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ननकाना साहिब ने बताई सीएए की जरूरत

24/01/2020

ननकाना साहिब ने बताई सीएए की जरूरत

आशुतोष कुमार पाण्डेय

गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर हमला नफरत, द्वेष एवं पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति का जीता जागता नमूना है। ऐसे हमलों के शिकार लोगों को भारत में पनाह देने के लिये ही नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लाया गया है, लेकिन कतिपय राजनीतिक दलों ने इसे विवादित बना दिया है। ननकाना साहिब पर हमले की घटना से एक बार फिर दुनिया के सामने वहां के अल्पसंख्यकों की हिफाजत के खोखले दावे का सच सामने आया है। किस तरह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को उपेक्षित, अपमानित और आतंकित जीवन जीने को विवश होना पड़ रहा है। प्रश्न है कि आखिर इन मुस्लिम राष्ट्रों के ये अल्पसंख्यक कब तक अन्धकारमय, प्रताडित एवं त्रासद जीवन जीने को विवश होते रहेंगे। उनके सामने दो ही रास्ते हैं या तो वे जबरन धर्मांतरण का शिकार हों या फिर अपमानित जीवन जीने को विवश। उन्हें त्रासदी भरे जीवन से तभी छुटकारा मिल सकता है, जब वे या तो अपना धर्म छोड़ दें या फिर देश। वास्तव में इसी कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। ऐसे प्रताडित, उपेक्षित एवं त्रासदी झेल रहे लोगों की सुध लेने के लिये भारत सरकार ने साहसिक कदम उठाया है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन विडंबना है कि चंद लोग अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून का अंध-विरोध करने में लगे हुए हैं। आखिर पाकिस्तान में सताए जा रहे हिंदू, सिख आदि भारत की ओर नहीं निहारेंगे तो क्या अमेरिका, कनाडा, आॅस्ट्रेलिया से उम्मीद लगाएंगे? बहरहाल, पवित्र तीर्थ ननकाना साहिब की घेरेबंदी और पथराव की घटना ने न केवल पाकिस्तान और भारत बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।

नागरिकता संसोधन कानून का अंधविरोध करने वालों की आंखें ननकाना साहिब पर उन्मादी भीड़ के पथराव से भी अगर नहीं खुलती तो उन पर लानत ही भेजी जा सकती है।

पथराव के पीछे एक सिख लड़की के अपहरण और जबरन धर्मांतरण के बाद शादी का मामला है, जिसमें एक व्यक्ति की गिरμतारी के बाद संबंधित परिवार के नेतृत्व में मुस्लिमों के झुंड ने ननकाना साहिब पर धावा बोल दिया। इस प्रकरण ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को एक बार फिर रेखांकित किया है। भारत में अल्पसंख्यकों की झूठी दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने वाला पाकिस्तान अपने गिरेबान में नहीं झाकता। गुरुद्वारा ननकाना साहिब पर हमले की ताजा घटना ने पाकिस्तान के मनसूबों को दुनिया के सामने नंगा कर दिया है। दुनियाभर में छिछालेदार होने के बावजूद पाकिस्तान सुधरने को तैयार नहीं है। भले ही वह कितना ही सफेद झूठ बोल कर इस घटना पर पर्दा डाले, लेकिन दुनिया पाकिस्तान के असली चेहरे से वाकिफ हो चुकी है। गुरुद्वारे पर हुए हमले पर विवाद थमा भी नहीं था कि एक सिख युवक रविंद्र सिंह की हत्या कर दी गई। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की मानें तो इस ऐतिहासिक एवं पवित्र गुरुद्वारे में कहीं कुछ नहीं हुआ। वह इस झूठ के पीछे इसलिए नहीं छिप सकता, क्योंकि दुनिया ने इसके सच को अपनी आंखों से देखा है। पाकिस्तान के हालात सुधरने की कहीं कोई उम्मीद इसलिए भी नहीं, क्योंकि एक तो कट्टरपंथी तत्व सेना एवं सरकार से संरक्षित हैं और दूसरे, ईशनिंदा सरीखा दमनकारी कानून अस्तित्व में है।

