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मीडिल क्लास की नायिका

22/08/2019

मीडिल क्लास की नायिका

 प्रकाश के रे

मीडिल क्लास की महिला के रूप में विद्या सिन्हा की भूमिकाएं, गीतों के साथ चेहरे के हाव-भाव और संवाद के उतार-चढ़ाव लंबे समय तक हिंदुस्तानी महिलाओं के लिए संदर्भ बने रहेंगे।

हिंदी सिनेमा में कामिनी कौशल के बाद विद्या सिन्हा ही ऐसी अभिनेत्री रहीं, जो शादी होने के बाद भी नायिका की मुख्य भूमिकाओं में परदे पर आयीं और अपनी अदाकारी से दर्शकों का दिल जीता। यह तथ्य इसलिए बेहद अहम है क्योंकि दुर्भाग्य से हमारी इंडस्ट्री पहले भी और आज भी उस मानसिकता से उबर नहीं सकी है कि नायिका को ग्लैमरस होना चाहिए और उसे कुंवारी होना चाहिए। कामिनी कौशल के सौंदर्य से उलट विद्या सिन्हा आम लड़कियों और औरतों की तरह दिखती थीं तथा उन्होंने परदे पर आम मध्यमवर्गीय कामकाजी महिलाओं के किरदार को ज्यादा जिया। आज भी फिल्मों की हीरोइनें शायद ही नौकरीपेशा होती हैं और होती भी हैं, तो कोई कॉरपोरेट आॅफिस या आधुनिक पेशों से जुड़ी होती हैं। अगर क्राइम थ्रिलर को छोड़ दें, तो उनके काम का कहानी से बहुत संबंध नहीं होता। ऐसे में 1974 में ‘रजनीगंधा’ में एक क्लर्क की भूमिका कर विद्या सिन्हा ने नई इबारत लिखी।
इस संदर्भ में यह कहना प्रासंगिक होगा कि कुछ दशक पहले कामकाजी महिलाओं के रूप में बार डांसरों या खलनायिकाओं की ही पहचान थी। इस मीडिल क्लास भूमिका का एक महत्व यह भी है कि उस दौर में आजादी के बाद पैदा हुई पहली पीढ़ी नौकरी कर रही थी या उसकी तलाश में थी। उसकी चिंताएं अब आकार ले रही थीं और इन चिंताओं को अभिव्यक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम व्यावसायिक सिनेमा और समांतर सिनेमा के बीच का मीडिल सिनेमा बना। इसके पुरोधा बिमल रॉय के शिष्य ऋषिकेश मुखर्जी और गुलजार हुए, और इस परंपरा को ऊंचाई दी बासु चटर्जी ने। साल 1975 में आयी उनकी फिल्म ‘छोटी सी बात’ में भी विद्या सिन्हा ने मुख्य भूमिका निभायी।
इस फिल्म के निर्माता और भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े फिल्मकारों में शुमार बीआर चोपड़ा ने 1978 में विद्या सिन्हा को लेकर ‘पति, पत्नी और वो’ बनायी। ये तीनों फिल्में बिना ग्लैमर, चकाचौंध, नामी कलाकारों के थीं, पर इन्हें दर्शकों ने सिर-माथे लिया और सुपरहिट बनाया। इस तरह से जैसे परवीन बॉबी और जीनत अमान व्यावसायिक सिनेमा में अपना जलवा बिखेर रही थीं तथा समांतर फिल्मों में लगभग उसी समय और बाद में शबाना आजमी और स्मिता पाटिल दस्तक दे रही थीं, विद्या सिन्हा शहरी कामकाजी महिला बनकर जीवन के संघर्षों और प्रेम के आयामों को उकेर रही थीं। इस लिहाज से उनका काम हिंदी सिनेमा के इतिहास का, खासकर महिला-विषयक पहलुओं के हिसाब से, उल्लेखनीय अध्याय है।
इन फिल्मों में उनका सामना अमोल पालेकर, दिनेश ठाकुर, संजीव कुमार जैसे थियेटर और सिनेमा के मंजे हुए अभिनेताओं से था। ‘रजनीगंधा’ अमोल पालेकर की भी पहली फिल्म थी। साल 1974 में ही आयी ‘राजा काका’ में उनके साथ किरण कुमार थे। यह तथ्य इसलिए उल्लेखनीय है कि विद्या सिन्हा ने इससे पहले सिर्फ कुछ मॉडलिंग की थी और वह भी 18 साल की होने के बाद। हालांकि वे सिनेमा इंडस्ट्री के एक स्थापित परिवार से आती थीं, पर ग्लैमरविहीन भूमिकाओं को उन्होंने पसंद किया। उन्हें निर्देशक और लेखक के रूप में बासु चटर्जी, बीआर चोपड़ा और कमलेश्वर जैसे लोग मिले। ‘रजनीगंधा’ में तो मुख्य पोस्टर पर विद्या सिन्हा का ही फोटो बना हुआ था। इन फिल्मों के उम्दा संवाद और संगीत ने कथानक और कलाकारों की गंभीरता को परवान दिया, तो वहीं हल्के-फुल्के कॉमेडी के अंदाज ने मीडिल क्लास की चिंताओं और अरमानों को बयान किया।
पूरी फिल्म के साथ उसकी वाहक बनीं विद्या सिन्हा की सामान्य स्त्री की छवि। वैसे तो उन्होंने कुल जमा 30 फिल्मों में काम किया और टेलीविजन पर भी अभिनय किया, लेकिन सत्तर के दशक की अपनी छाप पर कोई नया तेवर न दे सकीं। वे कुछ साल दूसरी शादी के बाद आॅस्ट्रेलिया में रहीं और अनबन के बाद तलाक हो जाने पर भारत लौटीं। साल 2011 में सलमान खान अभिनीत ‘बॉडीगार्ड’ से परदे पर वापसी की, लेकिन बात नहीं बन सकी। उनकी सिनेमाई जिन्दगी भी निजी जिन्दगी की तरह अस्थिर रही और 15 नवंबर, 1947 को पैदा हुईं विद्या सिन्हा ने इस साल 15 अगस्त को 71 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।


 
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