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दिल्ली हिंसा का सच

16/03/2020

दिल्ली हिंसा का सच

अवधेश कुमार

वास्तव में जिस ढंग की हिंसा, उपद्रव और आगजनी दिल्ली में हुई है उसे निस्संदेह, भुला पाना आसान नहीं होगा। हालांकि 26 फरवरी आते-आते हालात काबू में आ गए। हिंसा और उपद्रव थम गया। लेकिन दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाके में उपद्रव और हिंसा का इतने भयावह अवस्था में पहुंचना तथा इस पर काबू पाने में इतना समय लगना चिंताजनक है। तीन दर्जन से ज्यादा लोग मौत के घाट उतार दिए गए, तीन सौ से ज्यादा घायल हुए तथा करोड़ों की संपत्ति स्वाहा हो गई। बाजार के बाजार बुरी तरह जले पड़े हैं। सैंकड़ों वाहन, घर, पता नहीं और क्या- क्या हिंसा और आगजनी के तांडव में भस्मीभूत हो गए। हालांकि ऐसी भयावह स्थिति पैदा होनी ही नहीं चाहिए थी। हिंसा का विस्तार भजनपुरा से लेकर जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, चांदबाग, गोकुलपुरी आदि क्षेत्रों तक रहा। यह इतना बड़ा इलाका नहीं था जहां साजिशकर्ताओं की साजिशों को ध्वस्त कर हालात को बिगड़ने से न रोका जा सके। 22 फरवरी को हालात बिगड़ने के संकेत मिलने लगे थे। शाहीनबाग धरना की तरह दिल्ली के कई स्थानों पर सड़क घेरकर धरना देने की खबर आने लगी थी। जाफराबाद मेट्रो स्टेशन की सड़क को घेरकर धरना देने की तैयारी जिस समय शुरू हुई उसी समय उसे रोका जाना चाहिए था। आरंभ में लोगों की संख्या कम थी। शाहीनबाग की तरह महिलाएं धीरे-धीरे यहां भी आईं लेकिन पता नहीं दिल्ली पुलिस ने उसे रोकने की कार्रवाई क्यों नहीं की।

राजधानी दिल्ली में हिंसा रुकने के बाद तबाही की जो तस्वीरें सामने आ रहीं हैं उनसे पता चलता है कि इस हिंसा और आगजनी को बहुत ही सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। बिना पूर्व तैयारी के इतना भयावह विनाश संभव ही नहीं था। पूरी की पूरी सड़कें ईटों को तोड़कर बनाए गए पत्थरों तथा अन्य हिंसक व ज्वलनशील सामग्रियों के अवशेषों से पटा है। जिस तरह आम आदमी के एक पार्षद की पांच मंजिला इमारतों के छतों से लेकर नीचे तक ईटों के रोड़े, पेट्रोल बम, तेजाब, गुलेल आदि भारी मात्रा में मिल रहे हैं उनसे बड़ा प्रमाण इस बात का हो ही नहीं सकता कि इसकी तैयारी काफी दिनों से की जा रही थी। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि वाहनों से ईटें आदि लाए जा रहे थे। अभी तो एक छत से इतनी सामग्रियां मिलीं हैं। पता नहीं कितनी छतों से कहां-कहां ऐसी ही हिंसा और विनाश की खतरनाक सामग्रियां मिलें। दिल्ली पुलिस की दो विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित हो गई है। उसकी जांच के साथ साजिशों का भयावह सच सामने आएगा। अनेक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरों से लेकर ड्रोंनों तक में छतों पर रखी गई सामग्रियों तथा हिंसा करने वालो की तस्वीरें कैद हैं। इससे काफी लोग पकड़ में आएंगे। एक-एक छत पर और घर में कई-कई सौ इकट्ठे होकर हमला करें इसका मतलब ही है कि सब कुछ पहले से तयशुदा षडयंत्र के तहत हुआ।

