्मण ही नहीं, अस्पृश्यों तक के हस्ताक्षर मिलते हैं। ब्रिटिश काल, भारत के गांवों की गुलामी और पंचायत प्रणाली के ह्रास का काल है। वर्ष1857 की प्रथम क्रांति के बाद जब भारत की सत्ता ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ली, तब गुलामी की जड़ों को और मजबूत करने के लिए कानून को माध्यम बनाया। इसी क्रम में गांव की आजादी को भी ब्रिटिश कानून के दायरे में लाने का प्रयास प्रारम्भ हुआ। वर्ष 1919 में गवर्नमेंट आॅफ इंडिया एक्ट के लागू होने के साथ सभी प्रांतीय सरकारों ने अपने पंचायती राज एक्ट बनाना शुरू कर दिया। 1930 से पहले ब्रिटिश भारत के ज्यादातर प्रांतों में पंचायत संबंधी कानून बन गये थे। इसी काल में इसी के समानांतर महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज्य को स्वतन्त्रता आंदोलन का केन्द्रीय विषय बनाया और उसके लिए भारत की पंचायत परंपरा को नए सिरे से संगठित करने का आह्वान किया। महात्मा गांधी के इस आह्वान को ध्यान में रखते हुए कई रियासतों द्वारा पंचायतीराज की पुन: स्थापना का प्रयास किया गया था। इसमें जम्मू कश्मीर के तत्कालीन महाराज हरि सिंह भी शामिल थे।

यहां पंचायतों की है संवैधानिक गरिमा

जम्मू कश्मीर का पंचायतीराज अधिनियम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधियों की संवैधानिक गरिमा की पूरी रक्षा करता है। वह उसे ‘स्व-सरकार’ के एक सम्मानित सदस्य के रूप में उसको मान्यता प्रदान करते हुए उसके विरुद्ध की जाने वाली किसी शिकायत के निस्तारण हेतु बाकायदा ‘जम्मू-कश्मीर लोकपाल पंचायत अधिनियम 2014’ के तहत लोकपाल की नियुक्ति का प्रावधान करता है। जम्मू कश्मीर पंचायतीराज लोकपाल अधिनियम 2014 के अनुसार पंचायत प्रतिनिधियों के विरुद्ध शिकायतों की जांच एवं कार्यवाही हेतु लोकपाल की व्यवस्था की गई है। इससे जहां एक ओर चुने हुए प्रतिनिधियों को दबाव रहित होकर कार्य का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी ओर अधिनियम के अंतर्गत उनके लिए की गई संवैधानिक व्यवस्थाओं का भी सम्मान किया गया है। यह प्रावधान निष्पक्ष एवं उचित दिशा में किया गया अत्यंत उल्लेखनीय प्रयास है। अधिनियम के अध्याय 13 में (धारा 48 से 79 तक) पंचायती अदालत का प्रावधान गांव समाज की बेहतरी के लिए की गई एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसके माध्यम से पंचायत के मूल कार्य ‘न्याय प्रक्रिया’ को स्थानीय स्तर पर स्थापित करके लोगों को सस्ता एवं सर्वसुलभ न्याय उपलब्ध करने की व्यवस्था है। पांच सदस्यीय पंचायती अदालत के सभी सदस्यों का चयन हल्का मजलिस (ग्राम सभा) के सभी सदस्यों अर्थात मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित पैनल की सूची में से किया जाता है। जम्मू कश्मीर में लागू रनबीर पेनल कोड की धारायें पंचायती अदालत के अधीन की गई हैं। इसी के साथ सिविल मामले भी एक सीमा तक पंचायती अदालत के अधिकार क्षेत्र में हैं। अधिनियम की ये विशेषताएं जहां एक ओर नए दौर में ‘गांव समाज’ को फिर से अपने विवेक के प्रयोग का अवसर देती हैं, वहीं दूसरी ओर स्वराज्य और स्वावलंबन की दृष्टि से संभावनाओं के नए द्वार भी खोलती हैं।

