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राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का बेजा विरोध

02/08/2019

रमेश ठाकुर 
देश की चिकित्सीय व्यवस्था बीते दो-तीन दिनों से चरमराई हुई है। मरीज बेहाल हैं। ओपीडी में हड़ताली डॉक्टरों ने ताले जड़ दिए हैं। अस्पताल सूने पड़े हैं। चिकित्सक अस्पतालों के बाहर धरने पर बैठे हुए हैं। मरीजों की दर्द से तड़पने की चीखें अस्पतालों से बाहर तक आ रही हैं। लेकिन चिकित्सक उन्हें सुनकर भी अनसुना कर रहे हैं। डॉक्टरों को भगवान का दूसरा रूप दिया गया है, लेकिन इस वक्त उनका रौद्र रूप देखने को मिल रहा है। तीमारदार उनसे हाथ जोड़कर मरीजों के इलाज करने की विनती कर रहे हैं। पर, उनका कलेजा नहीं पसीज रहा। चिकित्सकों की हड़ताल का पूरे देश में बुरा असर पड़ रहा है। स्थिति को देखकर केंद्र सरकार भी परेशान है। सरकार की तरफ से भी कोशिशें हो रही है, पर हड़ताली डॉक्टर मानने को राजी नहीं हैं। 
गौरतलब है कि देशभर के चिकित्सक इस समय मुखर होकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक 2019 का विरोध कर रहे हैं। हड़ताली डॉक्टरों को मनाने के लिए शुक्रवार सुबह खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन दिल्ली में डॉक्टरों से मिले। उनसे बातचीत की और हड़ताल वापस लेने के लिए काफी समझाया, लेकिन उनका प्रयास भी बेनतीजा रहा। चिकित्सक किसी भी सूरत में एनएमसी विधेयक लागू नहीं करना चाहते। बता दें, केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक 2019 के पारित करने के बाद से ही देशभर के डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। विधेयक के विरोध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने देशव्यापी हड़ताल की घोषणा का एलान कर दिया था। हड़ताल के चलते हिंदुस्तान के ज्यादातर अस्पतालों की ओपीडी सेवाएं बंद हो गईं हैं। इस बीच, सरकार ने गुरुवार को राज्यसभा में भी विपक्ष के विरोध के बावजूद इसे पारित करा लिया। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह देशभर में लागू हो जाएगा। कानून बन जाएगा   
लोभतंत्र के आगे लोकतंत्र कभी-कभी बौना साबित हो जाता है। अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी की जिन्दगी को दांव पर लगा देना, समझदारी नहीं, बल्कि कायरता की श्रेणी में आता है। इस वक्त चिकित्सक सिर्फ अपना भला देख रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं कि उनकी हड़ताल से दूसरों को कितनी तकलीफें हो रही हैं। देश के करीब तीन से चार लाख चिकित्सक इस समय हड़ताल पर हैं। हड़ताल के कारण मरीजों को भयंकर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आईएमए का साफ कह देना कि कोई भी चिकित्सक किसी मरीज को अपनी सेवा नहीं देगा, तुगलकी फरमान जैसा दिखाई पड़ता है। हड़ताल की आड़ में कहीं न कहीं सियासत भी होने लगी है। कई जगहों पर हड़ताली चिकित्सकों को विपक्षी दल भी अपना समर्थन देने लगे हैं। जबकि, कायदे से उनको समझाना चाहिए और काम पर लौटने की सलाह देनी चाहिए, लेकिन सियासी दल हड़ताल में भी राजनीति करने से नहीं चूक रहे। देशभर में एमबीबीएस की कुल 80 हजार सीटें होती हैं। इसमें आधी सीटें सरकारी कॉलेजों के लिए निर्धारित रहती हैं जिसमें छात्रों से बहुत कम फीस ली जाती है। एमसीआई के पास निजी कॉलेजों की फीस पर नियंत्रण का कोई अधिकार नहीं होता, लेकिन इस विधेयक में इसकी व्यवस्था की गई है। 
हड़ताली चिकित्सक एनएमसी विधेयक का विरोध क्यों कर रहे हैं? इस थ्योरी को भी समझना जरूरी है। दरअसल, अभी तक चिकित्सा शिक्षा, मेडिकल संस्थानों और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन से संबंधित काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया किया करती थी। अब केंद्र सरकार इसमें बदलाव चाहती है। चिकित्सकों को लगता है सरकार एमसीआई की शक्तियां कम करना चाहती है। चिकित्सा तंत्र को अपने कब्जे में लेना चाहती है। संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक 2019 पास हो चुका है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद एनएमसी विधेयक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह ले लेगा। बिल के तहत साढ़े तीन लाख नॉन मेडिकल लोगों को लाइसेंस देकर सभी प्रकार की दवाइयां लिखने और इलाज करने का कानूनी अधिकार प्रदान किया जाएगा। इसी का डॉक्टर विरोध कर रहे हैं।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से चिकित्सकों की मनमानी काफी हद तक रूकेगी। उनके काम करने के तरीकों पर सीधे सरकार की निगरानी हुआ करेगी। चिकित्सा तंत्र मौजूदा समय में सबसे ज्यादा कमाई करने का क्षेत्र बन गया है। गरीब आदमी के लिए इलाज कराना कोसों दूर होता जा रहा है। केंद्र सरकार इसी खाई को पाटने की कोशिश में है। सरकार लाइसेंस देकर सभी प्रकार की दवाओं की कीमत पर नियंत्रण करना चाहती है। लेकिन चिकित्सक नहीं चाहते राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग लागू हो। चिकित्सक अस्पतालों और अपने घरों में स्थित क्लीनिक दोनों जगहों पर महंगी दवा की आड़ में धन की कमाई करते हैं। अगर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अमल में आ गया, तो उनकी कमाई पर ताला पड़ जाएगा। 
एनएमसी को लेकर सरकार और चिकित्सकों में मतभिन्नता है। डॉक्टरों की मानें तो नए बिल से होमियोपैथिक व आयुर्वेदिक चिकित्सक भी अंग्रेजी दवा दे सकेंगे इससे झोलाछाप कल्चर को बढ़ावा मिलेगा। जो आम गरीब की जान से खिलवाड़ करने जैसा होगा। इससे न केवल चिकित्सा शिक्षा के मानकों में, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में भी गिरावट आएगी। रेजिडेंट चिकित्सक यह भी मानते हैं कि आयुष डॉक्टरों को दवाएं लिखने का अधिकार देने से आयुर्वेद व होम्योपैथी का महत्व भी कम होगा। दरअसल, चिकित्सकों के दोनों धड़ों में भी एनएमसी को लेकर एकमत नहीं है। दोनों में बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। बेशक डॉक्टरों को अपना कर्तव्य निभाते हुए नैतिकता का ख्याल रखना चाहिए। उन्हें मरीजों की परवाह करनी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 


 
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