जिस समय वहां मंच बन रहा था पुलिस कम संख्या में थी। बाद में बढ़ी, पर यह समझ से परे है कि उसने सड़क को कैसे घेरे जाने दिया। उसके साथ चांदबाग, बाबरपुर आदि जगहों से भी सड़क पर धरना आरंभ हो गया। जाहिर है, इन धरनों को आयोजित कराने वालों का कुछ उद्देश्य था। वे दिल्ली में अस्त-व्यस्तता पैदा करना चाहते थे। आरंभ में इनको सफलता मिलती भी दिखी। यह तो संभव ही नहीं है कि ऐसी योजना के विरुद्ध दूसरी ओर गुस्सा पैदा न हो। शाहीनबाग धरना को क्रांतिकारी साबित करने में लगे लोग यह भूल रहे थे कि जो कुछ यहां वे बोल रहे थे दिल्ली से देश भर में एक बड़े समूह के अंदर विपरीत प्रतिक्रिया हो रही थी। लोगों को लग रहा था कि आखिर यह कौन-सा तरीका है कि आप सड़क घेरकर बैठ जाएं, महिलाओं को आगे कर दें और कहें कि यह हमारा अधिकार है। जाफराबाद और अन्य जगहों के धरने की खबर जैसे-जैसे फैली, लोग इसके समानांतर इकट्ठे होने लगे। मौजपुर में कुछ समय के लिए धरना दिया भी गया और वहां की प्रतिक्रिया भी लोगों ने चैनलों के माध्यम से लाइव सुनी। यह वह अंतिम समय था जब दिल्ली पुलिस को बिल्कुल अपने तेवर में आ जाना चाहिए था। अगर वह अपने तेवर में आ जाती, जाफराबाद सहित अन्य धरनों को खत्म कर देती तथा सभी संवेदनशील इलाकों में पर्याप्त पुलिस बल उतार दिया जाता तो स्थिति संभल जाती।

यह दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारियों का दायित्व था कि वे केन्द्र सरकार को सही सूचना देकर आवश्यकतानुसार केन्द्रीय सशस्त्र बल की मांग करते। ऐसा न करने का अर्थ ही है कि उन्हें इसके सामनांतर हिंसा की व्यापक तैयारी की बिल्कुल सूचना नहीं थी या वे आसन्न खतरा देखते हुए भी इतनी बड़ी अनहोनी को भांप नहीं सके। सुरक्षा व्यवस्था में मुख्य भूमिका खतरे के सही आकलन का होता है। अगर आपने आने वाले खतरे को सही तरीके से भांप लिया तो फिर आप पूर्वोपाय के कदम उठाते हैं। अगर नहीं भांपे तो स्थित आपके हाथों से निकल जाती है। जब तक आप संभलेंगे तब तक देर हो चुकी होती है। यही दिल्ली में हुआ। आखिर इतनी तैयारी होती रही और दिल्ली पुलिस की खुफिया को इसकी भनक तक नहीं लगी! कुछ बातों का तो अनुमान होना ही चाहिए था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दो दिवसीय यात्रा को ध्यान में रखते हुए ये शक्तियां अस्तव्यस्तता पैदा करने की कोशिश करेंगी इसका आभास होना ही चाहिए था। व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन के साथ हिंसा भी की जा सकती है इसका अंदेशा पहले से था। जो दिल्ली पुलिस दिसंबर में जामिया की हिंसा देख चुकी हो उसे आभास नहीं हो कि दोबारा वैसा या उससे बड़ा करने की साजिश हो सकती है तो फिर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।

25 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने उत्तर पूर्वी जिले के चार थाना क्षेत्रों मौजपुर, जाफराबाद, करावल नगर और बाबरपुर में कμर्यू लगा दिया। देखते ही गोली मारने का आदेश जारी हुआ। दिल्ली पुलिस ने कई स्थानों पर μलैग मार्च किया। केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल की 35 कपंनियां उतारीं गईं। अब तो इनकी संख्या 100 से उपर हो चुकी है। यही काम पहले होना चाहिए था। अगर 23 फरवरी को ये व्यवस्थायेंं हो जातीं तो दिल्ली के इस पूरे इलाके को बचाया जा सकता था। दिल्ली पुलिस का एक कांस्टेबल शहीद हो गया, एक आईबी अधिकारी को भी पकड़कर मार दिए जाने की पुष्टि हो गई है, अनेक पुलिस वाले घायल हो गए। गंभीर रूप से घायल होने वालों में शाहदरा के डीसीपी अमित शर्मा जैसे बड़े अधिकारी भी शामिल थे। इससे पता चलता है कि हिंसा की कैसी तैयारी थी। पत्थरबाजी के साथ गोलियां चलने लगीं। फिर आगजनी। भजनपुरा में एक पेट्रौल पंप जलाने के साथ कई वाहनों और दूकानों को आग के हवाले करने की खबर ने करंट का काम किया और पूरी स्थिति हाथ से निकल गई।

