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जल प्रबंधन की समस्या एवं समाधान

09/08/2019

डॉ .दिनेश प्रसाद मिश्र

'ल ही जीवन है'। जीवन में जल के महत्व को देखते हुए शुद्ध जल की पर्याप्त उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। जल की उपलब्धता की दृष्टि से भारत एक जल समृद्ध देश है। यहां कल-कल करती नदियां अपार जल संपदा अपने अंक में समाए हुए उसे सहज रूप में उपलब्ध कराती हैं। किंतु, नदियों के संरक्षण संवर्धन एवं उनके अविरल प्रवाह को बनाए रखने हेतु सरकार की कोई नीति -योजना न होने के कारण नदियां, वैज्ञानिक प्रगति, अंधाधुंध शहरीकरण एवं तथाकथित राष्ट्रीय विकास के नाम पर किये जा रहे कार्यों से प्रभावित होकर निरंतर प्रदूषित ,जलहीन एवं अस्तित्वहीन होती जा रही हैं। देश की बड़ी- बड़ी नदियां तो किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं, किंतु उनको जल की आपूर्ति करने वाली 45 00 से अधिक छोटी-छोटी नदियां सूख कर विलुप्त हो गई हैं। जल के उचित प्रबंधन और उससे संबंधित सही योजनाओं के न होने के कारण देश की बड़ी आबादी को आवश्यकता के अनुसार जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जल की अनुपलब्धता किसी मौसम विशेष में न होकर वर्ष पर्यंत बनी रहती है। यह अलग बात है कि गर्मी के दिनों में जल की कमी अधिक होती है। जल प्रबंधन आज राष्ट्र एवं सरकार के समक्ष एक बड़ी समस्या है। द वर्ल्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित 17 देशों में पानी की समस्या अत्यंत गंभीर है। अगर शीघ्र ध्यान नहीं दिया गया तो इन देशों में पानी की एक बूंद भी नहीं बचेगी। डब्ल्यू आर आई ने  भूजल भंडार और उसमें आ रही निरंतर कमी ,बाढ़ और सूखे के खतरे के आधार पर विश्व के 189 देशों को वहां पर उपलब्ध पानी को दृष्टि में रखकर  श्रेणी बद्ध किया है। जल संकट के मामले में भारत विश्व में 13वें स्थान पर है। भारत के लिए इस मोर्चे पर चुनौती बड़ी है, क्योंकि उसकी आबादी जल संकट का सामना कर रहे अन्य समस्याग्रस्त 16 देशों से 3 गुना ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के उत्तरी भाग में जल संकट भूजल स्तर के अत्यंत नीचे चले जाने के कारण अत्यंत गंभीर है। यहां पर जल संकट 'डे जीरो' के कगार पर है। इस स्थिति में नलों का पानी भी सूख जाता है। विगत दिनों बंगलौर एवं चेन्नई में यह स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। कम हो रही वर्षा तथा निरन्तर गिरते भूगर्भ जल स्तर को देखते हुए निकट भविष्य में सम्पूर्ण भारत, विशेष रूप से उत्तर भारत में पानी की अत्यन्त कमी अतिशीघ्र होने वाली है। इसे भांपकर ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने द्वितीय बार शपथ ग्रहण करने के पश्चात अपनी पहली 'मन की बात 'में जल समस्या से निजात पाने के लिए जल संरक्षण हेतु जनान्दोलन चलाने की बात कही है। 
देश के कई भागों में जल की अनुपलब्धता के कारण आंदोलन और संघर्ष हो रहे हैं। चेन्नई से लेकर उत्तर भारत के अनेक शहरों में पेयजल की समस्या मुंह बाए खड़ी है। देश के लगभग 70 फीसदी घरों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। लोग प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य हैं। लगभग 4 करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रदूषित पानी पीने से बीमार होते हैं। लगभग 6 करोड़ लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने के लिए विवश हैं। देश में प्रतिवर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर पानी वर्षा के जल के रूप में प्राप्त होता है किंतु उसका लगभग 8 फीसदी पानी ही हम संरक्षित कर पाते हैं। शेष पानी नदियों, नालों के माध्यम से बहकर समुद्र में चला जाता है। हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा के जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसके चलते स्थान-स्थान पर पोखर, तालाब, बावड़ी, कुआं आदि निर्मित कराए जाते थे। उनमें वर्षा का जल एकत्र होता था। वह वर्षभर जीव-जंतुओं सहित मनुष्यों के काम आता था। जो थोड़े-बहुत जल स्रोत उपलब्ध हैं, उनमें से कई औद्योगिक क्रांति की भेंट चढ़ चुके हैं। उनके पानी में फैक्ट्रियों से निकलने वाले कचरे के मिल जाने से उनका जल इतना प्रदूषित हो गया है कि उसको पीना तो दूर, स्नान करने पर भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाने का खतरा रहता है। गंगा तक गंदे पानी की धारा बन गई है। भारत की कृषि पूर्णतया वर्षा जल पर निर्भर है। वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई के अन्य साधन सुलभ हो जाते हैं किंतु वर्षा न होने पर सभी साधन जवाब दे देते हैं और कृषि सूखे का शिकार हो जाती है। चीनी उत्पादक महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश के किसान निरंतर गन्ने की खेती पर बल दे रहे हैंसरकार भी गन्ना उत्पादन के लिए उन्हें प्रोत्साहित कर रही है। इसी प्रकार धान की खेती के लिए पंजाब छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश इत्यादि अनेक राज्य धान की फसल का क्षेत्रफल निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं किंतु उसके लिए पानी प्राप्त न होने के कारण वह पानी भूगर्भ से निकाल कर खेतों को सींचा जा रहा है जिससे भूगर्भ में स्थित जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। 
आवश्यकता है कि प्रत्येक सरकारी विभाग उन्हें दिए गए दायित्व का पूर्णतया निर्वहन करते हुए जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाए। किंतु, व्यवहार में उनमे इस संदर्भ में सक्रियता नहीं देखी जाती। सरकार ने राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अंतर्गत 16 राज्यों की 34 नदियों को प्रदूषण मुक्त करने तथा उनके जल को पीने योग्य बनाने के लिए 5800 करोड़ रुपये की धनराशि अपने बजट में आवंटित की है। इसका उद्देश्य गंगा नदी के साथ अन्य नदियों को भी प्रदूषण मुक्त कराना है। हालांकि सरकारी गति से यह नहीं लगता कि यह कार्य सरकारी देखरेख में समय के अंतर्गत संपन्न हो सकेगा। 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल के दौरान 'नदी जोड़ो अभियान' की शुरुआत की थी। उक्त योजना मोदी सरकार की भी प्राथमिकता में है किंतु व्यवहार में उसका अवतरण नहीं देखा जा रहा है। औद्योगिक इकाइयां अपने उत्पाद के उत्पादन में भूगर्भ के जल का असीमित दोहन करती हैं। शीतल पेय  जैसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियां हजारों लीटर पानी व्यर्थ में बहा देती हैं जिस का राजस्व भी किसी भी प्रकार से सरकार को प्राप्त नहीं होता। केंद्र एवं राज्य सरकारों को चाहिए कि वह औद्योगिक इकाइयों के भूगर्भ के जल के उपयोग की सीमा निर्धारित कर दे, जिससे निर्धारित सीमा से अधिक जल का उपयोग किसी  इकाई द्वारा न किया जा सके। साथ ही भूगर्भ के जल के उपयोग हेतु बोरिंग किए जाने हेतु उसकी गहराई की सीमा भी निर्धारित कर दी जानी चाहिए। अन्यथा देश में जल के अभाव के कारण लोगों को गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ेगा। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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