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अलग-थलग पड़ता बोर्ड

11/12/2019

अलग-थलग पड़ता बोर्ड

क्याऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी स्वीकार्यता खोने लगा है? यह सवाल अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में बोर्ड के हालिया रवैये को लेकर उठने लगा है। बोर्ड ने फैसले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्णय लिया है। उसके इस फैसले से अयोध्या विवाद के लगभग सभी मुस्लिम पक्षकारों ने अलग राह अख्तियार कर ली है। यही नहीं रिव्यू पिटीशन को लेकर बोर्ड के निर्णय से देश का मुसलमान समुदाय भी खुद को नहीं जोड़ पा रहा है। कारणवश मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मामले में बिलकुल अलग-थलग पड़ता जा रहा है। दरअसल 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ द्वारा अयोध्या मामले पर निर्णय सुनाए जाने के बाद ही बोर्ड ने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में ही इसका संकेत दे दिया था। बोर्ड सचिव जफरयाब जिलानी ने फैसले पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए पुनर्विचार याचिका दायर करने की अपनी व्यक्तिगत राय दे दी थी। उसके बाद 19 नवंबर को लखनऊ में सम्पन्न हुई बोर्ड की मीटिंग में इस बात पर मुहर भी लग गई। वैसे देखा जाए तो बोर्ड का निर्णय कानून सम्मत है और इससे पहले भी कई मुकदमों के पक्षकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से असहमत होने के कारण पुनर्विचार याचिका दायर करते रहे हैं। फिर किसी फैसले से सहमति और असहमति जताना भी लोकतंत्र की भावना के विपरीत नहीं है।

बोर्ड और जमीअत के अपने पूर्व वचन से पलटने से मुसलमानों का बड़ा तबका अवाक है और उनके इस फैसले में साथ नहीं है। तीन तलाक मामले पर भी बोर्ड के अड़ियल रवैये से कई मुस्लिम संगठनों ने खुद को अलग कर लिया था।

अलबत्ता बोर्ड के इस फैसले पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि उसने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को हर हाल में मानने का वचन दिया था। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ही नहीं, बल्कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व अधिकार मामले के मुद्दई इकबाल अंसारी, हाजी महबूब और जमीअत उलेमा-ए-हिंद समेत सभी पक्षकार इस बात को लेकर एकराय थे। अच्छी बात यह है कि बाबरी मस्जिद के लगभग सभी पक्षकारों समेत देश के अधिकतर मुसलमानों ने पूर्व में दिए गए अपने इस वचन को निभाया। नतीजतन मोटे तौर पर पूरे देश के मुसलमानों ने इसको लेकर कोई विरोध-प्रदर्शन नहीं किया और अमन-चैन की फिजा को कायम रखा। इकबाल अंसारी ने तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का खुले दिल से स्वागत करते हुए कहा ‘‘अब हम लोग शांति और सुकून चाहते हैं। हम इस मामले का अंत चाहते हैं।’’ विवादित स्थल पर भूमि स्वामित्व का दावा करने वाले उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जुफर फारूकी ने तो पहले ही पुनर्विचार याचिका न दायर करने की बात कही थी। फिर 26 नवंबर को लखनऊ में हुई वक्फ बोर्ड की कार्यकारिणी समिति की बैठक में बहुमत से रिव्यू पिटीशन न दायर करने का फैसला लिया। इसमें समिति के आठ सदस्यों में से 6 ने पुनर्विचार याचिका न दायर करने पर अपनी मुहर लगाई,जबकि एक सदस्य अब्दुर्रज्जाक इसके विरुद्ध थे। एक सदस्य इमरान माबूद मीटिंग से अनुपस्थित रहे।

सुन्नी वक्फ बोर्ड के बहुमत से लिए गए इस फैसले का भाजपा समेत हिंदू और मुसलमानों के एक बड़े तबके ने स्वागत किया है। ऐसे में बात अगर जमीअत उलेमा-ए-हिंद की की जाए तो इसके मौलाना महमूद मदनी वाले धड़े ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अपनी तमामतर असहमतियों के बावजूद पुनर्विचार याचिका से कोई भले की उम्मीद न होने की बात कहकर अपना पीछा छुड़ा लिया। हां! मौलाना अरशद मदनी के नेतृत्व वाला जमीअत उलेमा-ए-हिंद का दूसरा धड़ा जरूर पुनर्विचार याचिका को लेकर आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से एकमत है। बताते चलें कि जमीअत का यह धड़ा अयोध्या मामले में एक पक्षकार भी था। देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला हर हाल में मानने के वचन को लेकर 9 नवंबर के ऐतिहासिक क्षण के लिए देश का मुसलमान जेहनी तौर पर पूरी तरह से तैयार था। यही वजह है कि हिंदू-मुस्लिम समेत देश के सभी धर्मावलंबियों ने भी अपने तमाम संतोष-असंतोष को दरकिनार कर इस पर अपनी समझदारी दिखाई। अब बोर्ड और जमीअत के अपने पूर्व वचन से पलटने से मुसलमानों का बड़ा तबका अवाक है और उनके इस फैसले में साथ नहीं है। तीन तलाक मामले पर भी बोर्ड के अड़ियल रवैये से कई मुस्लिम संगठनों ने खुद को अलग कर लिया था। अब रही-सही कसर अयोध्या मामले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की उसकी जिद ने पूरी कर दी है।


 
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