लेख

Blog single photo

घुसपैठियों को बाहर करने का रास्ता खुला

03/09/2019

प्रमोद भार्गव
   
सम में 'राष्ट्रीय नागरिक पत्रक' (एनआरसी) की अंतिम सूची आखिरकार तय तरीख को जारी हो गई। इसमें 19.07 लोगों के नाम हटाए गए, जबकि 3.11 करोड़ लोगों के नाम शामिल किए गए। इसके बाद भाजपा समेत अन्य दलों की ओर से बयानबाजी भी शुरू हो गई। राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने अंतिम सूची में बाहर निकाले गए लोगों की कम संख्या पर नाराजगी जताते हुए और ज्यादा लोगों को बाहर निकालने की बात कही है। भाजपा का मानना है कि प्रत्येक विदेशी नागरिक को असम से बाहर किया जाए। नतीजतन असम के वित्तमंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने कहा है कि भाजपा और असम सरकार सूची के पुनर्सत्यापन के लिए एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय जाएगी। इसी तरह का बयान अखिल असम छात्र संघ ने दिया है। कांग्रेस ने किसी भी वैध नागरिक को बाहर नहीं निकालने की बात कही है। हालांकि जो लोग वैध नागरिक होने के बावजूद सूची से बाहर हो गए हैं, उन्हें विदेश अधिकरण के सामने दस्तावेजों के साथ अपनी वैधता जताने का अवसर मिलेगा। इसके लिए संदिग्ध नागरिक को 120 दिन के भीतर अपील करने की सुविधा दी गई है। सिविल न्यायालय में भी अपील की जा सकती है।   
स्थानीय बनाम विदेशी नागरिकों का मसला राज्य के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को लंबे समय से झकझोर रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में अवैध तरीके से भारत में घुस आए बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ असम में करीब 6 साल से आंदोलन चल रहा था। एनआरसी इसी का नतीजा है। आसान शब्दों में कहें तो यह असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की एक सूची है, जो यह तय करती है कि कौन भारत का नागरिक नहीं होने के बावजूद देश में रह रहा है। इस संदर्भ में मूल निवासियों की शिकायत रही है कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में घुसपैठ करके आए मुस्लिमों ने न केवल उनकी आजीविका के संसाधनों को हथिया लिया है, बल्कि कृषि भूमि पर भी काबिज हो गए हैं। इस कारण राज्य का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ गया है। लिहाजा यहां के मूल निवासी बोडो आदिवासी और घुसपैठियों के बीच जानलेवा हिंसक झड़पें होती रहती हैं। नतीजतन अवैध और स्थाई नागरिकों की पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर एनआरसी बनाने की पहल हुई। इसके दिशा-निर्देश के मुताबिक 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को मूल नागरिक माना गया। इसके बाद के लोगों को अवैध नागरिकों की सूची में दर्ज किया गया है। इस सूची के अनुसार 3.29 करोड़ नागरिकों में से 2.89 करोड़ लोगों के पास नागरिकता के वैध दस्तावेज हैं। शेष रह गए 40 लाख लोग 31 अगस्त को जारी सूची आने से पहले अवैध नागरिकों की श्रेणी में रखे गए थे। अब यह संख्या घटकर 19.07 लाख रह गई है। दरअसल घुसपैठिए अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाते हैं, तो यह उन राजनीतिक दलों को वजूद बचाए रखने की दृष्टि से खतरे की घंटी है, जो मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करते हुए घुसपैठ को बढ़ावा देकर अवैध नागरिकता को वैधता देने के उपाय करते रहे हैं।
असम में घुसपैठ का मामला नया नहीं है। 1951 से 1971 के बीच राज्य में मतदाताओं की संख्या अचानक 51 प्रतिशत बढ़ गई। 1971 से 1991 के बीच यह संख्या बढ़कर 89 फीसदी हो गई। 1991 से 2011 के बीच मतदाताओं की तदाद 53 प्रतिशत बढ़ी। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से यह भी देखने में आया कि असम में हिंदू आबादी तेजी से घटी है और मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। 2011 की जनगणना में मुस्लिमों की आबादी और तेजी से बढ़ी। 2001 में यह बढ़ोत्तरी 30.9 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई। जबकि देश के अन्य हिस्सों में मुस्लिमों की आबादी में बढ़ोत्तरी 13.4 प्रतिशत से 14.2 फीसदी तक ही हुई। असम में 35 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी वाली 2001 में विधानसभा सीटें 36 थीं, जो 2011 में बढ़कर 39 हो गई। गौरतलब है कि 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद से 1991 तक हिंदुओं की जनसंख्या में 41.89 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि इसी दौरान मुस्लिमों की जनसंख्या में 77.42 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। इसी तरह 1991 से 2001 के बीच असम में हिंदुओं की जनसंख्या 14.95 प्रतिशत बढ़ी जबकि मुस्लिमों की 29.3 फीसदी बढ़ी। इस घुसपैठ के कारण असम में जनसंख्यात्मक घनत्व गड़बड़ा गया और सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शुरू हो गया। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा बोडो आदिवासियों ने भुगता। इसी के चलते कई बोडो उग्रवादी संगठन अस्तित्व में आ गए थे।     
