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जनता कर्फ्यू बार-बार या लगातार

23/03/2020

आर.के. सिन्हा
रविवार को जनता कर्फ्यू के दौरान देशभर के करोड़ों लोगों ने एक अरसे बाद सुबह परिंदों के चहचहाने की आवाजें सुनीं। सच में कोरोना वायरस से भयभीत माहौल में पंछियों को देखना-सुनना सुखद अनुभव था। पर प्रलय की तरफ जाती दुनिया को बचाने के लिए अभी और कई "जनता कर्फ्यू" और "नेशनल लॉकडाउन" जरूरी होंगे। अभी इन बिन्दुओं पर सोचने-विचारने का वक्त ही नहीं है कि इन कठोर कदमों का देश की आर्थिक स्थिति पर कितना नकारात्मक असर होगा। फिलवक्त यह सवाल गौण है। आर्थिक स्थिति का अर्थ तभी है जब आप जीवित बचेंगे। हालांकि कुछ समझदार मित्र अब भी इस मसले को उठाते हुए सरकार को कोस रहे हैं। इस बीच, मुंबई में बसे पूर्वांचली मजदूरों का लाखों की तादाद में अपने गावों की ओर लौटना निश्चित रूप से चिंता का कारण है। उन्हें अभी धैर्य से काम लेना चाहिए। वे तो ऐसा करके सरकार के सामने अनावश्यक रूप से संकट ही पैदा कर रहे हैं।
बहरहाल, अभी लगभग पूरे विश्व में ही जीवन-मरण का प्रश्न पैदा हो गया है, सिर्फ भारतवासियों के लिए ही नहीं। जाहिर है, इस अभूतपूर्व स्थिति का भारत को भी डटकर मुकाबला करना ही होगा। इस लिहाज से किसी भी प्रकार की काहिली या लापरवाही पूरे देश के लिए बेहद खतरनाक सिद्ध हो सकती है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनता कर्फ्यू के आह्वान पर रविवार को पूरे देश में रखे गए जनता कर्फ्यू के टेस्ट में देश उत्तीर्ण हुआ है। मैंने बड़े-बड़े नेताओं को देखा। जे.पी. आन्दोलन में भी सक्रिय रहा I पर किसी के आह्वान का ऐसा अभूतपूर्व असर पहली बार देखा I जनता कर्फ्यू के चलते देशभर के लगभग 7 करोड़ व्यापारी और उनके 40 करोड़ कर्मचारी घरों पर ही रहे। इस दौरान सारे देश के छोटे-बड़े शहरों की सड़कों पर सन्नाटा छाया रहा। वे ही घरों से निकले जिनके पास कोई विकल्प नहीं था या जो सेना, पुलिस, रेलवे, मेडिकल, मीडिया, सुरक्षा सेवा जैसे पेशों से संबंध रखते हैं। यानी भारत ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई लड़ने का मन तो बना ही लिया है। अगर इसी संकल्प से इस लड़ाई को लड़ा गया तो विजय भी मिलेगी, कोरोना वायरस पराजित भी होगा। कोरोना वायरस के खतरे के आलोक में आईटी कंपनी के पेशेवरों से लेकर देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तक वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। यानी सब अपने को वक्त के साथ बदल रहे हैं, ढाल रहे हैं।' यह तो करना ही होगा। अब दूसरा कोई चारा बचा भी तो नहीं है। कोरोना के कारण सारी दुनिया डूबते हुए टाइटैनिक जहाज की तरह हो गई है। इसे तो हर हाल में बचाना ही होगा।
देश के लिए चुनौतीपूर्ण आने वाले दिन
कोरोना के खिलाफ लड़ाई को "संयम और संकल्प" से ही जीता जाएगा। बेशक आनेवाले कुछ दिन देश के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं। कहना न होगा कि इस दौरान संयम से ही देश एक बड़ी महामारी को परास्त करने में सफल हो जाएगा। पर चिंता की बात तो यह है कोरोना वायरस के खतरों से बेपरवाह सिंगर कनिका कपूर और मुक्केबाज मैरी कॉम जैसे तमाम सेलिब्रिटी कहे जाने वाले लोगों ने दूसरों की जान को संकट में डालने का कम किया है। इन हस्तियों से इस तरह की गैर-जिम्मेदराना हरकतों को करने की उम्मीद तो किसी ने नहीं की थी। बॉलीवुड सिंगर कनिका कपूर कोरोना वायरस संक्रमित होने के बाद अब लखनऊ में "क्वारैंटाइन" हैं और अच्छी मेडिकल केयर के बीच उनका इलाज भी चल रहा है। वे कोरोना वायरस संक्रमित होने के बावजूद एक नहीं चार-चार संगीत कार्यक्रमों में पहुंच गई थीं।
