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सुरक्षा उद्योग की नींव

17/02/2020

सुरक्षा उद्योग की नींव

बनवारी


खनऊ में रक्षा उद्योग की ग्यारहवीं अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आशा व्यक्त की कि आने वाले समय में भारत रक्षा उद्योग से संबंधित एक बड़ा केंद्र बन जाएगा। पिछले छह वर्ष से उनकी सरकार इस दिशा में काफी प्रयत्न कर रही है। पिछले सात दशकों की उदासीनता और निष्क्रियता को दूर करने में समय लगना स्वाभाविक है। लेकिन एक के बाद एक कदम उठाते हुए सरकार ने इस दिशा में कुछ गतिशीलता पैदा करने में सफलता प्राप्त की है। यह प्रदर्शनी स्वयं सरकार की इस गंभीरता और सक्रियता का उदाहरण है। उसमें जिस स्तर की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी हो रही है, वह उल्लेखनीय है। प्रदर्शनी के उद्घाटन के समय ही लगभग 35 देशों के रक्षामंत्री उपस्थित थे। रक्षा क्षेत्र की लगभग डेढ़ सौ कंपनियां इस प्रदर्शनी में भाग ले रही हैं। रक्षा उत्पादन में संलग्न एक हजार निर्माता प्रदर्शनी में उपस्थित हैं। इस प्रदर्शनी के माध्यम से भारत न केवल रक्षा उत्पादन के क्षेत्र की बड़ी कंपनियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है, बल्कि अपने रक्षा उत्पादों के लिए बाजार का विस्तार करने में भी लगा है। रक्षा उद्योग निर्यात की संभावनाएं पैदा करके ही खड़ा किया जा सकता है।

उन्नत रक्षा सामग्री का विकास करके हम दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर पाए हैं। अब रक्षा क्षेत्र की बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत को अधिक गंभीरता से लेने लगी हैं। लखनऊ प्रदर्शनी में उनकी यथेष्ठ उपस्थिति इसी का परिणाम है।

शस्त्रों और शस्त्र प्रणालियों के विकास और अनुसंधान में जिस बड़े पैमाने में निवेश की आवश्यकता होती है, उसे देखते हुए केवल आंतरिक बाजार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। रक्षा मंत्रालय ने अगले पांच वर्ष में पांच अरब डॉलर मूल्य के रक्षा उत्पादों के निर्यात का लक्ष्य रखा है। भारत को रक्षा उत्पादन का एक बड़ा केंद्र बनाने के लिए देश में दो गलियारे बनाए जा रहे हैं-एक तमिलनाडु में और दूसरा उत्तर प्रदेश में। अब तक हमारी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि हमारी अपनी सेना रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा विकसित शस्त्रों को प्रोत्साहन नहीं देती थी। इसलिए देश रक्षा सामग्री के आयात पर निर्भर था। उसमें विदेशी मुद्रा तो खर्च होती ही थी, दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता बनी रहती थी। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान इस दिशा में कुछ प्रयत्न हुए थे, पर वे आधे-अधूरे थे। प्रोत्साहन के अभाव में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन अपने भारी-भरकम तंत्र के बावजूद शिथिल बना रहा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की पहली सार्थक कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय हुई। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद उसमें व्यवधान आ गया। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद फिर इस ओर ध्यान दिया गया।

तब से अब तक कई तरह की पहल हुई है। सबसे पहले रक्षा क्षेत्र की बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मिलकर भारत में रक्षा उद्योग को विस्तार देने की कोशिश हुई। पर विदेशी कंपनियों का भारत के बारे में पुराना अनुभव अच्छा नहीं था। उनका मानना था कि भारत की नौकरशाही प्रक्रियाएं बहुत बड़ी बाधा साबित होती हैं। उनके कारण उद्योग खड़ा करने में लंबा समय लगता है। इसलिए सबसे पहले सरकार ने नौकरशाही के दृष्टिकोण को बदलने और नियमों को आसान बनाने की ओर ध्यान दिया। अब जाकर इसमें कुछ सफलता मिली है। रक्षा उद्योग में विदेशी पूंजी की स्वीकृति को लेकर भी अनेक आशंकाएं बनी रही हैं। उससे संबंधित नियमों में भी अब कुछ ढील दी गई है। फिर भी विदेशी कंपनियों, पूंजी और प्रौद्योगिकी को आकर्षित करने में बहुत धीमी प्रगति ही हो रही है। कुछ समय पहले तक रक्षा क्षेत्र में हमारी निर्भरता रूस पर थी। रूस से रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में कुछ सहयोग भी हुआ। ब्रह्मोस मिसाइल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन इधर भारत ने रूस पर अपनी निर्भरता कुछ कम करके पश्चिमी देशों से रक्षा संबंधी आपूर्ति बढ़ाई है। इससे पश्चिमी रक्षा उद्योग में लगी कंपनियां हमारी ओर आकर्षित हुई हैं। रक्षा उद्योग को खड़ा करने के लिए आरंभ में इस क्षेत्र की अग्रणी कंपनियों का सहयोग अपेक्षित रहता है। लेकिन अंतत: उसके लिए अपनी क्षमता का ही विकास होना चाहिए।