बांग्लादेशी धुसपैठियों की तादाद बक्सा, चिरांग, धुबरी और कोकराझार जिलों में सबसे ज्यादा है। इन्हीं जिलों में बोडो आदिवासी हजारों साल से रहते चले आ रहे हैं। लिहाजा बोडो और मुस्लिमों के बीच रह-रहकर हिंसक वारदातें होती रही हैं। पिछले 17 साल के दौरान राज्य में हिंसा की 15 बड़ी घटनाएं घटी हैं, जिनमें 600 से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। संतोषजनक पहलू यह रहा कि हिंसा के मूल में हिंदू, ईसाई, बोडो आदिवासी और आजादी के पहले से रह रहे पुश्तैनी मुसलमान नहीं हैं। विवाद की जड़ में स्थानीय आदिवासी और घुसपैठी मुसलमान हैं। दरअसल बोडोलैंड स्वायत्त परिषद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गैर बोडो समुदायों ने बीते कुछ समय से बोडो समुदाय की अलग राज्य बनाने की दशकों पुरानी मांग का मुखर विरोध शुरू कर दिया है। इस विरोध में गैर-बोडो सुरक्षा मंच और अखिल बोडोलैंड मुस्लिम छात्र संध की प्रमुख भूमिका रही है। जाहिर है, यह पहल हिंदू, ईसाई और बोडो आदिवासियों को रास नहीं आ रही।
इन घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता देने के काम में असम प्रदेश कांग्रेस की भूमिका रही है। घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए कांग्रेसियों ने इन्हें बड़ी संख्या में मतदाता पहचान पत्र एवं राशन कार्ड हासिल कराए। नागरिकता दिलाने की इसी पहल के चलते घुसपैठिए कांग्रेस को झोली भर-भर के वोट देते रहे हैं। कांग्रेस की तरूण गोगाई सरकार इसी बूते 15 साल सत्ता में रही। लेकिन लगातार घुसपैठ ने कांग्रेस की हालत पतली कर दी। फलस्वरूप भाजपा सत्ता में आ गई और सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बन गए। घुसपैठ के दुष्प्रभाव पहले अलगाववाद के रूप में देखने में आ रहे थे, लेकिन बाद में राजनीति में प्रभावी हस्तक्षेप के रूप में बदल गए। कांग्रेस का केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व जान-बूझकर इन्हें वोट बैंक बनाए रखने की दृष्टि से अनदेखा करता रहा है। लिहाजा धुबरी जिले से सटी बांग्लादेश की जो 134 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा है उस पर कोई चौकसी नहीं है। नतीजतन घुसपैठ आसानी से जारी है। असम को बांग्लादेश से अलग ब्रह्मपुत्र नदी करती है। इस नदी का पाट इतना चौड़ा और दलदली है कि इस पर बाड़ लगाना या दीवार बनाना नामुमकिन है। केवल नावों पर सशस्त्र पहरेदारी के जरिए घुसपैठ को रोका जाता है।
दरअसल 1971 से ही एक सुनियोजित योजना के तहत पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बिहार और दूसरे प्रांतों में घुसपैठ का सिलसिला जारी है। म्यामांर से आए 60,000 घुसपैठिए रोहिंग्या मुस्लिम भी कश्मीर और हैदराबाद में गलत तरीकों से भारतीय नागरिक बनते जा रहे हैं। राजीव गांधी सरकार ने तत्कालीन असम सरकार के साथ मिलकर फैसला लिया था कि 1971 तक जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को भारत की जमीन से निर्वासित किया जाएगा। इस फैसले के तहत ही अब तक सात बार एनआरसी ने नागरिकों की वैध सूची जारी करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिम वोट-बैंक की राजनीति के चलते सूचियां सार्वजनिक नहीं हो पाईं।    
बांग्लादेश के साथ भारत की कुल 4097 किलोमीटर लंबी सीमा-पट्टी है, जिस पर जरूरत के मुताबिक सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। इस कारण गरीबी और भुखमरी के मारे बांग्लादेशी असम में घुसे चले आते हैं। आसानी से बन जाने वाले आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता प्रमाणपत्र भी इन घुसपैठियों ने बड़ी मात्रा में हासिल कर लिए हैं। भारत में नागरिकता और आजीविका हासिल कर लेने के इन लाभदायी उपायों के चलते ही, देश में घुसपैठियों की तादाद चार करोड़ से भी ज्यादा बताई जाती रही है।
भारतीय गुप्तचर संस्थाओं को जो जानकारियां मिल रही हैं, उनके मुताबिक, पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आईएसआई इन्हें प्रोत्साहित कर भारत के विरुद्ध उकसा रही है। सऊदी अरब से धन की आमद इन्हें धार्मिक कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाकर आत्मघाती जिहादियों की नस्ल बनाने में लगी है। बांग्लादेश इन्हें हाथियारों का जखीरा उपलब्ध करा रहा है। जाहिर है, ये जिहादी उपाय भारत के लिए किसी भी दृष्टि से शुभ नहीं हैं। लिहाजा समय आ गया है कि जो आतंकवादी देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को सांगठनिक चुनौती के रूप में पेश आ रहे हैं, उन्हें देश से बेदखल किया जाए।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
Top