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पीएम की भूटान यात्रा का महत्व समझिए

28/08/2019

पीएम की भूटान यात्रा का महत्व समझिए

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूटान यात्रा काफी महत्वपूर्ण और समसमायिक रही। दोनों देशों की सांस्कृतिक धरोहर और लोगों के बीच संपर्क ऐसा है कि भूटान अपने देश से अलग नहीं लगता है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों में आर्थिक, शैक्षिक, विज्ञान तकनीकी, स्वास्थ्य, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में कई समझौते हुए।

घटनाओं के तीव्र प्रवाह में कई महत्वपूर्ण विषय आवश्यक चर्चा से वंचित रह जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो दिवसीय महत्वपूर्ण भूटान यात्रा के साथ यही हुआ। बहरहाल, अपनी यात्रा के पूर्व मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा था कि भूटान की उनकी दो दिवसीय यात्रा दोनों देशों के बीच समय की कसौटी पर खरी उतरने वाली मित्रता को और बढ़ावा देगी और एक समृद्ध भविष्य के लिए इसे मजबूत करेगी। विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि भारत और भूटान समय की कसौटी पर खरे और विशेष संबंधों को साझा करते हैं।
दोनों देशों की सांस्कृतिक धरोहर और लोगों के बीच संपर्क के साथ आपसी समझ और सम्मान का भाव रखते हैं। आप देखेंगे कि इस यात्रा का चरित्र और परिणाम ठीक इन वक्तव्यों के अनुरूप रहा। जब प्रधानमंत्री मोदी थिम्पू हवाई अड्डे पर उतरे तो भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोटे शेरिंग उनकी अगवानी के लिए खड़े थे। वहीं उनको गार्ड आॅफ आॅनर दिया गया। इसके बाद मोदी का काफिला जिस रास्ते से होकर गुजरा, भूटान के लोगों ने दोनों देशों के झंडे लेकर पारंपरिक अंदाज में उनका स्वागत किया।