हरि सिंह ने 1935 में जम्मू और कश्मीर ग्राम पंचायत रेगुलेशन (एक्ट न.1) पास किया जिसमें स्थानीय स्तर पर विकास में जन सामान्य की भागीदारी को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया था। इसी को आगे बढ़ाते हुए उन्होने 1936 में अलग से पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग बनाया था, जिसका काम राज्य में पंचायत की व्यवस्था को लागू करना था। इस एक्ट में पंचायतों को विकास के साथ-साथ सिविल तथा आपराधिक मुकदमों के न्याय का अधिकार भी दिया गया था। महाराजा हरि सिंह ने इस विभाग को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए वर्ष 1941 में, इसके कार्यों की सूची को विस्तारित किया। किन्तु अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाने के चलते वर्ष 1951 में फिर से इसे एक नये अधिनियम में बदला गया, जिसमें स्थानीय स्तर पर विकास को व्यवस्थित करने का विशेष प्रयास था। यह प्रयास भी नाकाफी सिद्ध हुआ। फिर 1958 में बलवन्त राय मेहता कमेटी की रिपोर्ट से प्रेरित होकर राज्य में हल्का (ग्रामद्ध पंचायत) के अलावा ब्लॉक स्तर पर भी विकास समिति का प्रावधान कर द्विस्तरीय पंचायत व्यवस्था स्थापित की गयी थी।

साथ ही न्याय के लिए पंचायत अदालत का भी प्रावधान किया गया। इस अधिनियम को वर्ष 1989 में पुन: यह कहते हुए संशोधित किया गया कि ‘‘राज्य में पंचायतीराज का विकास किया जाना वांछनीय है, ताकि स्थानीय स्व-सरकार में फैसले लेने की प्रक्रिया व विकास- कार्यक्रमों की अम्लावरी में लोगों की असरदार शहूलियत यकीनी की जा सके।’’ इसके अंतर्गत राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली लागू की गयी। जिसे क्रमश: हल्का पंचायत, खंड विकास परिषद, जिला योजना और विकास बोर्ड कहा जाता है। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह रहा कि अब सरपंचों का चुनाव भी सीधे मतदाताओं द्वारा किया जाना तय हुआ। पंचायत अदालत को और अधिक व्यवस्थित किया गया तथा महिलाओं और कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व देने हेतु अनेक मनोनयन की व्यवस्था की गई। वर्ष 1992 में संसद ने 73वां संविधान संशोधन करके नया पंचायतीराज अधिनियम पारित किया। किन्तु जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान के कारण वह वहां मूल रूप से तो लागू नहीं हुआ लेकिन उसकी मूल मंशा को काफी हद तक अपनाया गया है। इसी क्रम में राज्य ने वर्ष 1996 में पुन: एक संशोधन किया और राज्य में पंचायतीराज को एक नया स्वरूप प्रदान किया। इसमें 73वें संविधान संशोधन के कई मूलभूत प्रावधानों को एक्ट में शामिल कर लिया गया। वर्ष 2004 में पुन: पंचायत अधिनियम को संशोधित करते हुए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं के आरक्षण को शामिल किया गया।

साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग तथा राज्य वित्त आयोग के गठन का भी प्रावधान किया गया। इस प्रकार जम्मू कश्मीर पंचायतीराज अधिनियम धीरे-धीरे अपनी सरकार (सेल्फ गवर्नमेंट) के रूप में संवैधानिक तरीके से विकसित होता गया। जो थोड़ी बहुत कसर रह गई थी उसे 2018 के संशोधन ने लगभग पूरा कर दिया। जम्मू और कश्मीर राज्य ने हल्का पंचायतों में जून, 2011 में तीन दशकों के बाद चुनाव आयोजित किए। इन चुनावों के लिए मतदाताओं की प्रतिक्रिया अभूतपूर्व थी। करीब 75 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाला। लेकिन पंचायतों को सही तरीके से कामकाज का अवसर नहीं मिला। इसके चलते यह व्यवस्था निष्प्रभावी होकर रह गई। वर्ष 2018 में एक बार पुन: जम्मू कश्मीर पंचायती राज अधिनियम 1989 को संशोधित किया गया। इस संशोधन में वार्ड मजलिस (वार्ड सभा) के रूप में बिलकुल जमीनी स्तर पर जन भागीदारी का उल्लेखनीय अवसर उपलब्ध कराया गया है तथा पंचायतीराज व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए अधिनियम में ही अधिकारों का सही अर्थों में विकेंद्रीकरण किया गया है। जम्मू कश्मीर का पंचायतीराज अधिनियम देश के बेहतर अधिनियमों में से एक है। इस अधिनियम में ऐसी कई महत्वपूर्ण व्यवस्थायें की गई हैं जो ग्राम स्वराज्य के लिए बहुत अनुकूल अवसर देती हैं तथा लोगों की ‘अपनी सरकार’ (सेल्फ गवर्नमेंट) को स्थापित करने में पूरी तरह से सहयोगी है।

‘अपनी सरकार’ की अपनी योजना

संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायत को भारतीय राज्य व्यवस्था में तीसरी सरकार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि राष्ट्रीय स्तर पर जो राजस्व (रेवन्यू) इकट्ठा होता है, उसका एक हिस्सा इस तीसरी सरकार को भी अब मिलने लगा है। भारत के 14वें वित्त आयोग ने ग्राम पंचायतों को पांच वर्ष (2015 से 2020 तक) के लिए लगभग दो लाख करोड़ रुपये का हिस्सा तय किया। यदि इसे ग्रामीण आबादी के हिसाब से देखें तो प्रति व्यक्ति लगभग 2300 रुपये पड़ता है। इस प्रकार यदि किसी ग्राम पंचायत क्षेत्र की आबादी तीन हजार है तो उसे पांच वर्षों के लिए 70 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया। यह 70 लाख रुपये भारत सरकार या राज्य सरकार की किसी स्कीम का पैसा नहीं है। यह वित्त आयोग द्वारा तय की गई वह धनराशि है, जिसके आधार पर ‘अपनी गांव सरकार’ को स्वयं अपने गांव के विकास के लिए योजना बनानी है। किस विषय पर योजना बनेगी और कैसे बनेगी, यह सब गांव के नागरिकों को स्वयं तय करना है तथा अपनी ग्राम सभा के माध्यम से स्वयं उसे स्वीकृत भी करना है। अर्थात उसे अपने गांव के विकास के बारे में विचार करने का, निर्णय लेने का तथा स्वयं करने का पूरा अधिकार इस बजट के माध्यम से उसी तरह से दिया गया, जिस तरह भारत सरकार को भारत के बारे में तथा जम्मू कश्मीर की राज्य सरकार को राज्य के बारे में दिया गया है। इसी नाते इस बजट के आधार पर बनने वाली इस पंचवर्षीय योजना को ‘ग्राम पंचायत विकास योजना’ के नाम से संबोधित किया जा रहा है।