दिल्ली हिंसा का घटनाक्रम

  • 19 फरवरी, 2020 शाहीन बाग पहुंचे वार्ताकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वार्ताकार संजय हेगड़े, साधना रामचंद्रन और वजाहत हबीबुल्ला शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए पहुंचे। वार्ताकार ने चार दिनों तक प्रदर्शनकारियों से जाकर बात की। उनकी बातें सुनी और उन्हें समझाया भी
  • 22 फरवरी, 2020 जाफराबाद में धरना प्रारंभ दिल्ली के जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास 22 फरवरी की रात को मुस्लिम महिलाएं नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ धरने पर बैठीं। धीरे-धीरे वहां महिलाओं का हुजूम बढ़ता गया, जिसके बाद भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई। प्रदर्शन के चलते लोगों के आवागमन और ट्रैफिक व्यवस्था पर असर पड़ रहा था।
  • 23 फरवरी 2020 कपिल मिश्रा का भाषण भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने डीसीपी की मौजूदगी में पुलिस से कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जाने तक अगर प्रदर्शनकारियों को वहां से नहीं हटाया गया तो इसके बाद वह पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। उसी रात से ही जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास पथराव की छिटपुट घटनाएं सामने आने लगी।
  • 24 फरवरी, 2020 हिंसा का भयानक रूप एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पहुंचे, वहीं दूसरी तरफ राजधानी दिल्ली में हिंसा बढ़ने लगी। भजनपुरा, गोकुलपुरी, चांदबाग, ब्रह्मपुरी समेत इसके आसपास के इलाकों में सीएए विरोधी और समर्थक आमने-सामने दिखे। देखते-देखते हिंसा ने भयानक रूप ले लिया।
  • 24 फरवरी, 2020 हेड कांस्टेबल रतनलाल की मौत इस दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतनलाल की मौत हो गई। कई अन्य लोगों की भी जान चली गई। दिल्ली हिंसा को देखते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने देर रात अधिकारियों के साथ बैठक की। इस बैठक में दिल्ली पुलिस के कमिश्नर अमूल्य पटनायक भी मौजूद रहे।
  • 25 फरवरी, 2020 हिंसा अपने चरम पर भजनपुरा, करावल नगर, बाबरपुर, मौजपुर, ब्रह्मपुरी, गोकुलपुरी और चांदबाग में सीएए विरोधी और समर्थकों के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई। उपद्रवियों ने एक-दूसरे पर पेट्रोल बम फेंके और गोलियां भी चलाईं। पुलिस ने लोगों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे लेकिन पुलिस की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुईं। एक के बाद एक मौतों का आंकड़ा बढ़ने लगा। उसी शाम चार हिंसा प्रभावित इलाकों मौजपुर, जाफराबाद, करावल नगर और बाबरपुर में कμर्यू लगा दिया गया।
  • 26 फरवरी, 2020 अंकित शर्मा की मौत हिंसा में खुफिया विभाग के कर्मचारी अंकित शर्मा की मौत हो गई। अंकित पिछले दो दिनों से गायब थे। एक नाले से अंकित समेत दो और लोगों की लाश मिली।
  • 27 फरवरी, 2020 ताहिर हुसैन पर केस दर्ज आप पार्षद ताहिर हुसैन पर अंकित शर्मा के परिजनों ने हत्या का आरोप लगाया है। ताहिर पर हिंसा भड़काने और उपद्रवियों की मदद करने का भी आरोप है। ताहिर हुसैन के घर की छत से काफी मात्रा में पत्थर, पेट्रोल बम और एसिड बरामद किया गया। देर शाम पुलिस ने पार्षद के खिलाफ हत्या व अन्य धाराओं में केस दर्ज किया। केस दर्ज होने के बाद आम आदमी पार्टी ने आप पार्षद ताहिर हुसैन की प्राथमिक सदस्यता रद्द की।
  • 28 फरवरी, 2020 वर्तमान स्थिति दिल्ली हिंसा में अब तक 39 लोगों की जानें जा चुकी हैं। दंगों में शामिल 48 लोगों पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर दी है, वहीं 130 लोगों को हिंसा के आरोप में गिरμतार किया जा चुका है।

