लेख

Blog single photo

लाॅक डाउन से काबू में आएगा कोरोना

24/03/2020

प्रमोद भार्गव
22 मार्च को जनता कर्फ्यू अभूतपूर्व रहा। हर गली में ताली, थाली, घंटा, मंजीरे, शंख आदि की तीव्र ध्वानियां सुनाई दीं। वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी सुनाई दिया। इन ध्वनि-तरंगों का वास्तव में अपेक्षित प्रभाव शरीर के साथ-साथ वातावरण में भी अनुभव किया गया। इस सामूहिक नाद की पवित्रता में एक तरह से दिव्यता प्रगट थी। लाॅकडाउन के जरिए यह सामाजिक दूरी इसलिए जरूरी थी क्योंकि कोरोना वायरस किसी एक सतह पर 12 घंटे से ज्यादा जीवित या सक्रिय नहीं रह पाता है। ऐसे में जनता कर्फ्यू और लाॅकडाउन के उपायों ने लोगों को एक-दूसरे से अलग-थलग करके इस वायरस से उत्पन्न होने वाले नए संक्रमण को रोकने में रामबाण का काम किया है। ऐसा करने से परस्पर स्पर्श से तो दूरी बनी ही, यदि किसी संक्रमित व्यक्ति का स्पर्श खिड़की, दरवाजों, रुपयों, फाइलों, पर्सलों और वाहनों के स्टेयरिंग या सीटों से हुआ भी है तो अगले कुछ घंटे इन चीजों को नहीं छूने से वायरस मर जाएगा और नया व्यक्ति संक्रमित होने से बच जाएगा। जाहिर है, घरों में बंद की यह प्रक्रिया इस वायरस की कड़ी को तोड़ देगी। इसी के मद्देनजर अंतरराज्यीय बस सेवाएं बंद करते हुए 260 जिलों को 31 मार्च तक के लिए लाॅकडाउन कर दिया गया है। यह पहल कोरोना की कमर तोड़ने का काम करेगी।
वैदिक-दर्शन तो हजारों सालों से मानता रहा है कि ऊर्जा ही अपने शुद्धतम स्वरूप में वह चेतना है, जो जीवन का निर्माण करती है। इसी में पांच तत्व धरती, आकाश, आग, हवा और पानी अंतरर्निहित हैं। अब विज्ञान भी मानने लगा है कि सृष्टि पदार्थ और ऊर्जा से मिलकर बनी है। इसीलिए भारतीय जीवन-शैली में मंदिरों में सुबह-शाम पूजा के समय विभिन्न वाद्य-यंत्र बजाकर नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के उपाय थे। घरों में हाथ-पैर धोकर ही प्रवेश की अनुमति थी। लेकिन पाश्चात्य जीवन-शैली के प्रभाव में हमने दिनचर्या में शामिल इन तौर-तरीकों को दकियानूसी व अंधविश्वास कहा और नकारते गए। जबकि इन ध्वानियों के निकलने से जीवाणु, विषाणु व कीटाणु या तो मर जाते थे या फिर निष्क्रिय हो जाते हैं। कोरोना (कोविड-19) विषाणु की विश्वव्यापी दस्तक और हजारों लोगों के प्राण लील लेने से यह साफ हो गया है कि आखिर में हम ऐसी महामारियों से छुटकारा पारंपरिक ज्ञान और वातावरण की अधिकतम शुद्धता से ही पा सकते हैं।
जब हम छोटे थे और गांव में रहते थे, तब बाहर से आने पर घर में हाथ-पैर धोए बिना प्रवेश वर्जित था। लोगों से दूर रहने रहने की सलाह भी माता-पिता देते थे। अब जब कोरोना वायरस ने महामारी का रूप ले लिया, तब हमसे इन्हीं उपायों को अपनाने के लिए कहा जा रहा है। कोरोना प्रभावित देशों ने परस्पर दूरी बनाए रखने के लिए लाॅकडाउन कर लिया है। इस स्थिति में यातायात, कार्यालय, विद्यालय इत्यादि बंद कर दिए जाते हैं। स्वास्थ्य, पेयजल, खाद्य सेवाएं ही जारी रहती हैं। एक तरह की यह आपात स्थिति है। दुनिया की पहली इस तरह की तालाबंदी अमेरिका में 9/11 को हुए आतंकी हमले के बाद की गई थी। चूंकि कोरोना परस्पर दो व्यक्तियों के संपर्क या उसके द्वारा छू ली गई चीजों से फैलता हैं इसलिए इसकी कड़ी को तोड़ने के लिए सबसे कारगर व सरल उपाय दूरी बनाए रखना है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कोराना पर विषाणु नियंत्रण का अबतक टीका बना लेने में चिकित्सा विज्ञानियों को सफलता नहीं मिली है। यह सावधानी इसलिए और जरूरी हो जाती है क्योंकि चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इटली में ऐसे हालातों के निर्माण के बाद केवल 60 साल की उम्र से नीचे के संक्रमितों का ही इलाज किया जा रहा है। चीन ने इस संक्रमण पर नियंत्रण अपनी अधिकतम आबादी को घरों में कैद करके ही पाया है।
