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हिन्दी की दुर्दशा का जिम्मेदार मैकाले की शिक्षा पद्धति

02/09/2019

मनोज ज्वाला 

चालू औपनिवेशिक वर्ष अर्थात ब्रिटिश क्राउन से सत्ता हस्तान्तरण को ही स्वतंत्रता मान लिये जाने के 72वें वर्ष का सितम्बर आते ही अपने देश में राजभाषा बनाम राष्ट्रभाषा की दशा-दुर्दशा पर आंसू बहाने की औपचारिकता निभाने के निमित्त 'हिन्दी माह' नामक समारोह जगह-जगह शुरु हो चुका है। 14 सितम्बर (हिन्दी-दिवस) को केन्द्र में रख कर कुछ सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों में इस हेतु 'हिन्दी पखवारा' और 'हिन्दी सप्ताह' का भी आयोजन होता है। हिन्दी के प्रति निष्ठा-भक्ति को मापने का पैमाना तीन-तीन आकारों का यह आयोजन ही है, जिसके दौरान ऐसे कार्यक्रमों में सहभागी बने लोग राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में हिन्दी के योगदान पर तालियां बजाने तथा राज-काज में इसके अपमान पर आंसू बहाने की औपचारिकता पूरी कर देते हैं। किन्तु ऐसे हास्यास्पद आयोजनों से हिन्दी का कुछ भी भला होने वाला नहीं है। हिन्दी तो अपनी स्वाभाविक गति से विस्तार पा ही रही है, किन्तु भारत का अंग्रेजीकरण होता जा रहा है। इससे भविष्य में भाषायी पहचान का संकट खड़ा हो सकता है। सबसे बुरा हाल तो महानगरों में है, जहां आवासों -दुकानों -संस्थानों के नाम तक अब अंग्रेजी में ही देखे जा रहे हैं। बोलचाल और कार्य-व्यापार में अधिक से अधिक अंग्रेजी व अंग्रेजियत का व्यवहार ही आज अपने देश में सुशिक्षित व विकसित होने का पैमाना बन गया है। जो जितनी ज्यादा अंग्रेजी बोलता है, वह उतना ज्यादा शिक्षित जाना-माना जाता है। ऐसी स्थिति अपने देश में प्रचलित अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति के कारण है, जो भारतीय भाषा-संस्कार-ज्ञान-परम्परा के प्रति नकार और अंग्रेजी व अंग्रेजियत के प्रति स्वीकार की धारणा पर ही आधारित है। आज किसी भी शिक्षित आदमी को आप यह बताइए कि संस्कृत भाषा दुनिया की सबसे पुरानी और सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। अथवा यह कि वेदों में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के सारे सूत्र भरे पड़े हैं, तो इन बातों को वह तब तक सत्य नहीं मानेगा, जब तक अंग्रेजी भाषा में यूरोप-अमेरिका के किसी विद्वान के तत्सम्बन्धी कथनों का उद्धरण उसे देखने-पढ़ने को न मिले। अपने 'स्वत्व' के प्रति ऐसी अविश्वासपूर्ण हीनता और अपनी 'अस्मिता' के प्रति विश्वास के लिए अंग्रेजी पर ऐसी निर्भरता हमारी वर्तमान मैकाले शिक्षा-पद्धति की ही देन है। इस पद्धति से भारतीय भाषाओं, विशेषकर राष्ट्रभाषा-हिन्दी को सर्वाधिक नुकसान हुआ है। अंग्रेजी से कई गुणा ज्यादा समृद्ध हिन्दी में बेवजह अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल से हिन्दी अब 'हिंगरेजी' बन गई है, जबकि देवनागरी परिवार की अन्य भारतीय भाषायें भी ऐसी ही दुर्गति की शिकार होती जा रही हैं।
गौरतलब है कि अंग्रेजी में शब्दों की संख्या भारतीय भाषाओं की अपेक्षा बहुत ही कम है। शब्द-सृजन की क्षमता तो और भी कम है। अंग्रेजी के एक विद्वान के अनुसार, कुल पन्द्रह हजार शब्दों में पूरी अंग्रेजी और उसका सारा साहित्य समाया हुआ है। जबकि, संस्कृत की तो छोड़िये, संस्कृत से निकली हुई हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में शब्दों की संख्या लाख से भी अधिक है। संस्कृत में तो कोई सीमा ही नहीं है, क्योंकि उसमें शब्द-निर्माण की क्षमता असीम है। शब्दों की ऐसी दरिद्रता के कारण अंग्रेजी में एक ही शब्द का कई भिन्न-भिन्न अर्थों में उपयोग होता है। फलतः अंग्रेजी में भावनाओं और विचारों की सटीक अभिव्यक्ति सम्भव ही नहीं है।
