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कश्मीर एक त्रुटिपूर्ण इतिहास कथा

06/08/2019

कश्मीर एक त्रुटिपूर्ण इतिहास कथा


भारत के विभाजन की तारीख अग्रिम करने और ब्रिटिश प्रशासन की चरणबद्ध वापसी का फैसला भारत को बहुत महंगा पड़ा। जानबूझ कर मजहबी उन्माद बढ़ाने और कश्मीर को विवाद में धकेलना भी उसी निर्णय के परिणाम थे। जल्द विभाजन के प्रति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेता इतने व्यग्र क्यों थे, यहां उसकी व्याख्या करना मकसद नहीं है, लेकिन एक बात निश्चित है कि इस मुद्दे पर पर्याप्त बहस नहीं हुई है। आखिर हम नार्थ वेस्ट फ्रटियर क्यों गंवा बैठे जबकि 1946 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला था। अप्रैल 1948 में कलात (बलूचिस्तान का 80 प्रतिशत हिस्सा) और वर्तमान पाकिस्तान का 40 फीसद हिस्सा पाकिस्तान द्वारा जबरन कैसे कब्जा कर लिया गया? याद करना होगा कि भारत की अधिकतर सीमाएं ब्रिटिश सरकार की देन हंै। रेडक्लिफ अवार्ड और मैकमोहन रेखा का मसला अभी भी सुलझा नहीं है। तब गिलगित में जो हुआ वह भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक नुकसान था। बाल्टिस्तान, हुनजा नागर, पुंजाल, यासीन इश्कोमान और चित्राल भी भारत ने खो दिए। बहुत से भारतीयों को इन जगहों के नाम तक मालूम नहीं होंगे और न ही वे उनके महत्व को समझते होंगे। यह एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ तीन साम्राज्य चीनी, ब्रिटिश और रूसी मिले हुए थे।

तब गिलगित में जो हुआ वह भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक नुकसान था। बाल्टिस्तान, हुनजा नागर, पुंजाल, यासीन इश्कोमान और चित्राल भी भारत ने खो दिए। बहुत से भारतीयों को इन जगहों के नाम तक मालूम नहीं होंगे और न ही वे उनके महत्व को समझते होंगे।

कभी महत्वपूर्ण समझे जाने वाले इन क्षेत्रों का आज महत्व कम नहीं हो जाता। हो सकता है कि बाद में यह महत्वपूर्ण खेल चीन और भारत के बीच में खेला जाता। भारत की ब्रिटिश सरकार ने अपने नार्थ वेस्ट (डूरंड लाइन), नॉर्थ (गिलगित) और नॉर्थ ईस्ट (मैकमोहन लाइन) सीमा पर अग्रिम नीति अपनाई थी। वहीं उसने डुरंड रेखा के साथ कबायिली क्षेत्रों को नार्थ वेस्ट में एक बफर के रूप में प्रयोग किया। नॉर्थ ईस्ट में तिब्बत के साथ भी यही किया गया। हमने नार्थ वेस्ट फ्रंटियर पोस्ट पाकिस्तान के हाथों गंवा दिया और हमारी स्वतंत्रता के तुंरत बाद चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इसलिए यह और भी गंभीर हो जाता है कि हम लंबे समय वाले असर के प्रति सचेत रहें। बाल्टिस्तान, सक्सम घाटी, अक्साई चिन और पीओके को भारत के अभिन्न अंग के रूप में दिखाया गया है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के नक्शे में चित्राल का कोई उल्लेख नहीं है। चित्राल वास्तव में एक ऐसा आधिपत्य था जिसके कई इलाकों पर सीधे कश्मीर के राजाओं का शासन था। चित्राल के पाकिस्तान क्षेत्र के हिस्से के रूप में उल्लेख करने का कोई विरोध नहीं करता है। सवाल है कि इसको लेकर दावे क्यों नहीं किए गए।

1870 में, दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के समय, अंग्रेज अफगानिस्तान को अलग थलग करने के लिए बड़े व्यग्र थे, उत्सुक थे। अफगान सरकार ने तब चित्राल के मेहतार पर दबाव डाला। उस पर आक्रमण करने की धमकी दी। ऐसे में अंग्रेजों ने कश्मीर के महाराजा को चित्राल पर आधिपत्य जमाने के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया। 1878 में चित्राल के मेहतार और कश्मीर के महाराजा के बीच एक संधि पर हस्ताक्षर हुआ। उस संधि के अनुसार, मेहतार को महाराजा के आदेश को मानना और उस पर पालन करना था। संधि के मुताबिक महाराजा के दुश्मन को अपना दुश्मन मानना और कश्मीर को एक वार्षिक नजराना देना था। बदले में उसे कश्मीर राज्य से कुछ आर्थिक सहायता भी प्राप्त करना था। इस संधि में भारत सरकार का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