प्रधानमंत्री ने ताली व थाली बजाकर उनलोगों के प्रति कृतज्ञता प्रगट करने को कहा था, जो दिन-रात कोरोना से मुक्ति की लड़ाई में संघर्षरत हैं। इनमें चिकित्सक, नर्सें व स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं। पुलिस और मीडिया के लोग भी दिन-रात सेवाएं दे रहे हैं। इस संकट की घड़ी में हमें पता चल रहा है कि वास्तव में हमारे आदर्श कौन होने चाहिए। अनेक चिकित्साकर्मी लगातार डेढ़ माह से ड्यूटी पर हैं। आईटीबीपी और सेना के जवान क्वारंटाइन केंद्रों में तैनात हैं। जबकि धर्म और संप्रदाय के नाम पर जो स्थल कटुता फैलाते हैं, उनमें आवागमन सीमित हो गया है। अलबत्ता इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में भी जहां एक वर्ग अपने प्राणों की बाजी लगाकर नागरिकों को बचाने में लगा है, वहीं एक वर्ग ऐसा भी है, जो ऊंची कीमतों पर मास्क, दवाएं और खाद्य सामग्री बेच रहे हैं। नकली सेनेटाइजर भी बेचे जा रहे हैं। वहीं बाॅलीवुड गायिका कनिका कपूर ने लंदन से लौटने के बाद असलियत छिपाई और लखनऊ में सार्वजनिक कार्यक्रमों में भागीदारी कर सैकड़ों लोगों को संक्रमण के संदेह के घेरे में ला दिया। इस लिहाज से भारत में इस समय सबसे बड़ा संकट ऐसे लोगों की पहचान करना है, जो बीते दो माह के भीतर संक्रमण से प्रभावित देशों से लौटे हैं। राजस्थान सहित अन्य राज्यों में पर्यटकों के माध्यम से भी यह बीमारी फैली है। चीन में जब कोरोना खतरनाक स्थिति में था, यदि हम तभी चेत जाते तो भारत में हालात काबू में रहते। दरअसल चीन से छात्रों और यात्रियों के लौटने के बाद ही भारत में कोरोना का संकट घिर गया था। अब हालात यह हो गया है कि लगभग हर प्रांत से कोरोना के संक्रमितों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है। नतीजतन कोविड-19 पीड़ित मरीजों की संख्या 360 के ऊपर पहुंच गई है और पांच लोगों के इस वायरस ने प्राण ले लिए हैं।
बावजूद यह गनीमत है कि सामुदायिक स्तर पर कोरोना फैलने के संकेत नहीं मिले हैं। यदि इस वायरस का कन्युनिटी ट्रांसमिशन आरंभ हो जाता है तो संक्रमित रोगियों की संख्या अचानक बढ़ जाएगी। ऐसा होने पर हमें उपकरणों से लेकर दवाओं और आइसोलेटेड वार्डों तक की कमी का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल देश में प्रति 10 लाख व्यक्तियों पर एक व्यक्ति की जांच करने की जरूरत पड़ रही है। फिलहाल भारत में प्रतिदिन 8000 नमूनों के परीक्षण की क्षमता 150 प्रयोगशालाओं में है, जबकि अभी एकदिन में केवल 100 संदिग्धों की जांच के ही नमूने लिए जा रहे हैं। अलबत्त्ता कम्युनिटी ट्रांसमिशन के हालात यदि निर्मित हो जाते हैं तो कोरोना में एक 'सुपर स्प्रेडर' भी हो सकता है। मसलन उच्च संक्रमकता वाला एक संक्रमित व्यक्ति से ही कुछ समय के भीतर सैंकड़ों लोग संक्रमित हो सकते हैं। प्रसिद्ध अस्थि रोग विषेशज्ञ एवं शिवपुरी के मुख्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी डाॅ. अर्जुन लाल शर्मा का कहना है, 'भारत में फिलहाल माइल्ड अर्थात कम असरदार वायरस का प्रकोप है। लेकिन इस वायरस के साथ संकट यह है कि यह अपनी प्रकृति बदलने में सक्षम है। यदि यह अपनी आक्रामकता के चरम स्वरूप में आ जाता है तो इसपर काबू पाना मुश्किल होगा। इसीलिए भारतीय चिकित्सा एवं अनुसंधान परिषद् इसके स्वरूप पर निरंतर निगरानी रखे हुए है।'
भारत में ही नहीं पूरी दुनिया की जीवनशैली में जिस तरह से बदलाव आए हैं, उसने जहां मनुष्य की प्रतिरोधात्मक क्षमता घटाई है। औद्योगिक, प्रौद्योगिक विकास व बढ़ते शहरीकरण ने वायुमंडल को प्रदूषित कर दिया है। हृदय रोग, लकवा, मधुमेह, रक्तचाप, कैंसर और सांस संबंधी बीमारियां इसी दूषित जीवन शैली की देन हैं। हमारे आसपास जल, वायु व ध्वनि प्रदूषण इतने विस्फोटक हो गए हैं कि उनपर व्यावहारिक रूप में नियंत्रण किए बिना, रोगाणुजनित महामारियों पर नियंत्रण मुश्किल है। भारत जैसे पारंपरिक देश में धर्म से जुड़े जो स्वास्थ्य लाभ के उपाय हैं, उन्हें पंडे व पुजारियों ने अपने तत्कालिक लाभ के लिए धन कमाने व मृत्यु के बाद मोक्ष के उपायों में बदल दिया है। इस कारण ज्यादातर मंदिरों में शंख, घंटे व घड़ियालों का बजाया जाना या तो बंद हो गया है या फिर उनका मशीनीकरण हो गया है। गोया, जनता कर्फ्यू के दौरान ताली, थाली, घंटा, मंजीरों व शंख से जो सामूहिक ध्वनियां उत्सर्जित करने के समय जिस पवित्र व दिव्य प्रर्जा परिवेश में संचरित हुई, यही ऊर्जा व समुदाय का एकांतवास कोरोना से मुक्ति दिलाएगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
Top