ऐसा लग रहा था कि केवल सरकार नहीं भूटान की जनता मोदी की यात्रा का इंतजार कर रही थी। मोदी ने राजमहल जाकर भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक और चौथे राजा जिग्मे सिग्ये वांगचुक से मुलाकात किया। वहां भी उनको गार्ड आॅफ आॅनर दिया गया। दोनों प्रधानमंत्रियों ने थिम्पू ग्राउंड स्टेशन आॅफ द साउथ एशिया सैटलाइट का उद्घाटन किया। इस सैटलाइट के जरिए टेलि- मेडिसिन, पत्राचार शिक्षा, मौसम, रिसोर्स मैपिंग, प्राकृतिक आपदा की चेतावनी भूटान के सुदूर इलाकों में भी पहुंच सकेगी। यह संबंधों में अत्यंत ही महत्वपूर्ण प्रगति है।
दोनों प्रधानमंत्रियों ने ई- प्लेक का अनावरण किया जो दोनों देशों के बीच नेशनल नॉलेज नेटवर्क का काम करेगा। दोनों देशों के साथ जिन दस समझौते पर हस्ताक्षर हुए उनसे भी संबंधों को व्यापक आयाम मिला है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग से भूटान को संचार, लोक प्रसारण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में मदद मिलेगी। जरूरत के अनुसार अतिरिक्त बैंडविड्थ और ट्रांसपोंडर भी उपलब्ध कराया जायेगा।
शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में सहयोग का समझौता भी महत्वपूर्ण है। भूटान रॉयल विश्वविद्यालय ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली, मुंबई और सिलचर के साथ सहयोग के समझौतों पर हस्ताक्षर किये। ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग समझौता में पहले के समझौतों का विस्तार किया गया। न्यायिक क्षेत्र में सहयोग के लिए भूटान में भारत की राजदूत रुचिरा काम्बोज और भूटान के राष्ट्रीय विधि संस्थान के महानिदेशक लोबजांग रिंजिन ने हस्ताक्षर किये। भूटान के जिग्मे सिंग्ये वांगचुक स्कूल आफ लॉ और भारत के नेशनल लॉ स्कूल बेंगलुरु के बीच सहयोग के समझौते पर भी हस्ताक्षर किये गये।
इस तरह देखें तो शिक्षा से लेकर अंतरिक्ष, उर्जा, न्याय आदि क्षेत्रों में संबंधों का विस्तार हुआ है। मोदी और शेरिंग ने सिमतोखा जॉन्ग मठ में भारत के नैशनल नॉलेज नेटवर्क और भूटान के ड्रुक रिसर्च ऐंड फाउंडेशन नेटवर्क के बीच इंटरकनेक्शन का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया। उद्घाटन के बाद संयुक्त प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए शेरिंग ने कहा कि भारत और भूटान भले ही आकार के मामले में अलग-अलग हैं लेकिन दोनों का विश्वास, मूल्य और प्रेरणा एक जैसे हैं। आज, मैं इस गर्व के अहसास से ही प्रसन्न हूं कि कैसे दोनों देश सच्ची मित्रता की परिभाषा को जी रहे हैं। मोदी ने कहा कि 130 करोड़ भारतीयों के मन में भूटान के लिए खास जगह है। मोदी का यह कहना कि भूटान जैसा पड़ोसी होना सौभाग्य की बात है भावनात्मक कूटनीति का अंग था।
उन्होंने कहा कौन नहीं चाहेगा जहां विकास को आंकड़ों से नहीं बल्कि हैपिनेस यानी खुशी से मापा जाता है। भूटान में भारत का लक्ष्य नई पीढ़ी के साथ भी भावनात्मक एवं क्रियात्मक संबंध विकसित करना है। इसी लक्ष्य को लेकर दौरे के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिष्ठित रॉयल यूनिवर्सिटी आॅफ भूटान में छात्रों को भी संबोधित किया। भारत में बहुत सारे लोग यह समझ नहीं पाते कि भूटान जैसे छोटे से देश, जिसका दुनिया में कोई बड़ा कद नहीं उसे भारत इतना महत्व क्यों देता है। हिमालय में हमारा एक पड़ोसी नेपाल भारत और चीन के बीच संबंध संतुलित करने की दिशा में चल पड़ा है।
भारत के न चाहने पर भी नेपाल 2017 में चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल में शामिल हो गया। चीन योजनापूर्वक अपनी सामरिक स्थिति मजबूत करने तथा आवश्यकतानुसार भारत को दबाव में लाने के उद्देश्य से ऐसा कर रहा है। भूटान के 53 देशों से कूटनीतिक संबंध हैं। लेकिन चीन या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दूसरे किसी भी देश (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस) के साथ राजनयिक संबंध नहीं है। भूटान का सामरिक महत्व इस मायने में भी है कि चीन और भारत के बीच में उसकी भूमिका एक बफर राज्य की है। 2017 में रॉयल भूटान आर्मी ने गश्त के दौरान देखा कि उसकी सीमा में चीन सड़क बना रहा है। इसके बाद भारतीय सेना ने चीन को ऐसा करने से रोक दिया। 75 दिनों तक डोकलाम में भारत चीन गतिरोध बना रहा। चीन यह मांग करता रहा है कि भूटान उसे डोकलाम पठार का 269 वर्ग किमी का इलाका दे दे और दूसरे क्षेत्र में उससे ज्यादा भूमि ले ले।
वह इलाका मिलते ही चीन की सामरिक स्थिति हमारे मुकाबले मजबूत हो जाएगी। भूटान ने चीन को साफ मना कर दिया है। भूटान की सामरिक स्थिति को देखते हुए उस पर किस तरह दुनिया की नजर है उसे समझने के लिए यह जानना जरुरी है कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से पहले 12-13 अगस्त को अमेरिकी उप विदेशमंत्री जॉन जे. सुलिवन वहां थे। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने ट्वीट के जरिये इसे दो दशकों में अब तक की सबसे उच्चस्तरीय यात्रा कहा। भारत-भूटान मित्रता संधि 1949 के खंड दो के अनुसार भूटान अपने विदेशी मामलों में भारत से सलाह लेगा। अमेरिका कह रहा है कि वह भूटान में विज्ञान और तकनीक, गणित, उद्यमिता आदि के क्षेत्र में सहयोग देना चाहता है। अमेरिका की दृष्टि मुख्यत: भूटान के सामरिक महत्व के कारण है।

