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राजनीति को भी नई दिशा दी शीला ने

18/08/2019

राजनीति को भी नई दिशा दी शीला ने


किसे रश्क नहीं होगा शीला दीक्षित के जनाजे पर। दोस्त तो दोस्त,राजनीतिक दुश्मनों ने भी उनकी मैयत पर नम आंखों से फूल चढ़ाए और तब तक जनाजे के साथ चलते रहे, जब तक उनकी पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन नहीं हो गई। इस तरह के जनाजे की ख्वाहिश शायरी में तो सुनी थी, पर शीला दीक्षित ने बता दिया कि हकीकत में भी ऐसा हो सकता है। ऐसे ही नहीं सैकड़ों मील दूर से उनको श्रद्धांजलि देने आए कांग्रेस के एक बुजुर्ग कार्यकर्ता ने कहा- ‘‘हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।’’ मैं नहीं चाहूंगी कि इस कार्यकर्ता की ख्वाहिश पूरी हो क्योंकि नफरत और कड़वाहटों से भरी आज की राजनीति में देश को शीला जी जैसे नेताओं की हर वक्त बेहद जरूरत है। उनको श्रद्धांजलि देने सभी दलों के नेता पहुंचे और हरेक ने महसूस किया कि आज के राजनीतिक माहौल में भी वे एक ऐसी अलग शख्शियत थीं जिनके दिल में सत्ता कम और जनता ज्यादा रहती थी।

विरोधियों को वे अपनेपन से साधती थीं, फिर चाहे वे कांग्रेस के भीतर से हों या विरोधी दलों से। कम से कम युवा राजनेताओं को तो यह बात समझ में आई ही होगी कि चुनाव जीत कर विधानसभा या लोकसभा के भीतर आ जाना एक बात है, पर लोगों के दिलों पर राज करते हुए देश का नेता बनना एकदम अलग बात । इसके लिए अपने घर के दरवाजे दिन रात खोलकर रखने होंगे। दिल्ली की सड़कों पर जार-जार रोते हुए त्रिलोकपुरी या मंगोलपुरी जैसी बस्तियों की महिलाओं का यह कहना गौरतलब है, -‘‘वे तो हमारी मां थीं। आधी रात को भी हम आए तो हमारी बात उन्होंने सुनी। हमारी समस्या को हल किया। अब कौन करेगा। हमारी तो मां चली गई।’’ आज की करियर आधारित राजनीति में क्या कोई युवा नेता फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष, अपने लिए ऐसे उद्गारों की कल्पना भी कर सकता है। इसलिए अगर यह कहा जाए कि शीला जी ने अपनी विकासोन्मुखी राजनीति को जन केंद्रित व मानव केंद्रित कर भारत के लोकतंत्र को मजबूत किया तो यह गलत नहीं होगा।

ऐसा नहीं है कि आज का युवा राजनेता शीला जी से प्रभावित नहीं है। दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा-‘‘आज की कड़वाहट भरी राजनीति और चुनाव प्रचार के दौरान भी मैंने देखा कि वे बेहद सौम्य रहीं। एक शब्द भी ऐसा नहीं बोलीं, जिसे खराब कहा जा सके। उनकी यह बात मुझे इतनी अच्छी लगी कि मैं चुनाव के बाद उनसे मिलने गया। हालांकि वे चुनाव हार गईं थीं, मगर उन्होंने न केवल मेरा स्वागत किया, मेरे सिर पर हाथ रख एक मां की तरह मुझे आशीर्वाद भी दिया। मैं उनके इस व्यवहार को कभी भूल नहीं सकता।’’ कुछ ऐसी ही बात अरविंद केजरीवाल ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए पत्रकारों से कही। उनका कहना था-‘‘राजनीतिक स्तर पर हम विरोधी थे पर आपसी व्यवहार में वे सदा बेहद सौम्य रहीं।’’

यह दिल्ली में शीला जी के काम और व्यवहार का ही असर था कि उनके निधन के कुछ देर बाद ही उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने उनके सम्मान में दो दिन का राजकीय शोक घोषित कर दिया। केजरीवाल और मनोज दोनों ही वे नेता हैं, जिनके खिलाफ वे चुनाव लड़ीं और हारीं। चाहतीं तो उनके प्रति मन में कटुता भी पाल सकती थीं। पर नहीं। वे उनके प्रति भी उदारमना ही रहीं। सफल जमीनी राजनीति के लिए व्यवहार कुशलता के साथ- साथ उदारमना होना भी अति जरूरी है। कम से कम मनोज तिवारी, केजरीवाल, सचिन पायलट जैसे युवा नेताअ‍ें से अब हम उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपने को बदलेंगे। युवा नेताओं की एक पूरी पीढ़ी पहली बार चुनाव जीतकर इस बार लोकसभा में आई है। इनमें महिला व पुरुष दोनों ही हैं।

उम्मीद करनी चाहिए कि शीला दीक्षित की अंतिम विदाई का परिदृश्य उनके दिलों में भी कुछ ख्वाहिशें बसा गया होगा कि उन्हें पूरा करने के लिए वे अपने को लोगों के दिलों में उतारते चले जाएं। लोग, फिर चाहे किसी भी जाति के हों, धर्म के हों या दल के हों, शीला जी का अनुकरण करें तो यकीन मानिए, तब शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए घोषणाओं की जरूरत नहीं पड़ेगी।


 
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