1953 के मध्य में सिंधु जल को लेकर विवाद हुआ। पाकिस्तान सरकार ने ऐसा नक्शा पेश किया, जिसमें गिलगित एजेंसी के क्षेत्रों को पाकिस्तान के हिस्से के रूप में चिह्नित किया गया था। 21 मई, 1953 को तत्कालीन सिंचाई और बिजली मंत्रालय द्वारा इन क्षेत्रों को इस बात के लिए संदर्भित किया गया कि इन क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति के बारे में स्पष्टीकरण लिया जा सके।

1939 के उत्तरार्ध में, चित्राल के मेहतार 1878 की संधि की तर्ज पर कश्मीर दरबार के साथ एक सीधा समझौता करने के इच्छुक थे। उसमें ब्रिटिश सरकार पक्षकार नहीं थी। चूंकि 1935 में गिलगित वजरात को भारत सरकार को पहले ही पट्टे पर दे दिया गया था, इसलिए कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस तरह के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया और अंतत: नए समझौते का विचार छोड़ दिया गया। इस बीच सितंबर, 1939 में युद्ध के कारण आगे की बातचीत को रोक दिया गया। लेकिन 1947 में विभाजन के समय तक, 1878 की संधि बिना किसी परिवर्तन के बनी रही। यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि अक्टूबर, 1947 के तीसरे सप्ताह में कश्मीर पर आक्रमण को ब्रिटेन द्वारा सक्रिय रूप से उकसाया गया। गिलगित एजेंसी ने अपने स्काउट्स के बहकावे में आ गई और कश्मीर की सेना, जो एक ब्रिटिश अधिकारी के नेतृत्व में काम कर रही थी, ने विद्रोह कर दिया। गिलगित में पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया गया। उसी तरह बाल्टिस्तान भी पाकिस्तान में जा मिला।

चित्राल जो कश्मीर का अभिन्न अंग था, उस पर भारत ने कभी दावा नहीं किया। यह अंग्रेजों के हित में था कि नार्थवेस्ट फ्रंटियर पोस्ट बलूचिस्तान एवं कुछ और क्षेत्र पाकिस्तान के हिस्से बनें। आखिर क्यों हम स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारत के विभाजन की अनिवार्यता पर विश्वास जारी रखते हैं? आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन का प्रमुख विषय आज भी यही है कि सांप्रदायिकता ही भारत के विभाजन का मुख्य कारण था। अब उस भाष्य को बदलने की जरूरत है। गिलगित का विषय भी इसी तरह का एक भाष्य है। भारत की ब्रिटिश सरकार गिलगित डिविजन को भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत भारतीय महासंघ के हिस्से के रूप में कश्मीर के साथ मिलाने के खिलाफ नहीं थी। लेकिन इस तरह की कोई भी घोषणा उस हिस्से को कश्मीर के एक भाग के रूप में स्वीकार करने जैसी थी। उस अधिनियम के अनुसार कोई भी भारतीय राज्य शासक के आधिपत्य वाले किसी भी क्षेत्र को अपने में शामिल कर सकता था,जो भारत की ब्रिटिश सरकार के अधीन नहीं था।

भारत सरकार अधिनियम 1935 का प्रयोग करते हुए कश्मीर में हुंजा, नगीर, चिलास, कोह-गिजार, यासीन और इशाकोमन को शामिल किया जा सकता था जो कि कश्मीर के राजा के आधिपत्य में थे। पुंजाल को भी इस आधार पर कश्मीर में शामिल किया जा सकता था कि उसकी जागीर कश्मीर दरबार ने ही दी थी। षडयंत्र पूर्वक ब्रिटिश भारत सरकार ने इन सभी क्षेत्रों को संघीय प्राधिकरण से बाहर करने का फैसला किया, जबकि कश्मीर के जनगणना रिकॉर्ड में इन सभी आठ प्रमुख क्षेत्रों की आबादी को शामिल किया गया था। अब सवाल है कि क्या भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत चित्राल को कश्मीर का हिस्सा माना जा सकता है? ऐटचिसन ट्रिटी, 1914 के समझौते में दर्ज आधिपत्य संबंधी दस्तावेज जो चित्राल के सहायक राजनीतिक एजेंट द्वारा सत्यापित है, के वाल्यूम 11, पृष्ठ संख्या 428 के अनुसार चित्राल कश्मीर के आधिपत्य में था। 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत भारतीय राज्यों की परिभाषा के अनुसार, चित्राल को कश्मीर राज्य का हिस्सा माना जाना चाहिए था। लेकिन तब की ब्रिटिश भारत सरकार ने भारत सरकार अधिनियम 1935 में एक संशोधन का फैसला किया ताकि इस अधिनियम के कारण उठ रहे ऐसे मुद्दों को दरकिनार किया जा सके। संशोधन में कहा गया है, ‘‘वे क्षेत्र जो कि आधिपत्य में हैं लेकिन राज्य के शासक के स्वामित्व में नहीं है, वे 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत राज्य का हिस्सा नहीं माने जाएंगे।’’ यह कितनी नमकहरामी है! 1953 के मध्य में सिंधु जल को लेकर विवाद हुआ।

