लेख

Blog single photo

क्यों खत्म नहीं होती मैला ढोने की प्रथा

16/03/2020

सियाराम पांडेय 'शांत'
कांग्रेस सांसद जयकुमार ने लोकसभा में वर्षों से चली आ रही मैला ढोने की प्रथा खत्म किए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यह अमानवीय प्रथा साल दर साल भारी-भरकम बजट पेश किए जाने के बाद भी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि संसद में यह मामला पहली बार उठा। इससे पहले भी चर्चा हुई है। कानून तक बने हैं लेकिन अनुपालन स्तर पर नतीजा ढाक के तीन पात वाला रहा है। भारत में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने के लिए पहला कानून 1993 और दूसरा 2013 में बना था, जिसके मुताबिक नाले-नालियों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों की सेवाएं लेने पर प्रतिबंध है। इसके बाद भी लोकसभा में इस तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं तो स्थिति की भयावहता का पता चलता है।
न्यायपालिका के स्तर पर भी समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देशित किया जाता रहा है कि सरकार मैला ढोने वालों को चिह्नित कर उनका पुनर्वास सुनिश्चित करे। सुस्पष्ट कानून और अदालती निर्देशों के बाद भी मैला ढोने वालों की संख्या घटने की बजाय बढ़ती जा रही है। वर्ष 2018 में डैलबर्ग एसोसिएट्स के शोध पर गौर करें तो उस समय तक भारत के विभिन्न शहरी इलाकों में 50 लाख सफाईकर्मी काम कर रहे थे। उक्त सफाईकर्मी मानव अवशेष के सीधे संपर्क में आते हैं। इनमें से अधिकांश यह काम बगैर किसी सुरक्षा यंत्र के करते हैं जिसकी वजह से खतरनाक गैस जैसे अमोनिया, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाय आक्साइड के ये सीधे संपर्क में आते हैं, जो कई भयानक बीमारियों का कारण बन जाती है। सीवर सफाई के दौरान दम घुटने से मरने या बेहोश होने वालों की भी बड़ी तादाद है। ज्यादातर सफाईकर्मी या तो ठेके पर रखे जाते हैं या उनकी नौकरी अस्थायी होती है। इस वजह से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी लाभों से वंचित रहना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में हर पांचवें दिन तीन सफाइकर्मियों की मौत हो रही है।
अंतर-मंत्रालयी कार्यबल ने 2018 में जो आंकड़ा जारी किया था, वह दिल दहलाने वाला है। उसके अनुसार, भारत के 12 राज्यों में 53,236 लोग मैला ढोने का कार्य कर रहे थे। वैसे यह आंकड़ा वर्ष 2017 के आंकड़े 13 हजार से चार गुना अधिक था। मौजूदा आंकड़ा क्या है, इसे तो जिम्मेदार तंत्र ही बेहतर बता सकता है। हालांकि यह आंकड़ा देश के 121 जिलों पर ही आधारित है। शेष 479 जिलों से तो आंकड़े प्राप्त ही नहीं किए जा सके। इस आंकड़े के मुताबिक सर्वाधिक मैला ढोने वाले 8016 लोग मध्य प्रदेश में थे। इस लिहाज से राजस्थान दूसरे, महाराष्ट्र तीसरे और उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर था। उत्तर प्रदेश में मैला ढोने वालों की संख्या 28,796 थी।
वर्ष 1912 में मनमोहन सरकार के केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इस कुप्रथा के खिलाफ मैला मुक्ति यात्रा शुरू की थी जो भोपाल से शुरू होकर दिल्ली में समाप्त हुई थी लेकिन इसके नतीजे सिफर रहे। उस समय जयराम रमेश ने बताया था कि वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक सिर पर मैला ढोने के काम में तकरीबन आठ लाख लोग लगे हुए हैं, जिनमें सर्वाधिक महिलाएं हैं। इसके उन्मूलन के लिए बनाया गया कानून लोगों को मैला ढोने से मुक्ति दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। लिहाजा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास विधेयक 2011 लोकसभा में पेश किया था। विधेयक में लोगों को सिर पर मैला ढोने, सीवरों और सेप्टिक टैंक की सफाई जैसे खतरनाक कार्यों से मुक्ति दिलाने की सिफारिश की गई थी। विधेयक में स्थानीय प्राधिकरण को अस्वच्छ शौचालयों का सर्वेक्षण कराने और उन्हें ध्वस्त कराने के लिए मालिकों को नोटिस जारी करने का अधिकार दिया गया था। इतना सब करने के बाद भी अगर कांग्रेस के किसी सांसद को इस प्रथा के उन्मूलन की मांग करनी पड़ रही है तो इसका मतलब साफ है कि इस समस्या के समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रयास हुए नहीं।
