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फिर यथास्थिति में राममंदिर मुद्दा

09/08/2019

फिर यथास्थिति में राममंदिर मुद्दा

युगवार्ता डेस्क

राम जन्मभूमि मुद्दा घूम फिरकर एक बार फिर उसी पड़ाव पर आ गया है जहां पहले था। यानी अनसुलझा। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के जरिए देश के इस सबसे बड़े मुकदमे का निदान करने की कोशिश की। लेकिन इसमें पूरी तरह से विफलता हाथ लगी। 155 दिनों की कसरत के बाद मध्यस्थता पैनल के हाथ खाली के खाली रहे। इस पैनल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज कलीफुल्ला, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल थे। नौ साल पहले 2010 में भी आपसी बातचीत से मसले का समाधान करने की कोशिश की गई थी।
लेकिन अगर बातचीत या मध्यस्थता से ही मामले को सुलझ जाना होता तो फिर अदालतों में राम जन्मभूमि का मुद्दा धूल क्यों फांकता रहता। बहरहाल, बातचीत से समस्या का समाधान निकालने की पहल का भी नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा था। इस तरह से देखा जाय तो नौ साल बाद इतिहास ने एक बार फिर अपने को दोहराया है। इस बार भी मध्यस्थता की कोशिश नाकामयाब साबित हुई है। बहरहाल, राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील रामजन्मभूमि मामले में मध्यस्थता की कोशिश असफल रहने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की कोशिश 6 अगस्त से खुली अदालत में रोजाना सुनवाई कर इस मुद्दे का पटाक्षेप करने की है।
मामले की सुनवाई कर रही पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड, अशोक भूषण और एस. अब्दुल नजीर शामिल हैं। पीठ का जोर अगले सौ दिनों में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का है। रोजाना सुनवाई से साफ है कि अब अयोध्या केस समाधान की तरफ तेजी से आगे बढ़ेगा। हालांकि यह भी ध्यान में रखना होगा कि आने वाले दिनों में त्योहार और छुट्टियां पड़ेंगी। यहां रोजाना सुनवाई को लेकर इस भ्रम का शिकार नहीं होना चाहिए कि कोर्ट सोमवार से लेकर शुक्रवार तक हर रोज सुनवाई करेगा। वास्तव में संविधान पीठ सप्ताह में तीन दिन मंगलवार से गुरुवार तक सुनवाई करेगी क्योंकि पीठ बाकी के दो दिन दूसरे मामले देखती है। ऐसे में अयोध्या पर रोजाना सुनवाई हते के तीन दिन होगी।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय की गई सुनवाई की रूपरेखा के तहत संविधान पीठ निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान का केस पहले देखेगी। हिंदू पक्ष पहले अपने तर्क रखेंगे जिससे मुस्लिम पक्ष उसका जवाब दे सकें। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई चूंकि 17 नवंबर 2019 को रिटायर होंगे। ऐसे में उनके रिटायरमेंट से पहले यानी अगले 100 दिनों में मामले में फैसला आने की उम्मीद की जा सकती है। राम जन्मभूमि को लेकर मुखर रहने वाले सुब्रमण्यन स्वामी ने भी उम्मीद जताई है कि सितंबर के आखिर तक सुनवाई पूरी हो जाएगी।
बहरहाल, 6 दिसंबर 1992 के बाद से ही तिरपाल के नीचे सर्दी, धूप व बारिश झेल रहे रामलला के दिन बहुरने वाले हैं, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। एक कटु सत्य यह भी है कि भले ही भगवान राम अपने लिए एक अदद स्थायी घर के लिए तरस रहे हैं। लेकिन इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि मंदिर आंदोलन को सीढ़ी बनाकर न जाने कितने लोग फर्श से अर्श तक पहुंच गये। हालांकि रामलला को अभी तक अपने अच्छे दिनों का इंतजार है। यह इंतजार और अधिक लंबा न हो इसका ख्याल रखा जाना चाहिए।


 
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