अब जरा बॉक्सर मैरी कॉम की भी बात कर लें। उन्होंने भी क्वारैंटाइन प्रोटोकॉल तोड़ा और 14 दिनों के आइसोलेशन पृथकता से पहले ही राष्ट्रपति भवन द्वारा आयोजित सांसदों के अल्पाहार कार्यक्रम में शामिल हो गईं। वे राष्ट्रपति भवन में विगत 18 मार्च को आयोजित कार्यक्रम में सांसदों के साथ मौजूद थीं जबकि मैरी कॉम जॉर्डन में ओलंपिक क्वालिफायर राउंड के बाद 13 मार्च को ही भारत लौटी थीं। डब्ल्यूएचओ के प्रोटोकॉल के मुताबिक मैरी कॉम को 27 मार्च तक आइसोलेशन में रहना था।
मैरी कॉम मेरी मित्र और साथ ही राज्यसभा सांसद भी हैं। वह राष्ट्रपति भवन में ब्रेकफास्ट मीटिंग में पता नहीं क्यों चली गईं? एयरपोर्ट पर किसी ने उन्हें कुछ बताया या नहीं? कनिका कपूर और मैरी कॉम जैसी शख्सियतें भी जब घोर गैर-जिम्मेदारी का परिचय देंगी तो फिर क्या होगा। न मालूम इन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास कब होगा। क्या इन्हें किसी ने बताया नहीं था कि कोरोना वायरस संक्रमण रोकने के लिए सरकार ने विदेश से लौटने वाले हर यात्री के लिए 14 दिनों तक क्वारैंटाइन में रहना अनिवार्य कर दिया है। लेकिन, गायिका कनिका कपूर और बॉक्सर एमसी मैरी कॉम ने इस नियम को तोड़ा। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से पोस्ट की गई चार तस्वीरों में से एक में मैरी कॉम दूसरे सांसदों के साथ देखी जा सकती हैं। फोटो के शीर्षक के तौर पर लिखा था- राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सुबह उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सांसदों के लिए राष्ट्रपति भवन में नाश्ते का कार्यक्रम आयोजित किया। बॉलीवुड गायिका कनिका कपूर के संपर्क में आनेवाले भाजपा सांसद दुष्यंत सिंह भी उसी दिन राष्ट्रपति भवन में मौजूद थे। उन्होंने भी अब सेल्फ आइसोलेशन में रहने की घोषणा की है।
जैसा कि मैं पहले कह रहा था कि यह समझ नहीं आ रहा कि मुंबई में रहने वाले बिहारी श्रमजीवी अचानक अपने घर वापस जाने के लिए मारामारी क्यों कर रहे हैं। वे जिन महानगरों में हैं, वहां तो चिकित्सा सुविधा गावों से कहीं ज्यादा बेहतर है। वे बिना जाँच कराये वापस लौटकर खतरा पैदा कर रहे हैं। वे एक तरह से कोरोना वायरस को अपने साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा लेकर जा रहे हैं। रविवार को ही खबर आई कि पटना में एक 38 साल के युवक की कोरोना वायरस का शिकार होने के कारण मौत हो गई। वह क़तर से अपने गाँव मुंगेर लौट रहा था। कुछ ज्ञानी मित्र कह रहे हैं कि मुंबई से पूर्वांचली श्रमजीवी इसलिए घरों की तरफ जा रहे हैं क्योंकि मायानगरी में तो कुछ दिनों के बाद खान-पान के लाले पड़ जाएंगे। हालांकि यह बात रत्तीभर भी सहीं नहीं है। आखिर हर साल पूर्वांचली मजदूर दशहरें से लेकर छठ के बीच 20-25 दिनों के लिए अपने गांव वापस तो आते ही हैं। क्या इतने दिनों तक काम न करने के कारण उनके सामने भूखों मरने के हालात पैदा होते हैं? नहीं। दिल्ली के चावड़ी बाजार, अनाज मंडी, लाहौरी गेट वगैरह में हजारों पूर्वांचली मजदूर थोक व्यापारियों के पास काम करते हैं। इन सबके रहने की व्यवस्था इनके मालिकों की तरफ से गोदाम के आसपास ही कर दी जाती है। उधर ही ये अपना भोजन भी पका लेते हैं। मुंबई में भी कमोबेश यही स्थिति होनी चाहिए। फिर भी ये पूर्वांचल लौटने के लिए न जाने क्यों परेशान हैं।
खैर, यह हम सबको समझना होगा कि कोरोना के रोगियों का इलाज भी हो रहा है। वे इलाज के बाद अपने घरों को लौट रहे हैं। इसलिए कोरोना से इतना भी घबराने की जरूरत नहीं है। हां, पर इससे बचने के लिए जो भी संभव उपाय विशेषज्ञ बता रहे हैं, उनका तो पालन करना ही होगा। इस बाबत कोताही जानलेवा साबित हो सकती है। करोना से लड़ने के लिए देश दो या तीन हफ्ते तक शायद पूरी तरह बंद कर देना पड़े। इससे 14 दिनों तक जीवित रहने वाला या कोविड-19 वायरस अपने-आप नष्ट हो जायेगा, ऐसा वैज्ञानिक कह रहे हैं। तो भाइयों, वही "करो ना।" रुके क्यों हो। मेहनत से आर्थिक मजबूती तो हम फिर हासिल कर ही लेंगे।
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं।)


 
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