जब तक यह कानून अस्तित्व सांसत में ही बनी रहेगी। पाकिस्तान कितना झूठा, फरेबी एवं षडयंत्रकारी है, इसका उदाहरण पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज के लोगों की स्थिति पर चिंता जताते हुए एक वीडियो ट्वीट किया, जबकि यह वीडियो उत्तरप्रदेश का न होकर बांग्लादेश का था। बाद में झूठ पकड़े जाने पर इमरान ने ट्वीट डिलीट कर दिया। ननकाना साहिब की घटना के बाद सीएए का खामोखां विरोध कर रहे उन लोगों की आंखें खुल जाएं तो बेहतर है। कम से कम अब तो नागरिकता कानून के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने से बाज आना चाहिए, क्योंकि इस कानून के जरिये पाकिस्तान और साथ ही बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान में प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने की व्यवस्था की गई है।

क्या हो गया है हमारे देश को? क्यों भारत को मजबूती देने एवं उसकी एकता-अखण्डता को सुदृढ़ करने के इस कानून के नाम पर हिंसा रूप बदल-बदल कर अपना करतब दिखा रही है-देश को तोड़ने, विखण्डित करने, विनाश, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और निर्दोष लोगों को डराने-धमकाने की इन कुचेष्टाओं एवं षडयंत्रों को समझने की जरूरत है। आखिर जब यह स्पष्ट है कि इस कानून का भारतीय मुसलमानों से कहीं कोई लेना-देना नहीं तब फिर उसके विरोध का क्या औचित्य? दरअसल, देश में राजनीतिक अस्तित्व लगातार खो रहे राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच बनाने के लिये नागरिकता कानून के विरोध जैसे अराष्ट्रीयता के अराजक रास्तों को अख्तियार कर रहे हैं। उत्पात का पर्याय बन गए इस उन्माद भरे हिंसक विरोध से कड़ाई से निपटना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कानून के शासन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का मजाक बन रहा है। अब युद्ध मैदानों में सैनिकों से नहीं, भीतरघात करके, निदोर्षों को प्रताड़ित एवं उत्पीड़ित कर लड़ा जाता है। सीने पर वार नहीं, पीठ में छुरा मारकर लड़ा जाता है। इसका मुकाबला हर स्तर पर हम एक होकर और सजग रहकर ही कर सकते हैं। यह भी तय है कि बिना किसी की गद्दारी के ऐसा संभव नहीं होता है।

कश्मीर, पश्चिम बंगाल एवं अन्य राज्यों में हम बराबर देख रहे हैं कि प्रलोभन देकर कितनों को गुमराह किया गया और किया जा रहा है। पर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध का जो वातावरण बना है इसका विकराल रूप कई संकेत दे रहा है, उसको समझना है। यह बड़ा षडयंत्र है इसलिए इसका फैलाव भी बड़ा हो सकता है। सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी कुर्सियों को पकड़े बैठे हैं या बैठने के लिए कोशिश कर रहे हैं। उन्हें नहीं मालूम कि इन कुर्सियों के नीचे क्या है। कुर्सी की चाह में देश को दाव पर लगाना कहां तक उचित है? ननकाना साहिब की घटना ने नागरिकता संशोधन कानून की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता को उजागर किया है, अब इस कानून का विरोध करने वालों की आंखें खुलनी ही चाहिए, नहीं खुलती है तो यह उनकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिन्ह है। बहरहाल, ननकाना साहिब पर हमला कोई वीरता नहीं। मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि नागरिकता संसोधन कानून पर पीछे हटने का सवाल ही नहीं है। यह सुकून देने वाली बात है। इसी के साथ पडुोस को कड़ा संदेश देना होगा, देश के उपद्रवी हाथों को भी खोजना होगा अन्यथा उपद्रवी हाथों में फिर खुजली आने लगेगी। हमें इस काम में पूरी शक्ति और कौशल लगाना होगा। अराजक एवं उत्पादी तत्वों की मांद तक जाना होगा। पाकिस्तान के मनसूंबों को समझना होगा। वह कभी भी पूरे देश की शांति और जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकता है। हमारा उद्योग, व्यापार ठप्प कर सकता है। हमारी खोजी एजेंसियों एवं शासन- व्यवस्था को जागरूक होना होगा।




 
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