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देश में सक्रिय विदेशी संस्थाओं की नीतियां चिन्ताजनक

12/09/2019

मनोज ज्वाला

मारे देश में अनेक ऐसी विदेशी-मजहबी संस्थाएं सक्रिय हैं, जिनकी नीतियां हमारी सामाजिक समरसता व राष्ट्रीय एकता-अखण्डता के लिए अत्यन्त चिन्ताजनक हैं। इन संस्थाओं की कारगुजारियों के कारण यहां कभी 'असहिष्णुता' का ग्राफ ऊपर की ओर उठ जाता है, तो कभी 'दलितों की सुरक्षा' का ग्राफ नीचे की ओर गिरा हुआ बताया जाता है। ये संस्थाएं भिन्न-भिन्न प्रकृति और प्रवृति की हैं। कुछ शैक्षणिक-अकादमिक हैं, जो शिक्षण-अध्ययन के नाम पर भारत के विभिन्न मुद्दों पर तरह-तरह का शोध-अनुसंधान करती रहती हैं; तो कुछ संस्थाएं ऐसी हैं, जो इन कार्यों के लिए अनेकानेक संस्थाएं खड़ी कर उन्हें साध्य व साधन मुहैय्या करती - कराती हुई विश्व-स्तर पर उनकी नेटवर्किंग भी करती हैं। भारत-मूल के एक अमेरिकी लेखक राजीव मल्होत्रा की पुस्तक 'ब्रेकिंग इण्डिया' में इन संस्थाओं की गतिविधियों का विस्तार से खुलासा हुआ है, जिसके अनुसार 'डी.एफ.एन.' (दलित फ्रीडम नेटवर्क) संयुक्त राज्य अमेरिका की एक ऐसी संस्था है, जो भारत में दलितों के अधिकारों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें भड़काने के लिए विभिन्न भारतीय-अभारतीय संस्थानों का वित्त-पोषण और नीति-निर्धारण करती है। इसके कर्ताधर्ता डॉ. जोजेफ डिसुजा नामक अंग्रेज हैं, जो 'ए.आई.सी.सी.' (आल इण्डिया क्रिश्चियन काउंसिल) के भी प्रमुख हैं। डी.एन.एफ. के लोग खुद को भारतीय दलितों की मुक्ति का अगुवा होने का दावा करते हैं। डी.एफ.एन. की कार्यकारिणी समिति और सलाहकार बोर्ड में तमाम वैसे ही लोग हैं, जो हिन्दुओं के धर्मान्तरण एवं भारत के विभाजन के लिए काम करने वाली विभिन्न ईसाई मिशनरियों से सम्बद्ध हैं। वस्तुतः धर्मान्तरण और विभाजन ही डी.एफ.एन. की दलित-मुक्ति परियोजना का गुप्त एजेण्डा है, जिसके लिए यह संस्था भारत में दलितों के उत्पीड़न की इक्की-दुक्की घटनाओं को भी बढ़ा-चढ़ाकर दुनियाभर में प्रचारित करती है तथा दलितों को सवर्णों के विरूद्ध विभाजन की हद तक भड़काने के निमित्त विविध विषयक 'उत्पीड़न साहित्य' के प्रकाशन-वितरण व तत्सम्बन्धी विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती-कराती है। डी.एफ.एन. और इससे जुड़ी अम्बेडकरवादी भारतीय संस्थाओं की सक्रियता का आलम यह है कि इनका नियमित पाक्षिक प्रकाशन 'दलित वायस' भारत में पाकिस्तान की तर्ज पर एक पृथक 'दलितस्तान' राज्य की वकालत करता रहता है। डी.एफ.एन. को अमेरिकी सरकार का ऐसा वरदहस्त प्राप्त है कि वह अमेरिका स्थित दलित विषयक विभिन्न सरकारी आयोगों के समक्ष भारत से दलित आन्दोलनकारियों को ले जाकर भारत-सरकार के विरूद्ध गवाहियां भी दिलाता है। डी.एफ.एन. दलितों को भड़काने वाली राजनीति करने के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के बहुसंख्य समाज के विरूद्ध दलित-उत्पीड़न और उसके निवारणार्थ विभाजन की वकालत-विषयक शोध-अनुसंधान के लिए शिक्षार्थियों व शिक्षाविदों को भी फेलोशिप और छात्रवृत्ति प्रदान करता है। इसने कांचा इलाइया नामक उस तथाकथित भारतीय दलित चिंतक को उसकी पुस्तक 'ह्वाई आई एम नॉट ए हिन्दू ' के लिए पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप प्रदान किया है, जिसमें अनुसूचित जातियों-जनजातियों-ईसाइयों और पिछड़ी जाति के लोगों को अम्बेडकर का हवाला देते हुए सवर्णों के विरूद्ध सशस्त्र युद्ध के लिए भड़काया गया है। मालूम हो कि भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे राष्ट्रवादी नेता थे जो अपने हिन्दू-समाज की सवर्ण जातियों के लोगों द्वारा अस्पृश्यता के नाम पर घोर प्रताड़ना झेल चुके होने के बावजूद तत्कालीन ईसाई-मिशनरियों और मुस्लिम-संगठनों  द्वारा प्रेषित  धर्मान्तरण-प्रस्तावों को यह कहकर ठुकराते रहे थे कि 'धर्मान्तरण तो राष्ट्रान्तरण है'। अंततः उन्होंने स्वयं 'बौद्ध पंथ' में दीक्षित हो कर धर्मान्तरण के लिए विवश अथवा उत्सुक लोगों को भी भारत-भूमि से बाहर के किसी भी अभारतीय धर्म-पंथ-मजहब में दीक्षित नहीं होने का संदेश दिया। किन्तु, आज उन्हीं अम्बेडकर के नाम पर दलितों को उनके राष्ट्रीय आदर्शों के विपरीत हिन्दू समाज-धर्म के विरूद्ध भड़काकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वाले लोग धर्मान्तरणकारी चर्च-मिशनरियों की भारत-विरोधी विखण्डनकारी योजनाओं के हस्तक बने हुए हुए हैं। पी.