यह सेना का दृष्टिकोण बदले बिना संभव नहीं था। मोदी सरकार ने सेना को अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए तैयार किया है। उसने यह स्पष्ट संकेत दे दिए कि शस्त्रास्त्रों और शस्त्र प्रणालियों के मामले में पर िनभर्रता बनाए रखकर हम अपनी रक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते। इसके लिए सबसे बड़ा सुधार यह हुआ है कि सेना और रक्षा अनुसंधान विकास संगठन के बीच समन्वय स्थापित किया गया है। उससे रक्षा अनुसंधान विकास संगठन को सेना की आवश्यकताएं समझने में आसानी हुई है। यह मोदी सरकार की बड़ी सफलता है कि अब रक्षा अनुसंधान विकास संगठन द्वारा विकसित अनेक उत्पादों को सेना अपना रही है। इसका सबसे ताजा उदाहरण धनुष है। यह अत्याधुनिक तोप हमारे अपने तकनीकी कौशल का परिणाम है। सेना ने 114 तोपों के आॅर्डर दे दिए हैं। कुल मिलाकर 400 से ऊपर तोपें सेना रक्षा अनुसंधान विकास संगठन से खरीदने को तैयार हो गई है। इससे पहले मिसाइल और लड़ाकू विमानों के क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादों को अपनी जगह बनाने में सफलता मिली। ब्रह्मोस तो भारत और रूस के संयुक्त प्रयास का परिणाम है।

तेजस के विकास में हमने अपने तकनीकी कौशल का परिचय दिया है। इन आरंभिक सफलताओं की हमारे रक्षा उद्योग की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। यह भी अनुभव किया गया था कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अकेले रक्षा अनुसंधान विकास संगठन के भरोसे आगे नहीं बढ़ा जा सकता। उसके लिए निजी क्षेत्र को भी साथ लेने की आवश्यकता है। अब तक निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन से दूर ही रखा गया था। इसलिए निजी क्षेत्र रक्षा अनुसंधान का तंत्र विकसित नहीं कर पाया। सरकार ने यह निर्णय लिया कि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन निजी क्षेत्र की चुनी हुई कंपनियों को अपने द्वारा विकसित उन्नत प्रौद्योगिकी उपलब्ध करवाएगा। अब तक इस दिशा में काफी पहल की जा चुकी है। उनके बीच उन्नत प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान को लेकर बड़ी संख्या में समझौते हुए हैं। इसके अलावा सरकार ने देश में उपलब्ध प्रतिभा के उपयोग के ख्याल से स्टार्ट अप को प्रोत्साहन देने का फैसला किया है। भारत में प्रशिक्षित इंजीनियरों की कमी नहीं है। इसलिए ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है, जो छोटे आकार की कंपनियों के जरिए रक्षा उद्योग खड़ा करने के इस महती अभियान में योगदान कर सकते हैं। उन्हें इसके लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध करवाने की आवश्यकता होती है।

सरकार इस दिशा में सहयोग और समर्थन के लिए उदारतापूर्वक आगे आ रही है। इसके सकारात्मक परिणाम जल्दी ही दिखाई देने लगेंगे। रक्षा उद्योग का विकास हमारी आर्थिक उन्नति को भी गति दे सकता है। विकसित देशों की औद्योगिक प्रगति का आधार सामरिक उद्योग से विकसित उनकी प्रयोगशालाएं ही रही हैं। यह दुर्भाग्य की बात है कि पिछली सरकारों ने सेना को केवल उन्नत युद्ध सामग्री से ही वंचित नहीं रखा, उन्हें आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध करवाने की ओर भी समुचित ध्यान नहीं दिया गया। 1962 के युद्ध के समय यह स्पष्ट हो गया था कि हमारे सैनिकों के मुकाबले चीनी सैनिकों के पास बेहतर साज-सामान था। हम साधनों के अभाव का रोना रोते रहे और सैनिकों को कठिनाइयों में डाले रहे। हमारे सैनिक सियाचिन की कठिन परिस्थितियों में मुस्तैदी से डटे रहे हैं और कारगिल की विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने साहस और कौशल का परिचय दिया है। लेकिन कठिन या दुर्गम परिस्थितियों के लिए उनके पास जिस तरह का साज-सामान होना चाहिए, वह हम आज तक उपलब्ध नहीं करवा सके। यह निश्चय ही लज्जा की बात है।

अगर सेना की सब तरह की आवश्यकताओं की ओर ध्यान देने लगेंगे तो इससे देश में आर्थिक गतिशीलता भी आएगी। सेना वस्तुओं की सबसे विश्वसनीय खरीददार होती है। उसकी जरूरतें पूरा करने की प्रक्रिया में उद्योग व्यापार को भी फलने-फूलने का मौका मिलता है। मोदी सरकार पाकिस्तान और चीन से मिल रही रक्षा चुनौती को गंभीरता से लेने के कारण इन सभी दिशाओं में पहल कर रही है। सेना के आंतरिक संगठन में भी अपेक्षित परिवर्तन किए जा रहे हैं। हाल ही सीडीएस के पद का निर्माण किया गया और उस पद पर जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति हुई। अब थियेटर कमांड के स्तर पर तीनों सेनाओं में समन्वय स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। सेना को रक्षा संबंधी वास्तविक चुनौतियों के ख्याल से अपना आंतरिक संगठन और तंत्र बदलने के लिए कहा जा रहा है। यह सब स्वागत योग्य निर्णय हैं। आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इस दिशा में और तेजी से प्रगति हो पाएगी।


 
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