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घर-घर रघुवर से डरा विपक्ष

09/10/2019

घर-घर रघुवर से डरा विपक्ष

डॉ. शारदा वंदना

28 दिसंबर 2014 को रघुवर दास ने झारखंड के दसवें और पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। तब से राज्य विकास के नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।

झारखंड विधानसभा चुनाव में जहां एक ओर भाजपा रघुवर दास को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर धुआंधार प्रचार में जुट गयी है। मुख्यमंत्री भी खुद इसकी कमान संभाले हुए हैं। वहीं दूसरी ओर विपक्ष मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना तो दूर पार्टी की एकजुटता का संदेश भी नहीं दे पा रहा है। विपक्षी दलों के नेता महागठबंधन की बात तो कर रहे हैं लेकिन सभी अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं। इसके इतर भाजपा ‘घर-घर मोदी’ की तर्ज पर झारखंड में ‘घर-घर रघुवर’ अभियान चला रही है। इस अभियान के तहत भाजपा कार्यकर्ता घर-घर मतदाताओं तक पहुंच रहे हैं। 9 सितंबर से शुरू यह अभियान आचार संहिता लागू होने तक चलेगा।
इसके मद्देनजर ही भाजपा ने संथाल परगना में जन आशीर्वाद यात्रा निकाली है। यात्रा के माध्यम से भाजपा जनता से जुड़कर ‘65 प्लस’ सीटें जीतने का आशीर्वाद मांग रही है। लोकसभा चुनाव की तरह ही विधानसभा चुनाव में भी भारी बहुमत से जीत दर्ज करने को लेकर कवायद हो रही है। इन सब के बीच विपक्षी खेमे में सीट शेटरिंग तो दूर की बात है अभी तक महागठबंधन का चेहरा कौन होगा, किसके नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा इस पर ही खींचतान शुरू हो गई है। महागठबंधन में नेतृत्व को लेकर युद्ध छिड़ा हुआ है। बहरहाल, विपक्षी दलों के नेताओं ने एक बार फिर जात और जमात की राजनीति शुरू कर दी है।
विपक्ष रघुवर को फिर से चेहरा बनाए जाने पर जानबूझकर आदिवासी कार्ड खेलते हुए किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाए जाने का राग अलाप रहा है। राजद के नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपनी झारखंड यात्रा के दौरान कहा कि झारखंड में आदिवासी को ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए। हालांकि राजनीति के जानकार कहते हैं कि अब आदिवासी जाति का मुख्यमंत्री बड़ा मुद्दा नहीं है। रघुवर दास के झारखंड का मुख्यमंत्री बनने के बाद ही यह मुद्दा समाप्त हो गया। झारखंड के लोग भी अब विकास को ही मुद्दा बनाने की ओर चल पड़े हैं।
जनजातीय समुदाय के लोग झारखंड की आबादी का करीब 27 फीसदी हैं। यही कारण है कि झारखंड की राजनीति में पांच आदिवासी मुख्यमंत्री बने। आदिवासी मुख्यमंत्री होने का मिथक तोड़ने का गौरव भी रघुवर दास को जाता है। 28 दिसंबर 2014 को झारखंड के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बननेवाले रघुवर अपने काम से अब झारखंड की राजनीति की धुरी बन गये हैं। रघुवर दास के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में न सिर्फ स्थानीय नीति लागू की गयी, बल्कि झारखंड को नया विधानसभा भवन भी मिला। यह रघुवर सरकार के ही कार्यकाल में झारखंड नक्सलवाद से मुक्ति का सपना संजोने लगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना हो या जन आरोग्य योजना, उन्हें राज्य में शत-प्रतिशत लागू कराने का काम रघुवर दास ने किया।
झारखंड में पहली बार कृषि के लिए सिंगल विंडो सिस्टम रघुवर ने ही लागू किया। 12 सितंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रांची के प्रभात तारा मैदान में झारखंड को कई योजनाओं की सौगात देने पहुंचे, तो उन्होंने न सिर्फ रघुवर दास के कार्यों की तारीफ की बल्कि उन्हें अपना परम मित्र भी बताया। 18 सितंबर को अमित शाह जामताड़ा पहुंचे, तो उन्होंने भी मुख्यमंत्री के नाम वोट का आशीर्वाद मांगा और जन आशीर्वाद यात्रा का शुभारंभ किया। संथाल और कोल्हान में भाजपा की चुनावी रणनीति कामयाब हो, इसके लिए भी रघुवर दास ने खुद कमान संभाल ली है। यह रघुवर सरकार की नीतियों का ही कमाल था कि इज आॅफ डूइंग बिजनेस में झारखंड 33वें स्थान से लंबी छलांग लगाकर चौथे स्थान पर पहुंच गया। बिहार से अलग अस्तित्व में आने के साथ झारखंड को खंडित जनादेश मिला।
इस दौरान नौ मुख्यमंत्री बने और दो बार राष्ट्रपति शासन का दंश झेलना पड़ा। बाबूलाल मरांडी से लेकर हेमंत सोरेन तक सभी आदिवासी मुख्यमंत्रियों ने राज्य का नेतृत्व किया। लेकिन रघुवर दास झारखंड के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने न सिर्फ स्थिर सरकार दी बल्कि आदिवासी मुख्यमंत्री का मिथक भी तोड़ दिया।


 
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