आई.एफ.आर.ए.एस. (पॉलिसी इंस्टीच्यूट फॉर रिलीजन एण्ड स्टेट) अर्थात 'पिफ्रास' अमेरिका की एक ऐसी संस्था है, जिसका चेहरा तो समाज और राज्य के मानवतावादी लोकतान्त्रिक आधार के अनुकूल नीति-निर्धारण को प्रोत्साहित करने वाला है, किन्तु इसकी खोपड़ी में भारत की वैविध्यतापूर्ण एकता को खण्डित करने और हिन्दुओं (दलितों) के धर्मान्तरण की योजनाएं घूमती रहती हैं। इसके स्वरुप की वास्तविकता यह है कि इसका कार्यपालक निदेशक जॉन प्रभुदोस नामक एक ऐसा व्यक्ति है, जो धर्मान्तरणकारी कट्टरपंथी चर्च-मिशनरी संगठनों के गठबन्धन एफ.आई.ए.के.ओ.एन.ए. (द फेडरेशन आफ इण्डियन अमेरिकन क्रिश्चियन आर्गनाइजेसंस ऑफ नार्थ अमेरिका) अर्थात 'फियाकोना' का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये दोनों संगठन एक ओर विश्व-मंच पर भारत को 'मुस्लिम-ईसाई अल्पसंख्यकों का उत्पीड़क देश' के रुप में घेरने की साजिश करते रहते हैं, तो दूसरी ओर भारत के भीतर नस्ली भेदभाव एवं सामाजिक फूट पैदा करने के लिए विभिन्न तरह के हथकण्डे अपनाते रहते हैं।
'पिफ्रास' का एक सदस्य सी. रॉबर्ट्सन अमेरिकी सरकार के विदेश सेवा संस्थान से सम्बद्ध है, जो 'अमेरिकन नेशनल एण्डाउमेण्ट ऑफ ह्यूमैनिटिज' नामक संस्था के आर्थिक सहयोग से भारत में रामायण के राम को नस्लवादी, महिला उत्पीड़क व मुस्लिम-विरोधी बताने के लिए बहुविध कार्यक्रमों का आयोजन कराता है। इन दोनों अमेरिकी संस्थाओं की भारत-विरोधी विखण्डनकारी गतिविधियों का आलम यह है कि 'पिफ्रास' ने 'यूनाइटेड मेथोडिस्ट बोर्ड ऑफ चर्च एण्ड सोसाइटी' और 'द नेशनल काउन्सिल ऑफ चर्चेज ऑफ क्राइस्ट इन द यू.एस.ए.' के सहयोग से आयोजित एक कार्यक्रम में मनमोहन सरकार की सोनिया-प्रणीत राष्ट्रीय सलाहकर परिषद के सदस्य जॉन दयाल की पहल पर यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया था कि 'भारत में अल्पसंख्यक अपनी सुरक्षा और अपने प्रति किये जाने वाले अपराधों के मामले में अपराधियों को दण्डित करने के लिए भारतीय राज्य पर भरोसा नहीं कर सकते'। इसी तरह से डी.एफ.एन. एक तरफ भारत के भीतर बहुसंख्यक समाज के विरूद्ध दलितों और अल्पसंख्यकों को भड़काकर विखण्डन के दरार को चौड़ा करने में लगी हुई है,  तो दूसरी तरफ भारत के बाहर वैश्विक मंचों पर भारतीय राज-व्यवस्था को अक्षम, अयोग्य व पक्षपाती होने का दुष्प्रचार कर अमेरिका के हस्तक्षेप का वातवरण तैयार करने में भी सक्रिय है। ऐसी एक नहीं अनेक संस्थाएं हैं, जो भिन्न-भिन्न तरह के मुद्दों को लेकर भारत के विरूद्ध अलग-अलग मोर्चा खोली हुई हैं। किन्तु, वैश्विक स्तर पर एक संगठित नेटवर्क के तहत उन सबका उद्देश्य भारत के विखण्डन की जमीन तैयार करना एवं इसे वेटिकन सिटी-निर्देशित व अमेरिका-शासित अघोषित 'श्वेत-साम्राज्य'  के अधीन करना है। गौरतलब है कि दलितों के नाम पर संचालित इन तमाम संस्थाओं-संगठनों के संचालकों में एक भी दलित नहीं है। इन्हें भारत के दलितों की ऐतिहासिक सामाजिक पृष्ठभूमि से भी इनका कोई लेना-देना नहीं है। दलित-मामलों को उभारने के पीछे इनके दो मकसद हैं- पहला, दलितों का धर्मान्तरण और  दूसरा- भारत का पुनर्विभाजन। 'दलित-मुक्ति' की इनकी जो परिभाषा है, वह वास्तव में सनातन-हिन्दू-वैदिक धर्म से दलितों को अलग कर देना और ईसाइयत के बंधन में बांध देना ही है। जिसे किसी भी कोण से 'मुक्ति' नहीं कहा जा सकता है। दलितों की हालत के परिप्रेक्ष्य में उनकी 'मुक्ति' का वास्तविक मतलब तो दलितों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से उनका मुक्त होना अथवा उन्हें मुक्त करना है, जिसके बाबत इन संस्थाओं के पास न तो कोई योजना है न कोई विचार। ऐसे में इन संगठनों की ऐसी सक्रियता हमारी सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से अत्यन्त चिन्ताजनक है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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