डोनाल्ड ट्रंप के भारत में रहते प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए खुलकर बयान देना उचित नहीं होता। इससे पूरी दुनिया में गलत संदेश जाता। इसका साजिशकर्ताओं ने फायदा उठाया। अंतत: ट्रंप के रहते ही गृहमंत्री अमित शाह को मोर्चा संभालना पड़ा। उन्होंने अधिकारियों की आपात बैठक बुलाई। 24 की शाम को ही स्थिति संभालने के लिए सारे उपाय करने के आदेश दिए गए। अगले दिन फिर उच्चस्तरीय बैठक एवं उसके बाद दिल्ली की सर्वदलीय बैठक हुई। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के साथ केंद्रीय गृह सचिव एके भल्ला, दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल और दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक आदि उपस्थित थे। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि दिल्ली पुलिस ने कुछ किया ही नहीं या वह सक्रिय नहीं थी। 24 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने कहा कि उन संवेदनशील स्थानों पर भारी पुलिस बल की तैनाती की जा रही है जहां भीड़ के हिंसक होने की आशंका है। मौजपुर, जाफराबाद, सीलमपुर, गौतमपुरी, भजनपुरा, चांद बाग, मुस्तफाबाद, वजीराबाद और शिव विहार जैसे संवेदनशील स्थानों पर पुलिस तैनात की गई। दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त (अपराध) सतीश गोलचा का बयान चल रहा था कि हम कानून और व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हम सभी से अनुरोध कर रहे हैं कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने में दिल्ली पुलिस का समर्थन करने के लिए आगे आएं।

हमारे अधिकारी शांति कायम करने के लिए पैदल मार्च और सभाएं कर रहे हैं। शायद दिल्ली पुलिस ने सोचा होगा कि पैदल मार्च, संभाएं, शांति समितियां गठित करने से काम चल जाएगा। ये सब प्रयास गलत नहीं थे। लेकिन उनके पास हिंसा की तैयारी की खुफिया सूचना का अभाव था। इस कारण अन्य उपायों के समानांतर पूरी कठोरता से उपद्रवियों का दमन तथा हिंसा के लिए संभावी संवेदनशील स्थानों पर कार्रवाई में कमी जरूर रह गई। वास्तव में 22 और 23 फरवरी को पैदा तनाव 24 फरवरी की सुबह होते-होते विकराल हिंसा का रुप ले चुका था। इतने बड़े विदेशी मेहमान के दौरे के बीच गंभीर बातचीत से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी बाहर नहीं हो सकते थे। स्थानीय लोग बता रहे हैं हिंसा करने के लिए लोग बाहर से भी लाए गए थे। वे कौन थे? कहां से आए थे? किन-किन लोगों ने उन्हें बुलाया था। माना जा रहा है कि इसमें बांग्लादेशियों की भी भूमिका थी। पुलिस की विफलता से कोई इनकार नहीं कर सकता। किंतु यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली पुलिस ने यदि आरंभ में कठोर कार्रवाई की होती और उसमें दो-चार लोग भी हताहत हो जाते तो यही लोग जो छातियां पीट रहे हैं वो उसकी लानत-मलानत कर रहे होते। केन्द्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय तक मामला जा चुका होता।

हम असदुद्दीन ओवैसी से शांति और सद्भाव कायम करने में भूमिका निभाने की उम्मीद नहीं कर सकते, पर कांग्रेस, आप, भाजपा तथा अन्य कई पार्टियों से तो कर ही सकते हैं।

दिल्ली पुलिस के लिए जवाब देना कठिन होता कि उसने ऐसी कठोर कार्रवाई क्यों की? संभव था कुछ पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता। हो सकता है कि कुछ पुलिस वालों को भविष्य में सजा भी हो जाती। यह कोशिश आगे भी होगी। इसी भय ने दिल्ली पुलिस को शायद शाहीनबाग में सड़क घेरकर दिए जा रहे गैर कानूनी धरने को उखाड़ फेंकने से रोका हुआ है। यह ऐसा पहलू है जिसका सबको विचार करना चाहिए। संकट के समय तो हमें पुलिस की बहुत याद आती है, लेकिन संकट न पैदा हो इसके लिए वह कार्रवाई करे तो वह अपराधी बना दी जाती है। यह एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा है। इतनी आलोचना के बावजूद यह मानने में भी कोई समस्या नहीं है जो पुलिस वाले जहां तैनात थे उनमें से ज्यादातर ने अपनी क्षमता के अनुरूप दंगाइयोंं से निपटने की पूरी कोशिश की। ऐसा न होता तो इतने पुलिसकर्मी घायल नहीं होते। वह दृश्य कोई नहीं भूल सकता जिसमें एक दंगाई रिवॉल्वर लिए गोलियां चला रहा है तथा डंडा हाथ में लिए एक कांस्टेबल उसे रोकने की कोशिश करता दिख रहा है। वह कांस्टेबल वहां से भागा नहीं।

