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अब एक बार में 'तीन तलाक' बोला तो होगी जेल

01/08/2019

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की कुप्रथा से मुक्ति दिलाने का वादा किया था। इसके लिए लोकसभा में सरकार ने पहले ही बिल पारित करा लिया था। दिक्कत राज्यसभा में थी। वहां फिलहाल सरकार का बहुमत नहीं है। इसके बावजूद मंगलवार को दुनिया ने देखा कि मोदी सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को राज्यसभा से पारित करा लिया। बिल के समर्थन में 99 तो विरोध में 84 वोट पड़े। हालांकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की प्रमुख सहयोगी जनता दल (यूनाईटेड) ने बिल पर वोटिंग में भाग नहीं लिया। फिर भी उसके बहिष्कार से सरकार को मदद ही मिली। विपक्ष के भी कई दलों में दरार दिखी। विपक्ष बंटा दिखा। कांग्रेस के भी चार सदस्यों ने वोटिंग में भाग नहीं लिया। ऐसे में विपक्ष की दलीलें असरहीन रहीं। बुधवार देर रात राष्ट्र्पति के दस्तखत के बाद मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक कानून बन गया। इससे मुस्लिम महिलाओं को बड़ी राहत मिली है। इस बार उन्हें 15 दिन पहले ही 'स्वतंत्रता दिवस' मनाने का मौका मिल गया है और यह अवसर दिया है मोदी सरकार ने। 
इसे शाहबानो प्रकरण में प्रत्यक्ष रूप से देखा भी गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भारी बहुमत के बल पर तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाहबानो के पक्ष में था। जिसे उसके शौहर ने तीन तलाक देकर सड़क पर धकेल दिया था। ये बात अलग है कि राजीव गांधी को न्यायिक निर्णय बदलने का फायदा नहीं मिला था। वह सत्ता में वापस नहीं हो सके थे। आज उनके उत्तराधिकारियों ने भी इस बात से प्रेरणा नहीं ली। उन्होंने तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं के विचार को समझने का प्रयास नहीं किया। वह सियासत के परम्परागत नजरिये पर ही उलझे रहे। इसीलिए उन्होंने लोकसभा में सरकार के विधेयक का विरोध किया राज्यसभा में विधेयक को गिराने के लिए अपने सदस्यों को व्हिप जारी किया। लेकिन राज्यसभा में सरकार का बहुमत न होने के बाद भी विधेयक पारित हो गया। कांग्रेस सहित कुछ अन्य पार्टियों ने विरोध करते समय इस्लामिक देशों में हुए बदलाव पर भी विचार नहीं किया। मिस्र, सीरिया, इराक, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ट्यूनीशिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, इरान, ब्रुनेई, मोरक्को, कतर, अरब अमीरात में तीन तलाक को पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था। ऐसे में भारत के कुछ विपक्षी पार्टियों के विरोध को उनकी अदूरदर्शिता ही कहा जा सकता है। उनके लिए मुसलमान केवल वोट बैंक हैं।
इस विधेयक के विरोधी इसे लटकाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भिजवाने का प्रयास किया। सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे जाना वाला प्रस्ताव 100 के मुकाबले 84 वोट से से गिर गया। जदयू, अन्नाद्रमुक ने सदन से बहिर्गमन किया। विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई मुस्लिम पति, अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रानिक रूप से या किसी अन्य विधि से तीन तलाक देता है, तो उसकी ऐसी कोई भी उद्घोषणा शून्य और अवैध होगी। उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा। जमानत भी नहीं होगी इसके अलावा तीन तलाक से पीड़ित महिला अपने पति से स्वयं और अपनी आश्रित संतानों के लिए निर्वाह भत्ता प्राप्त पाने की हकदार होगी। इस रकम को मजिस्ट्रेट निर्धारित करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर सरकार से अपने विचार प्रस्तुत करने को कहा था। इसके बाद सरकार ने अनेक मुस्लिम विद्वानों की सलाह ली। उन इस्लामिक मुल्कों से भी जानकारी प्राप्त की, जहां बहुत पहले ही तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि वह एक बार में तीन तलाक को उचित नहीं मानती। जाहिर है कि न्यायपालिका और मुस्लिम महिलाओं के सकारात्मक रुख ने सरकार का उत्साह बढ़ाया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस संबन्ध में विधेयक बनाने को कहा, जिससे संसद इस विषय पर कानून बना सके। सरकार इस सम्बन्ध में अध्यादेश लाई थी। तीन तलाक के इस पूरे प्रकरण में सरकार की दृढ़ता और संवेदनशीलता उभरकर सामने आई है। कुछ वर्ष पहले तक यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक पर न्याय मिलेगा। वोट बैंक से प्रेरित कथित सेक्युलर सियासत ऐसा होने नहीं देती। इसके लिए शाहबानों प्रकरण तक पीछे लौटकर देखने की जरूरत भी नहीं है। तीन तलाक के मसले पर कांग्रेस, कम्युनिस्ट, राजद, सपा, तृणमूल, बसपा आदि सभी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि भाजपा मजहबी मामले में दखल दे रही है।
सामाजिक या मजहबी मान्यताएं संवेदनशील होती हैं। फिर भी व्यापक और सकारात्मक विचार विमर्श से किसी समस्या का समाधान आसान हो जाता है। सरकार के ऐसे ही रुख से मुस्लिम महिलाओं को सौगात मिली है। यह अच्छा है। आज मुस्लिम महिलाएं ही ओवैसी जैसे नेताओं को करारा जवाब दे रही हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के साहसिक फैसले से तीन तलाक के मसले का समाधान हो गया। ऐसे ही सती प्रथा और बाल विवाह की सामाजिक कुप्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया था। समय के साथ समाज के सभी वर्गों ने इसे सहज रूप में स्वीकार किया।
अनेक इस्लामी मुल्कों ने एक साथ तीन तलाक की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। यहां तक कि भारत से अलग हुए पाकिस्तान जैसे कट्टर मुल्क में भी एक साथ तीन तलाक पर प्रतिबंध है। बांग्लादेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया है। समय के साथ उन मुल्कों में इस समस्या का समाधान हो गया। आज यदि अपने को सेक्युलर घोषित करने वालों की सरकार होती तो यह सुधार असंभव था, क्योंकि फिर उन्हीं लोंगों की चलती जो शाहबानों प्रकरण में न्यायिक निर्णय से असहमत थे। वैसा ही नजारा इस बार भी दिखाई देता। इस बार भी पहल न्यायपालिका की ओर से हुई थी। कई मुस्लिम महिलाओं ने एक बार में तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने की याचिका दायर की थी। प्रारंभिक चरण में दो पक्ष थे। एक सुप्रीम कोर्ट, जो याचिका पर विचार हेतु तैयार हुआ। दूसरे पक्ष के रूप में मुस्लिम महिलाएं थीं, जिन्होंने मजहबी ग्रन्थों के आधार पर यह तर्क रखा था कि एक बार में तीन तलाक अनुचित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो फोन, चिट्ठी, सोशल मीडिया आदि पर भी एक बार में तीन तलाक होने लगे थे। इन तर्कों का कई मुस्लिम विद्वानों ने भी समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अपने विचार प्रस्तुत करने को कहा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि वह एक बार में तीन तलाक को उचित नहीं मानती। जाहिर है कि न्यायपालिका और मुस्लिम महिलाओं के सकारात्मक रुख ने सरकार का उत्साह बढ़ाया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस संबंध में विधेयक बनाने को कहा, जिससे संसद इस विषय पर कानून बना सके। तीन तलाक के इस पूरे प्रकरण में सरकार की साहसिक सोच सामने आई है। अब एक बार में तीन तलाक दण्डनीय अपराध बन गया है। इसके लिए तीन वर्ष कैद और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। मौखिक, पत्र, फोन, ह्वाट्स एप, मेल या किसी अन्य माध्यम से एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी और अमान्य हो गया है। जाहिर है नरेंद्र मोदी की साहसिक सोच से इस समस्या का समाधान संभव हुआ।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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