फिल्म अभिनेता आमिर खान भी अपने एक टीवी शो 'सत्यमेव जयते' में इस सामाजिक कुरीति के उन्मूलन की मांग कर चुके हैं। नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन द्वारा 18 राज्यों के 170 जिलों में कराए गए सर्वे में 86,528 लोगों ने खुद को मैला ढोने वाला बताया और रजिस्ट्रेशन करवाया था। यह और बात है कि सरकारी स्तर पर 41,120 लोगों को ही मैला ढोने वाला माना गया था। बिहार, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और तेलंगाना जैसे राज्यों ने तो यह मानने से ही इनकार कर दिया कि उनके यहां एक भी मैनुअल स्कैवेंजर है भी। इसके विपरीत अगर नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करें बिहार के 16 जिलों में 4,757 लोगों ने खुद को न केवल मैला ढोने वाला बताया था बल्कि इस रूप में अपना पंजीकरण भी कराया था। हरियाणा के पांच जिलों में 1,221 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। जम्मू-कश्मीर के सात जिलों में 254 और तेलंगाना के दो जिलों में 288 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। जिन 170 जिलों में सर्वे कराया गया उसमें से 82 जिलों ने दावा किया कि उनके यहां एक भी मैला वाहक नहीं है।
इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए तथापि यह न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी जड़ें जमाए रही। महात्मा गांधी ने 1917 में कहा था कि साबरमती आश्रम के लोग अपने शौचालय खुद ही साफ करेंगे। महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने 1948 में मैला ढोने की प्रथा का विरोध किया और उसने इसे खत्म करने की मांग की थी। ब्रेव-कमेटी ने 1949 में सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थितियों में सुधार के लिए सुझाव दिए थे। मैला ढोने के हालातों की जांच के लिए बनी एक अन्य समिति ने 1957 में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का सुझाव दिया था। राष्ट्रीय मजदूर आयोग ने 1968 में सफाईकर्मियों और मैला ढोने वालों’ के काम करने की स्थितियों के अध्ययन के लिए एक कमेटी का गठन किया था। इन सभी समितियों ने मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और सफाईकर्मियों के पुनर्वास का सुझाव दिया था। इन समितियों के कुछ सुझावों को स्वीकार करने के साथ देश ने मैला ढोने का काम और शुष्क शौचालय निर्माण रोकथाम कानून 1993 कानून बनाया। भारत के ‘नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी)’ की 2003 की रिपोर्ट बताती है कि केवल 16 राज्यों ने ही इस कानून को अपनाया और किसी ने भी इसे लागू तक नहीं किया।
श्रम मंत्रालय के ‘कर्मचारी क्षतिपूर्ति कानून’ को केवल 6 राज्यों ने लागू किया है। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) ने 2007 तक मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य तय किया था। बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के मुताबिक भारतीय रेल, जो वास्तव में मैला ढोने के लिए कर्मचारियों को रखता है, उसने 2 लाख 40 हजार करोड़ की अपनी एकीकृत रेलवे आधुनिकीकरण योजना में मैला ढोने के खात्मे के प्रावधान को शामिल नहीं किया है। इधर उसने जैविक शौचालय जरूर बनाने आरंभ किए हैं लेकिन इतना काफी नहीं है।
अब जबकि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है, जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। इसमें संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही स्वच्छताकर्मियों की समस्यायों के निदान को लेकर गंभीर है। इस मुदृदे पर सर्वानुमति, सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास हासिल करने की जरूरत है। 1917 से चली आ रही मांग अगर 2020 में भी पूरी न हुई तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
Top