पता नहीं कहां-कहां किस पुलिस वालों ने लोगों या उनकी संपत्तियों को बचाने के लिए और क्या-क्या किया होगा। खैर, गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के सक्रिय होने के बाद कम से कम हिंसा तो रुक गई। अजीत डोवाल ने 25 की रात्रि ही कई दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया और उन्हें दूसरे दिन भी दंगाग्रस्त इलाकों में पैदल चलते, लोगों से बात करते, उनकी समस्याएं सुनते तथा उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देते देखा जा सकता था। इस तरह की हिंसा में देश के बड़े अधिकारी का सीधे लोगों के बीच जाने से बड़ा आश्वासन सरकार की ओर से और कुछ हो ही नहीं सकता। उम्मीद है दिल्ली अब इस तरह हिंसा की आग में नहीं झुलसेगी। हिंसा रोकने के साथ आगे हिंसा न हो इसकी व्यवस्था तथा लोगों को सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करना जरूरी होता है। इसके अलावा जिनके यहां जन-धन की क्षति हुई हो उनकी पीठ पर हाथ रखना परमावश्यक है। हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में सुरक्षा बल जब तक जरूरत हो तैनात रहेंगे और स्थिति बिगड़ने नहीं देंगे कम से कम अभी यह मानकर चला जा सकता है।

दूसरे, जो उपद्रवी- अपराधी पहचाने जा चुके हैं, वे कानून की गिरμत में हों यह भी सुनिश्चित किया जा रहा होगा। इससे भी लोगों को सुरक्षित होने का अहसास होगा। मोहल्ले-मोहल्ले में प्रभावी लोगों को सामने लाकर उन्हें मेल-मिलाप की भूमिका देनी होगी तथा उनकी पीठ पर पुलिस-प्रशासन का हाथ रहना चाहिए। उनसे वरिष्ठ अधिकारियों का सीधा संपर्क और संवाद रहना चाहिए ताकि वे लगातार वास्तविक स्थिति से उन्हें अवगत कराते रहें एवं आवश्यकता के अनुसार उन्हें सहयोग एवं सहायता भी मिलती रहे। जिनकी धन-जन की क्षति हुई है उन तक पहुंचना तथा उनके मामले को समझकर समुचित सहायता उपलब्ध करना भी सरकारों का दायित्व है। इन सबमें केन्द्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों की भूमिका होगी। मृतकों एवं घायलों के लिए जो सहायता राशि की घोषणा हुई है वह काफी कम है। ऐसे कठिन समय में राजनीतिक दलों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। राजनीतिक दलों के लोग हर गली-मुहल्ले में होते हैं। वे शांति एवं सद्भाव के साथ सुरक्षा का भाव पैदा करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

उम्मीद थी कि राजनीतिक दल कुछ समय तक संयम धारण करेंगे तथा शांति स्थापना के लिए मिलकर काम करेंगे। पर यह उम्मीद टूट रही है। आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार है। बावजूद वह यह मानती ही नहीं कि हिंसा को रोकने में उसकी कोई जिम्मेदारी थी। चूंकि दिल्ली की कानून-व्यवस्था केन्द्र की जिम्मे है इसलिए सारी जिम्मेदारी उसकी, सारा दोष उसका। केन्द्र की जिम्मेदारी को कोई नकार नहीं रहा। कानून व्यवस्था के अलावा भी तो तनाव कम करने के प्रयास होते हैं। 70 में से 62 विधानसभा क्षेत्र आपके हाथों में हैं। विधायकों का जनता से संपर्क अवश्य होगा। तो क्या उनकी कोई भूमिका नहीं थी? सच तो यह है कि नागरिकता संशोधन कानून को लेकर केन्द्र सरकार का जितना और जिस तरीके से विरोध हो रहा है उस पर आंखें मूंदे रहा जाए या उसे प्रोत्साहित किया जाए। राजनीतिक दलों की इस दुर्नीति ने भी स्थिति बिगाड़ने में भूमिका अदा की है। ठीक है कि दिल्ली में हिंसा की खबर आते ही विपक्षी नेताओं की ओर से शांति की अपील आई। किंतु यही अपील इन्होंने दिसंबर में नहीं किया था जब दिल्ली सहित देश के अन्य स्थानों पर अवांछित तत्वों ने हिंसा किया। उस समय तो कांग्रेस का भी यही मत था कि हम नागरिकता संशोधन कानून के विरोधियों के साथ हैं।

कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बाजाब्ता वीडियो संदेश जारी कर विरोध के साथ होने की घोषणा की। उसमें हिंसा की आलोचना और हिंसा न करने की अपील नहीं थी। इससे भी असामाजिक-सांप्रदायिक और हिंसक तत्वों का मनोबल बढ़ा। दिल्ली हिंसा के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई। उसके बाद सोनिया गांधी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए केन्द्र सरकार एवं आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा किया। विपक्ष के नाते यहां तक समस्या नहीं है। किंतु इसी समय गृहमंत्री से इस्तीफा मांगने का औचित्य क्या था? शांति की अपील तक सीमित रहकर राजनीति को भविष्य पर छोड़ने की घोषणा समय की मांग थी। किंतु नहीं, चाहे जितनी भयावह स्थिति हो राजनीति तो करनी ही है। आम आदमी पार्टी भी भाजपा को हिंसा के लिए जिम्मेवार ठहराने पर लगी है और कांग्रेस भी। इसके समानांतर भाजपा भी राजनीतिक हमला कर रही है। यह दुखद स्थिति है। हम असदुद्दीन ओवैसी से शांति और सद्भाव कायम करने में भूमिका निभाने की उम्मीद नहीं कर सकते, पर कांग्रेस, आप, भाजपा तथा अन्य कई पार्टियों से तो कर ही सकते हैं।

अगर इस देश में ऐसी हिंसा पर भी राजनीति होगी तो फिर आम आदमी के मन में यह सवाल उठेगा ही कि आखिर हमारा देश है किसके जिम्मे? हमारा रहनुमा है कौन? कांग्रेस ने नई दिल्ली क्षेत्र में शांति मार्च निकाला, राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द को ज्ञापन भी दिया। इसमें कोई समस्या नहीं। समस्या केवल इसमें शांति स्थापना से ज्यादा राजनीतिक रंग दिए जाने में है। ऐसी राजनीति किसी के हित में नहीं है। आम आदमी पार्टी कुछ वीडियो दिखाकर यह साबित करने का प्रयास कर रही है कि भाजपा की दंगों में भूमिका थी। खुफिया विभाग के कर्मचारी की हत्या का आरोप आम आदमी पार्टी के स्थानीय पार्षद पर लगा है। हालांकि पार्षद कह रहा है कि वह पुलिस की सुरक्षा में वहां से निकला और किसी परिचित के यहां सुरक्षित जगह पर है। उसने ऐसी किसी तरह की घटना में हाथ होने से इनकार किया है। हम अपनी ओर से कोई तर्क नहीं देना चाहते। तर्क बड़ा विचित्र है। आखिर उनकी पांच मंजिला भवन पर हिंसा और आगजनी की इतनी सामग्रियां कहां से आ गईं? या आकाश से बरसा दिया गया। इतने रसूख वाले व्यक्ति के घर पर हिंसक तत्वों ने कब्जा करके सब कुछ जमा कर लिया यह किसी के गले उतर ही नहीं सकता।

इसलिए इस समय तक तो आम आदमी पार्टी का वह पार्षद बिल्कुल शातिर खलनायक नजर आता है जिसने पूरी तैयारी की, हिंसा करवाया और ठीक समय देखकर पुलिस को सूचना देकर उसके सामने निकल गया ताकि पुलिस के संज्ञान में सब कुछ रहे। इस तरह आम आदमी पार्टी के लिए यह अपने गिरेबान में झांकने का समय है। अगर साजिश करने वाले न हों तो भी जब इस तरह की हिंसा होती है तो पार्टियों की दीवारेंं टूट जातीं हैं। इसमें दो ही पक्ष होते हैं। कोई पार्टी यह कहे कि उसके लोग हिंसा में शामिल नहीं थे यह बिल्कुल गलत होगा। अगर वे हिंसा में शामिल नहीं थे तो कहां थे? इस सवाल का जवाब देना कठिन हो जाएगा। अगर आप पर हमला होगा, आपकी ओर गोली चलेगी, पत्थर चलेगा, आपके घरों-दूकानों को जलाने की कोशिश होगी तो उस समय आप चाहे जितने उदार हो आपके पास एक ही विकल्प होता है, संघर्ष करने का। मजबूरी में बहुत लोगों को ईट-पत्थर के जवाब में ईट-पत्थर चलाना पड़ता है, हमले का मुकाबला करना होता है। अगर नहीं करेंगे तो दंगाइयों द्वारा खत्म कर दिए जाएंगे। इसमें कोई पार्टी कोई विचार नहीं होता।