पाकिस्तान सरकार ने ऐसा नक्शा पेश किया, जिसमें गिलगित एजेंसी के क्षेत्रों को पाकिस्तान के हिस्से के रूप में चिह्नित किया गया था। 21 मई, 1953 को तत्कालीन सिंचाई और बिजली मंत्रालय द्वारा इन क्षेत्रों को इस बात के लिए संदर्भित किया गया कि इन क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति के बारे में स्पष्टीकरण लिया जा सके। आश्चर्यजनक रूप से एक महीना बीत जाने के बाद मंत्रालयं ने 30 जून 1953 को जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर इस बारे में जानकारी देने को कहा। 29 जुलाई, 1953 को जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव ने राज्यों के मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्रीविश्वनाथन को अपने जवाब का एक नोट भेजा। उस नोट के अनुसार, गिलगित एजेंसी में निम्नलिखित शामिल हैं- गिलगित वजारत जिसमें गिलगित की तहसील और अस्तोर की नियाबात शामिल है। हुंजा और नगर के स्टेट्स, रिपब्लिक आॅफ चिलास और पंजाल, यासीन, कुह-गिजर, इश्कोमन की गवर्नरशिप।

अंग्रेज 1880 के बाद से लगातार जम्मू-कश्मीर के महाराजा के लिए स्थिति को जटिल बनाने का प्रयास करते रहे और जब भारत छोड कर जाने लगे तो उसे यथा स्थिति में छोड़ दिया। चाहे 1947 का उनका फैसला जिसमें पूरे गिलगित को छोड़ देने का था, जिस पर बाद में पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था, जो वास्तव में एक विवादास्पद मुद्दा था। मैंने गिलगित और बाल्टिस्तान पर भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री द्वारा किए गए प्रत्यक्ष संदर्भों का पता लगाने की कोशिश की है, क्योंकि प्रधानमंत्री ने 1947-48 के दौरान कश्मीर के विषय पर काफी स्पष्टता से लिखा था। उस अवधि के प्रशासनिक रिकॉर्ड ऐसे संदर्भों से भरे परे हैं, लेकिन सार्वजनिक किए गए पत्रों में खोए हुए क्षेत्रों का कोई संकेत नहीं है। 1947-48 में गिलगित और बाल्टिस्तान के लोगों ने जो दमन झेला, वह हम सभी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन क्या इसे पाकिस्तान के अधिकारियों के साथ प्रभावी ढंग से उठाया गया? क्यों नहीं उठाया गया। यह भी एक विवादास्पद मुद्दा है। यह गिलगित और चित्राल के क्षेत्र पर जम्मू और कश्मीर के महाराजा की सीधी दखल को कमजोर करने की अंग्रेजों की सोची समझी रणनीति थी। लेकिन इतिहास लेखन में पाकिस्तान द्वारा गिलगित का विलय, उसके दमन या उस क्षेत्र के लोगों के बढ़ते अलगाव भाव पर ही ध्यान केंद्रित रखा गया है।

उस क्षेत्र के अध्ययन में भी नस्ल, मानवाधिकारं और उस क्षेत्र की विकासपरक राजनीति पर ही ध्यान दिया गया। अंग्रेजों की 1947 की, बल्कि 1870 के बाद की नीतियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। यही नहीं, विदेश- रक्षा और गृह मंत्रालय ने भी गिलगित के विषय को कितना महत्व दिया? प्रारंभिक शोध से पता चला है कि गिलगित का क्षेत्र, हमारे सामरिक हित के लिए बहुत महत्वपूर्ण होने के बावजूद, शायद ही इन मंत्रालयों में इस पर कभी चर्चा हुई या विश्लेषण किया गया। ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि भारत ने कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में भेजते समय गिलगित पर अपने दावे नहीं किए।


 
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