दरअसल, हुआ यह कि ब्रिटिश शासकों ने भारत को लम्बे समय तक अपने औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का गुलाम बनाये रखने के लिए थॉमस मैकाले की तत्सम्बन्धी षड्यंत्रकारी अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को हमारे ऊपर थोपकर इसके पक्ष में ऐसी मान्यता कायम कर दी कि मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, रोजी-रोजगार, ज्ञान-विज्ञान और प्रगति-उन्नत्ति व समृद्धि हासिल करने की भाषा अंग्रेजी ही मानी जाने लगी। तब हमारे देश का लालची और एक हद तक लाचार जनमानस अंग्रेजी पढ़ने-लिखने-सीखने का ही नहीं, बल्कि अंग्रेज ही बन जाने का प्रयत्न करने लगा। अंग्रेजों के चले जाने के बाद देश की राजसत्ता उन्हीं के सरपरस्तों द्वारा उन्हीं की रीति-नीति से संचालित होती रही, जिसके कारण देशवासियों की वह प्रयत्नशीलता उसी दिशा में जारी रही। इस प्रयत्नशीलता में लाचारी कम, लालच ही अधिक दिखती है। सिर्फ लाचारी होती, तो लोग अंग्रेजी पढ़ते -लिखते -सिखते भर, अंग्रेज बनने को उतावला नहीं होते और कम से कम अपनी भाषा का तिरस्कार तो कतई नहीं करते। किन्तु, लोगों में अंग्रेज बनने और अंग्रेजियत के माध्यम से दौलत और शोहरत सब कुछ हासिल कर लेने की लालच इस कदर भड़क उठी कि लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी पद्धति से ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाने-पढ़वाने लगे, ताकि बच्चे की अंग्रेजी ऐसी हो जाए जैसे उसकी मातृभाषा ही हो। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर माता-पिता अपने दूधमुहें बच्चों को भाषा-ज्ञान का श्रीगणेश 'क से कन्हैया' की बजाय 'ए से एपल' का रट्टा पिलाते हुए करने लगे। मातृभाषा, दैशिक-भाषा व राष्ट्रभाषा की उपेक्षा वहीं से शुरू हो गई। फिर तो व्यक्ति-व्यक्ति की ओर से यही प्रयत्न होने लगा कि बोलचाल में अधिक से अधिक अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया जाय, तभी अंग्रेजी में पारंगत हुआ जा सकता है। इस तरह से हमारी राजसत्ता की अंग्रेज-परस्त रीति-नीति के कारण देश में कायम अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा पद्धति से न केवल राष्ट्रभाषा हिन्दी की दुर्गति हो रही है, बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं की भी ऐसी-तैसी हो रही है।
ऐसे में समाज को ही आगे आना होगा, क्योंकि भारतीय परम्परा में शिक्षा तो समाज का ही विषय रही है, राज्य का नहीं। गुजरात के अहमदाबाद शहर में वहां के जैन-समाज ने यह पहल की है, जो उल्लेखनीय है। वहां हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला नाम से एक ऐसा गुरुकुल  संचालित किया जा रहा है, जो अंग्रेजी-मैकाले शिक्षण-पद्धति को कड़ी चुनौती दे रहा है। वहां शिक्षा का माध्यम गुजराती, संस्कृत और हिन्दी है। बारह वर्ष की उम्र तक वहां बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई ही नहीं जाती है, जबकि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की 72 कलाओं-विद्याओं की पढ़ाई होती है। 'मैकाले-स्कूलों' की डिग्रियों का भी बहिष्कार करने वाले उस गुरुकुल के संचालक उत्तम भाई का मानना है कि उनके बच्चे दुनिया के किसी भी सर्वश्रेष्ठ शिक्षण-संस्थान के बच्चों का मुकाबला कर सकते हैं। यहां का एक बच्चा पिछले दिनों इण्डोनेशिया में हुई गणित की एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को जीतकर यह सिद्ध भी कर दिया है, जिसे तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सम्मानित भी किया हुआ है।
भारतीय भाषाओं की दुर्गति की संवाहक मैकाले शिक्षा-पद्धति व शिक्षा के अंग्रेजी माधयम की व्याप्ति को हटाने और उसके स्थान पर भारतीय शिक्षा-पद्धति को स्थापित करने के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने की दिशा में भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार से अपेक्षा की जा सकती है, क्योंकि यह उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से निकली हुई है, जिसकी  प्राथमिकताओं में शामिल है- भारतीय व संस्कृति का उन्नयन-संवर्द्धन। अतएव सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा-पद्धति चाहे जब भी बदले, किन्तु हिन्दी के घटते प्रचलन और इसके बढ़ते हिंग्रेजीकरण को रोकने के लिए शीघ्र कोई कानूनी कदम अवश्य उठाये। हिन्दी के नाम पर माह-पखवाड़ा-सप्ताह-दिवस आयोजित करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी के अकारण बढ़ते प्रयोग को रोकना होगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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