अगर पार्टी के लोगों के पड़ोसियों के यहां हमले हों और वे साथ न आएं तो उनको कहा जाएगा कि जब हम संकट में थे तो ये बचाने और लड़ने नहीं आए। यह आने वाले समय में धीरे-धीरे पता चलेगा कि किसने अपनी जान और माल किस तरीके से बचाई? कौन कहां किस तरह मारा गया या घायल हुआ? किसने किनकि नको बचाया? किसने दोस्ती निभाई? किसने दुश्मनी निकाली? ये सब सामने आएंगे। जिस तरह खुफिया अधिकारी तथा उसके साथ तीन लोगों का शव नाले से पाया गया। इसका अर्थ है कि उनकी बर्बरता से हत्या की गई। वे दंगों में बीच सड़क पर नहीं मारे गए। बाजाब्ता उनको पकड़कर बर्बरता को अंजाम दिया गया। आईबी के परिवार वालों ने आम आदमी पार्टी के पार्षद पर हत्या करवाने का आरोप लगाया है। उन पर प्राथमिकी भी दर्ज हो गई है। तो जांच की प्रतीक्षा करनी चाहिए। वास्तव में ऐसी अनेक सिहरन पैदा करने वाली कहानियां आनी शेष है। हजारों की जीवन भर की या कई पीढ़ियों की मेहनत से खड़ा किया गया जीवन का कारवां, जीविकोपार्जन का पूरा साधन कुछ मिनटों या घंटों में स्वाहा हो गया। इसमें कानूनी कार्रवाई, सुरक्षा आश्वासन के साथ बहुत-कुछ की आवश्यकता होती है। दुर्भाग्य देखिए कि इसका भी एकपक्षीय चित्रण करने की कोशिश हो रही है। एक बड़ा समूह एक समुदाय को ही इसमें भी दोषी ठहरा रहा है।

यह तो बताने की आवश्यकता नहीं कि हमारी राजनीति और बौद्धिक समुदाय बस एक विचार को सबसे ज्यादा फैलाने की कोशिश करता है कि भाजपा तो मुसलमानों की विरोधी है। उसे इसमें राजनीतिक लाभ दिखता है। यह इस समय भी हो रहा है। साजिश रचने वाल कौन थे इसे देखे बगैर आप इस तरह का निष्कर्ष देकर एक समुदाय को बदनाम कर रहे हैं। आरंभ करने वाले और ंिहंसा की तैयारी कर हमला करने वाले कौन थे? वैसे भी हिंसा में दोनों पक्ष के लोग मारे गए एवं घायल हुए हैं। देसी और विदेशी मीडिया के एक हिस्से में चित्रण ऐसे हो रहा है जैसे केवल मुसलमान ही मारे गए हैं। इस तरह का दुष्प्रचार स्थिति को केवल बिगाड़ती है। यह एक अलग लड़ाई है। पुलिस की दयनीय दुर्बलता से कोई इनकार नहीं कर सकता। कुप्रबंधन, प्रबंधहीनता बिल्कुल थी। आईबी अधिकारी की मां को प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए एक थाने से दूसरे थाने जाना पड़ा। बावजूद यह आरोप किसी दृष्टि से गले नहीं उतरता कि पुलिस जानबूझकर निष्क्रिय रही। इतने पुलिस वालों ने क्या स्वयं को ही घायल कर लिया? कुछ लोगों ने इसकी गुजरात के 2002 के दंगे की पुनरावृत्ति भी कहना आरंभ कर दिया है। इस तरह के जहरीले आरोपों और वक्तव्यों से सांप्रदायिक खाई पटने के बजाय और चौड़ी होगी। यह हिंसा से पैदा घावों को कुरेदना है जिस पर मरहम लगाने की आवश्यकता होती है। तो हिंसा के बाद वैचारिक हिंसा जारी रखने की शुरुआत हो चुकी है। यह जारी रहेगी।