गाँव के विकास में वहाँ के समान्यजन को सहभागी बनाने के लिए देश की पंचायत प्रणाली में ‘ग्राम सभा’ का प्रावधान शुरुआती दौर से होता आया है। 73वें संविधान संशोधन में इसी के लिए ‘ग्राम सभा’को संवैधानिक मान्यता दी गयी है। ग्राम सभा गांव के सभी मतदाताओं को मिलाकर बनने वाली संस्था है। किसी व्यवस्था को लागू करने के लिए या चलाने के लिए पहले सोचना पड़ता है फिर निर्णय लेना पड़ता है और फिर उसी के आधार पर करना पड़ता है। इस अर्थ में गांव के वे सभी वयस्क नागरिक जो मतदाता हैं,गांव के बारे में विचार और निर्णय का अधिकार रखते हैं। वास्तव में यही ‘असली आजादी’ और ‘स्व-सरकार’ होना है। जम्मू कश्मीर के पंचायतीराज अधिनियम ने तो इसे और भी अधिक प्रभावी व लोकग्राही बनाया है। उसमें ग्राम सभा (हल्का मजलिस) के साथ वार्ड सभा (वार्ड मजलिस) का भी प्रावधान किया गया है। यह एक क्रांतिकारी कदम है। जम्म-कश्मीर में एक ग्राम पंचायत क्षेत्र की आबादी की सीमा अधिकतम तीन हजार है। पर्वतीय क्षेत्रों में प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र को 9 से 11 वार्डों में बांटा गया है और प्रत्येक वार्ड से सदस्य चुना जाता है। इस प्रकार लगभग 300 से 400 की आबादी पर एक वार्ड बंटा है और इसमें 200 से 300 मतदाताओं को मिलाकर एक ‘वार्ड सभा’ बन जाती है। अधिनियम में जमीनी स्तर पर निर्णय का अधिकार इसी वार्ड सभा को दिया गया है और इस वार्ड का चुना हुआ सदस्य अर्थात ‘पंच’ वार्ड सभा का अध्यक्ष होता है।

अधिनियम में विधिवत ‘वार्डसभा’ (वार्ड मजलिस) का जो स्वरूप तथा जिम्मेवारी तय हुई है, वह वार्ड सदस्यों को पंचायत सरकार का मुख्य आधार मानती है। वार्ड सभा की साल में चार बैठकों का नियमित प्रावधान व उसके कोरम को तय करना तथा लाभार्थी चयन से लेकर समस्याओं की पहचान के साथ योजना प्रारूप को तय करने की जो जिम्मेवारी उसे सौंपी गई है,वह उसकी महत्ता को ही प्रदर्शित करती है। इस वार्ड सभा का नेतृत्व ‘वार्ड सदस्य’ (पंच) को सौंपा गया है। ‘वार्ड सभा’ को अपने क्षेत्र के विकास के लिए मुद्दों की पहचान, प्राथमिकता के आधार पर उसका निर्धारण तथा प्रस्ताव तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य के अतिरिक्त जो भी विकास कार्य हुए हैं, उनका सोशल आॅडिट करना भी उसका दायित्व है। वार्ड सभा के अध्यक्ष के रूप में ‘पंचों’ को जो जिम्मेवारी अधिनियम ने सौंपी है, उसे यदि सही समझ और सही तरीके से निभाया जाय तो गांव समाज की सामर्थ्य और उसका आत्मविश्वास फिर से खड़ा किया जा सकता है जो राज्य और राष्ट्र दोनों के लिए नई सुबह का आगाज होगा। इसी प्रकार ग्राम सभा को अपने क्षेत्र की वार्ड सभाओं की संस्तुतियों, प्रस्तावों व प्राथमिकताओं को पूरे ग्राम पंचायत क्षेत्र के स्तर पर संकलित करके उसको अनुमोदित एवं स्वीकृत करने का अधिकार है।

