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जल संरक्षण का कारगर मिशन

18/08/2019

जल संरक्षण का कारगर मिशन






गाजियाबाद शहर की सीमा पर स्थित रईसपुर गांव में दो साल पहले तीन तालाबों को फिर से खोदा गया था। बीते साल इतनी बारिश नहीं हुई कि ये लबालब भर सकें। अब तालाब के नाम पर सूखे गड्ढÞों को देख कर कोई आपत्ति भी नहीं करता है। कमोबेश ऐसी ही दशा में इसी जिले के सौ से ज्यादा तालाब हैं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेश पर प्रभात कुमार और मिनिस्टी एस. जैसे अधिकारियों ने इन्हें 2017 में दोबारा खुदवाना शुरू किया था। यह कार्य पूरा तो नहीं हो सका, पर विकास का एक ऐसा झरोखा जरूर खोल गया, जिससे दंतकथाओं का वह सरोवर दिखता हो, जिन्हें खोदने का श्रेय दैत्यों या राक्षसों को जाता है।

दरअसल पंजाब के पटियाला में भी रोहर जागीर गांव में भूमाफियाओं ने तालाब पर कब्जा कर अट्टालिका खड़ी कर दी। अवैध कब्जे के इस मामले को कलेक्टर ने वाजिब मान कर कीमत वसूलने का फरमान जारी किया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। वर्ष 2011 में अदालत ने देशभर के जलस्रोतों को अतिक्रमण मुक्त करने का आदेश दिया। इसकी तामिल होने की दशा में भूमाफियाओं को जोर का झटका लगता है। इसकी वजह से गाजियाबाद के सुशील राघव ने जिले भर के जलस्रोतों को बचाने की नीयत से उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर किया। बहरहाल यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में लंबित है। इसी बीच एनजीटी में बेहतर प्रदर्शन के मंसूबे से मंडलायुक्त और जिलाधिकारी ने 200 से ज्यादा तालाबों को पुन:जीवित करने का प्रयास किया। वर्तमान जिलाधिकारी रितु माहेश्वरी के हलफनामे में वर्णित तथ्यों के अवलोकन से भी यही स्पष्ट होता है।

यहां अतिक्रमण के 450 मामलों में प्रशासन ने एफआईआर दर्ज किया है। अवैध कब्जा करने वालों से 18 करोड़ रुपये का जुर्माना भी वसूला गया है। किश्तों में गाजियाबाद के ही 1021 तालाबों और 73 झीलों के बारे में जानकारी सामने आती है। सूखे गड्ढÞों को तालाब नहीं कहते हैं। पिछले साल एडवोकेट विक्रांत ने जलपुरुष राजेन्द्र सिंह और प्रोफेसर जगदीश चौधरी जैसे पानीदार नेताओं के समक्ष गंगा सद्भावना यात्रा के दौरान इन सूखे तालाबों का जिक्र छेड़ कर चौंका दिया था। हाल ही में प्रोफेसर चौधरी ने इनके पुनरुद्धार के अभियान को मिशन 111 का नाम दिया है।

यह श्रम के सम्मान की कोशिश है। यह जल संरक्षण की वही पंचायती विधि है, जिसकी पैरवी महात्मा गांधी ने भी की है। इन हालातों का निर्माण करने वाले सरकारी व गैरसरकारी संस्थाएं लंबे अर्से से इस भदेस व्यवस्था को नष्ट करने में लगी हैं। गाजियाबाद प्रशासन को भी 1980 के दशक में राजस्थान और चंडीगढ़ में हुए प्रयोगों से सीखना चाहिए। 1986 में अलवर में श्रमदान से जोहड़ उगाने और अरवारी नदी को पुनर्जीवित करने के कारण राजेन्द्र सिंह को जलपुरुष कहा गया। सुखना लेक की दोबारा खुदाई और स्मृति उपवन का निर्माण चंडीगढ़ प्रशासन के तत्कालीन सलाहकार अशोक प्रधान ने जनसहभागिता के द्वारा ही सुनिश्चित किया था।

फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कार्बूजीए ने 1958 में शिवालिक की पहाड़ी से प्रवाहित सुखना चो को सुखना झील में समेट लिया था। तीन दशक बाद इसके निर्जल पेट में क्रिकेट खेलते बच्चों को देखकर अशोक प्रधान ने इसे फिर से जल प्लावित करने का निर्णय लिया। सामूहिक प्रयासों के कारण ही इन जलस्रोतों से सुसज्जित उपवनों के साथ लोग आज भी अपनत्व का भाव रखते हैं। अशोक प्रधान गाजियाबाद प्रशासन की असफलता का कारण सामुदायिक विकास के उस योजना को मानते हैं, जिसे देश के पहले सहकारिता और पंचायती राज मंत्री सुरेंद्र कुमार डे ने 1950 के दशक में शुरू किया था। उन्होंने ब्लॉक बना कर इनके अधिकारियों को विकास कार्यों के लिए अधिकृत किया। इसने गांवों की शक्तियों को क्षीण ही किया।

पहले जो काम गांव का समाज आपसी सहयोग और सहमति से करता था, अब वह कार्य शासन-प्रशासन और ठेकेदारों के हाथों संपन्न होने लगा। तालाब और कुएं गढ़ने में माहिर गांव के विभिन्न वर्ग के लोगों को इस कार्य से दूर कर बीडीओ और ठेकेदारों के हाथों में काम सौंपने से वह जंग उजागर हो गया, जिसे महात्मा गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ (1909) में वर्णित पंचायत और हेरोल्ड लास्की के ‘ए ग्रामर आॅफ पॉलिटिक्स’ (1925) में उद्धृत ‘लोकल सेल्फ रूल’ के नाम से जाना जाता है। रातों-रात भूमाफियाओं के भीमकाय मशीनों से ताल-तलैया खोदने के बदले मनरेगा जैसी योजनाओं के माध्यम से ऐसा करने से जियां द्रेज व अमर्त्य सेन जैसे लिबरल इकोनॉमिस्ट को खुशी मिलती। जल संकट से बचने के लिए गांवों ने तालाब और कुएं खोदे। किन्तु नई सरकारी व्यवस्था से आज साझेदारी में सहेजे गए जलस्रोतों को क्षति ही पहुंचती है। गर्मी शुरू होते ही गाजियाबाद तालाब सूख गया है।

फिर ऐसे भी तालाब दिखते हैं, जिसे केन्द्र सरकार में मंत्री जनरल वी.के. सिंह और जिलाधिकारी ने पुन: खुदवाने में पहल की है। डासना के चार सूखे तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए स्थानीय लोगों को मेवात की संस्कृति की ओर लौटने की जरूरत है। रईसपुर के लिए भी यही विकल्प अनुकूल है।


 
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