इसमें पुलिस क्या करेगी? सरकार क्या करेगी? स्वस्थ सामाजिक संगठन, मुहल्लों के सम्मानित सामुदायिक व्यक्तित्व क्या करेंगे? पूरा एजेंडा एनजीओ एक्टिविस्टों, कानूनी एक्टिविस्टों, राजनीतिक नेताओं तथा मीडिया के कुछ खिलाड़ियों के हाथों सिमटा रहेगा। लोगों को उकसाया जाएगा कि आप फलां के खिलाफ मुकदमा करो, फलां नेता पर आरोप लगाओ…. इसे लेकर न्यायालयों में मामला दायर कराया जाएगा। यह आने वाले समय का खतरनाक सच है जिसकी नींव पड़ चुकी है। हिंसा के बीच ही पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, भीम आर्मी के चन्द्रशेखर आदि उच्चतम न्यायालय पहुंच गए थे। उनकी अपील थी कि हिंसा की जांच एसआईटी से कराई जाए। यह बात अलग है कि उच्च न्यायालय में मामला होने के कारण उच्चतम न्यायालय ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। पहले हिंसा रोकने का कदम उठाना जरूरी है या जांच? हिंसा रुक जाए, लोग स्थिर होने लगे तभी जांच भी सही तरीके से हो सकती है। पर इनको इससे क्या लेना-देना। उच्च न्यायालय में मामला ले जाने वाले कौन लोग हैं उनके चेहरे पहचानिए। जिस समय हिंसा चल रही हो उसी समय से जब एक्टिविज्म आरंभ हो गया तो आगे क्या होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

यह तो उच्च न्यायालय का शुक्र मनाइए कि उसने तनाव को देखते हुए सुनवाई को 13 अप्रैल तक के लिए टाल दिया। इस समय इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। वास्तव में यह पूरी हिंसा ही झूठ और गलतफहमी पैदा कर लोगों को उकसाने की पैदाइश है। यही लोग हैं जिन्होंने नागरिकता संशोधन कानून, नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर या एनपीआर, नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजनशीप या एनआरसी के बारे में झूठ फैलाकर, दुष्प्रचार कर मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के अंदर भय पैदा किया कि सरकार आपकी विरोधी है, यह मुसलमानों की नागरिकता छीनना चाहती है, उनको नजरबंदी शिविरों में डाला जाएगा…। इसके लिए लोगों को उकसाया गया, भड़काया गया जिसका हिंसक परिणाम हमने दिसंबर में देखा। उसी का एक छद्म विस्तार शाहीनबाग धरना है। वहां दिए गए भाषणों ने आग में घी का काम किया है। सच यह है कि शाहीनबाग नहीं होता तो कुछ नहीं होता। शाहीनबाग के विस्तार के नाम पर ही दिल्ली के अन्य जगहों में सुनियोजित रणनीति के तहत महिलाओं के जाफराबाद से लेकर चांदबाग, बाबरपुर आदि में सड़क घेरकर धरना आयोजित किया गया, जिसका विरोध हुआ। किंतु इसे कोई नहीं स्वीकारेगा कि मुख्य कारण झूठा प्रचार और उससे निकले शाहीनबाग का खतरनाक महिमामंडन है।

यह हर समुदाय के लोगों को विचार करना है कि हम इसी तरह ऐसे लोगों के हाथों का शिकार होते रहेंगे या इससे निकलकर अपनी आम जिन्दगी में वापस आएंगे? जिस आधार पर इतना विरोध एवं हिंसा हुई वह है ही नहीं। जो है नहीं उसको भय का कारण बनाकर स्थिति को इस सीमा तक पहुंचाने वाले लोग ही असली दोषी हैं। इनके उकसावे में आकर हिंसक तत्वों ने मान लिया कि यह सरकार हमारी दुश्मन है और इससे हमें लड़ना होगा। लड़ने का मतलब उन्होंने सांप्रदायिक तरीके से विरोधी समुदाय पर हमला तथा उनकी संपत्तियों को स्वाहा करना माना और उसी तरह अंजाम भी दिया। दिल्ली हिंसा थमने के बाद यह विचार करना जरूरी है आखिर भड़काए गए, उकसाए गए, भ्रमित किए गए समाज के मन को कैसे साफ किया जाए ताकि फिर इस विनाश की पुनरावृत्ति नहीं हो।


 
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