खास है पंचायतों की योजना निर्माण प्रक्रिया

अपने विशेष भौगोलिक पर्वतीय क्षेत्र के कारण जम्मू कश्मीर राज्य के प्रत्येक गांव की जब अपनी अलग-अलग परिस्थितियां और आवश्यकताएं हों, तब ‘ग्राम पंचायत विकास योजना’ की उपादेयता सर्वाधिक हो जाती है। ‘हल्का (ग्राम) पंचायत विकास योजना के लिए जो गाइड लाइन राज्य सरकार द्वारा जारी की गई है,उसमें इस योजना को बनाने की प्रक्रिया को तीन चरणों में बांटा गया है। इसका पहला चरण योजना बनाने से पहले का है। इसमें मुख्य काम गांव के लोगों को योजना बनाने की प्रक्रिया की पूरी जानकारी देना और उसके लिए गांव में एक ऐसा माहौल तैयार करना है, जिसमें सभी लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें। यह महत्वपूर्ण जिम्मेवारी वार्ड सभा के ऊपर डाली गई है। इसी पहले चरण में गांव की जो वास्तविक स्थिति है तथा गांव में योजना के निर्माण हेतु जो संसाधन उपलब्ध हैं, उनको ठीक से जांचना परखना तथा उसकी सूची बनाने का भी कार्य करना है। यह कार्य भी गांव की वार्ड सभाओं के ही द्वारा होना है। योजना निर्माण के दूसरे चरण में समस्याओं एवं आवश्यकताओं की पहचान तथा इनकी प्राथमिकता (कौन कितना जरूरी है) उसका क्रम तय करना मुख्य कार्य है। इस कार्य की शुरुआत वार्ड सभा में ही होती है जो बाद में ग्राम सभा में जाकर पूरे गांव के स्तर पर फाइनल रूप लेती है। योजना निर्माण के तीसरे चरण में ग्राम सभा (हल्का मजलिस) द्वारा योजना की स्वीकृति प्रदान की जाती है। इस महत्वपूर्ण कार्य में ग्राम सभा के मंच पर उसके सदस्यों (मतदाताओं) की बड़े पैमाने पर सक्रिय भागीदारी तय होती है जो जमीनी लोकतन्त्र का सबसे बेहतर उदाहरण है। निर्णय लेने का यह अधिकार जब इस योजना के माध्यम से गांव के वयस्क नागरिकों को प्राप्त होता है,तब उनमें व्यवस्था के प्रति विश्वास तो बढ़ता ही है, साथ ही स्थानीय जरूरत के मुताबिक एक बहुत ही उपयुक्त योजना का निर्माण होता है। इसी नाते जम्मू-कश्मीर की पंचायत व्यवस्था सही अर्थों में लोगों की अपनी सरकार है।

उसे ग्राम पंचायत के समस्त कार्यों का सोशल आडिट करने के साथ-साथ सरपंच और पंचायत सदस्यों से किसी भी गतिविधि, योजना और आय व व्यय से संबन्धित स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार भी दिया गया है। इसी के साथ अधिनियम जहां एक ओर पानी और वन के उपज के प्रबंधन का दायित्व उसे सौंपता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक क्षेत्र के सभी संस्थानों और पदाधिकारियों पर नियंत्रण का अधिकार भी देता है। यह एक तरह से इस ‘अपनी गांव सरकार’ की विधायिका की भूमिका में है। ग्राम स्तर पर पंचायत व्यवस्था की दूसरी महत्वपूर्ण संस्था हल्का पंचायत (ग्राम पंचायत) को यह अधिनियम सही अर्थों में ‘अपनी गांव सरकार’ की कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। वह उसे अधिनियम में निर्धारित उसके स्तर के विषयों और विभागों के कार्य तो सौंपता ही है, साथ ही उसके संबन्धित कर्मचारी और कोष भी उसे सौंपता है। इस अधिकार को किसी अन्य कानून या शासनादेश के लिए न छोड़कर अधिनियम के अंतर्गत ही शेड्यूल-1 के माध्यम से व्याख्यायित किया गया है। यह अधिनियम जम्मू कश्मीर की ग्राम पंचायतों को विस्तार के साथ 21 विभागों अथवा विषयों के कार्य, कर्मी व कोष सौंपता है जो अपने आप में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उल्लेखनीय प्रावधान है। यह प्रावधान देश के अन्य राज्यों के लिए उदाहरण है तथा आने वाले समय के पंचायतीराज व्यवस्था का ‘अपनी सरकार’ के रूप में विकसित होने के रास्ते में मील का पत्थर साबित होगा।


 
Top