भूटान में पांच वर्षों तक रिनपोछे की मूर्ति
मोदी और छिरिंग जिस सिमटोखा जोंग मठ में मिले उसका भूटान में काफी महत्वपूर्ण स्थान है। मह- त्वपूर्ण बातचीत एवं दस समझौतों पर हस्ताक्षर यहीं झाबद्रोंग रिनपोछे की प्रतिमा के सामने हुए। इसका निर्माण 1629 में नामग्याल राजा झाबद्रोंग न्गावांग रिनपोछे ने किया था। झाबद्रोंग न्गावांग रिनपोछे भूटानियों के लिए पूजनीय हैं। झाबद्रोंग रिनपोछे की छह फीट ऊंची मूर्ति बुक्सा किले की लड़ाई में जीत के बाद ब्रिटिश सेना ने हथिया लिया था। कांस्य की यह मूर्ति कोलकाता स्थित एशियाटिक सोसायटी को दे दिया गया। भूटान इस मूर्ति की लगातार मांग करता रहा है। अक्तूबर, 2016 में भारत ने दो वर्ष के लिए यह मूर्ति भूटान को दिया था। अब मोदी ने घोषणा कर दिया है कि भूटान अगले पांच वर्षों तक झाबद्रोंग रिनपोछे की मूर्ति को रख सकता है। तो मठ में मुलाकात, महत्वपूर्ण कार्यक्रम तथा रिनपोछे की मूर्ति को वहां अगले पांच वर्षों तक रखने की घोषणा का असर भूटान के लोगों के मन पर अवश्य हुआ होगा।

अमेरिका देख रहा है कि किस तरह चीन वहां घुसपैठ करने में लगा है। चीन भी हर हाल में भूटान में औपचारिक प्रवेश चाहता है। डोकलाम विवाद के बाद चीन के प्रयास में तेजी आई है। डोकलाम पठार तिब्बत, सिक्किम और भूटान के त्रिकोण पर स्थित है। यह भारत के लिए अत्यंत ही सामरिक महत्व का स्थान है। भारत ने इसकी निगरानी अपने हाथों ली हुई है। जैसे हमने उपर कहा कि वर्ष 1996 में चीन ने भूटान के सामने यह औपचारिक प्रस्ताव रखा था कि डोकलाम के इस टुकड़े के बदले किसी और ठिकाने पर जमीन उससे ले ले। भूटान-चीन के बीच 495 वर्ग किलोमीटर का इलाका विवादित है।
चीन की नीति भारत की तरह ही भूटान से सीमा विवाद बनाए रखने को लेकर है। 24 जुलाई, 2018 को चीनी उप विदेशमंत्री एक उच्चस्तरीय शिष्टमंडल के साथ थिंपू गए थे और डोकलाम समेत सीमा विवाद पर वार्ता की। इसका अर्थ हुआ कि डोकलाम को पाने की उसकी कोशिशें जारी है। वास्तव में भारत की कूटनीति परंपरागत आर्थिक, शैक्षिक, विज्ञान-तकनीकी, स्वास्थ्य, उर्जा आदि तक तो इतना सघन हो ही कि उसे दूसरे देश से सहयोग की आवश्यकता न हो, उसके साथ सामाजिक,सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर इसे और गहरे ले जाया जाए जिससे लोगों का सघन भावनात्मक जुड़ाव मजबूत हो सके। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यात्रा को लक्ष्यों के अनुरूप ढाला और इसका परिणाम अपेक्षानुरुप आना चाहिए।


 
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