युगवार्ता

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उपराष्ट्रपति की पीड़ा

11/07/2019

उपराष्ट्रपति की पीड़ा

आर. के. सिन्हा

राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू सदन में लगातार होने वाले हंगामे से दुखी हैं। वे चाहते हैं कि सदन में सारगर्भित चर्चाएं हो और विधायी कार्य निपटाए जाएं। क्या यह संभव है? उच्च सदन में हंगामा कौन बरपाता है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशता यह आलेख।

दुर्भाग्यवश संसद के उच्च सदन राज्यसभा का स्थायी चरित्र होता जा रहा है हंगामा, शोर शराबा और व्यवस्था के प्रश्न के नाम पर अव्यवस्था पैदा करना। राज्यसभा में सारगर्भित चर्चाओं का नितांत अभाव मात्र ही अब देखने में आ रहा है। इस निराशाजनक स्थिति से सबसे अधिक आहत राज्यसभा के वर्तमान सभापति एवं भारत के उप-राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू स्वयं दिखते हैं। इस संदर्भ में उपराष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति वैंकेया नायडू का 21 जून को राज्यसभा के सदस्यों को किया गया संबोधन उनकी पीड़ा को व्यक्त करता है। मैं उस समय राज्य सभा में उपस्थित था और मैंने सभापति महोदय के भाषण को बड़े ध्यान से सुना।
उनके एक-एक शब्द से उनकी आंतरिक पीड़ा झलक रही थी। उन्होंने कहा-माननीय सदस्यों आप, जनता के प्रतिनिधि हैं और देश की जनता ने आप पर विश्वास करके ही आपको सदन में भेजा है। किन्तु, जब आप इस महान सदन में प्रवेश करते हैं तो आपको यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि आपको करोड़ों आंखें देख रहीं हैं। 2019 के लोकसभा चुनावके बाद आपको एक बार और मौका मिला है कि जनता की आशाओं के अनुरूप आप देश के ज्वलंत मुददों पर वाद-विवाद और संवाद करें। ज्वलंत समस्याओं का समाधान खोजें, सहमति बनायें और ऐसे कानूनों का निर्माण करें जो जनता की जीवन दशा को बेहतर बना सके।

मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि बार-बार राज्य सभा में व्यवधान और हंगामों के कारण जनता में उच्च सदन के प्रति एक नकारात्मक धारणा का निर्माण हो रहा है जो लोकतंत्र के लिए घातक है। प्रश्न काल के एक घंटे का मतलब होता है लगभग 45 सदस्यों द्वारा महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार से जवाब प्राप्त करने का और एक शून्यकाल के संपन्न नहीं होने से कम से कम पन्द्रह सदस्यों को तत्कालीन सामाजिक समस्याओं के प्रति सदन और सरकार का ध्यान खींचने के अवसर से वंचित हो जाना पड़ता है। हमें यह गंभीरतापूर्वक सोचना पडेगा कि आखिरकार हम चाहते क्या हैं? जनता की समस्याओं के प्रति काम करने वाला सदन या बिना किसी बात के हंगामेदार सदन।
हमने यह स्थिति पैदा कर दी है कि जनता अब यह सोचती है कि जब उच्च सदन में ही यह स्थिति है तो लोकतंत्र के ऊपर सचमुच में बड़ा भारी खतरा है। अनेकों विधेयक लोकसभा में बहस के बाद पारित हो जाते हैं परन्तु, राज्य सभा में बिना किसी कारण के अटक जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 107 के अंतर्गत कोई विधेयक लोकसभा पारित कर देती है और उसकी पांच वर्षों की अवधि में राज्यसभा उसे पारित नहीं कर पाती है तो वह विधेयक लैप्स हो जाता है। पिछली लोकसभा द्वारा पारित 22 महत्वपूर्ण विधेयक राज्य सभा पांच वर्षों में भी पारित नहीं कर सकी। अब लोकसभा 22 विधेयकों पर पुनर्विचार कर पारित भी करे तो कम से कम दो-तीन वर्ष तो लग ही जायेंगे और करोडों की सरकारी धनराशि भी बर्बाद हो जायेगी।
जो महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा से पारितहोने के बाद भी राज्य सभा में लंबित रहने के कारण लैप्स हो गये उनमें- भूमि अधिग्रहण विधेयक 2015, फैक्ट्री संशोधन विधेयक 2016, मोटर वाहन संशोधन विधेयक 2017, ग्राहक संरक्षण विधेयक 2018, और कम्पनी संशोधन विधेयक 2019, अनियमित बचत योजनाओं पर प्रतिबंध लगाने वाला विधेयक 2019, आधार एवं संबंधित कानूनों में संशोधन विधेयक 2019, तीन तलाक विधेयक 2017 एवं 2018, बालक बालिकाओं के अवैध खरीद ब्रिकी के संरक्षण प्रतिबंध और पुनर्वास विधेयक 2018, और नागरिकता संशोधन विधेयक 2019,शामिल हैं किन्तु, यह सूची पूरी नहीं है। सभापति महोदय ने यह भी कहा कि:- राज्यसभा के 248वें सत्र की समाप्ति के दिन राज्य सभा में 55 विधेयक लंबित थे जिसमें 22 विधेयक लैप्स हो गये। उनको घटाने के बाद भी अभी 33 विधेयक लंबित हैं। तीन विधेयक तो 20 वर्षों से लंबित हैं। 6 विधेयक 10 से 20 वर्षों की अवधि से लंबित है और 14 विधेयक 5 से 10 वर्षों से लंबित हैं।
33 में से मात्र 10 विधेयक ही ऐसे हैं जो 5वर्षों से कम से लंबित हैं। उपराष्ट्रपति महोदय ने पूछा कि क्या माननीय सदस्यों को पता है कि महत्वपूर्ण इंडियन मेडिकल काउंसिल संशोधन विधेयक,1987 पिछले 32 वर्षों से लंबित है? क्या यह सुखद स्थिति मानी जायेगी? इसी प्रकार 79वां संविधान संशोधन विधोयक 1992, नगरपालिका क्षेत्रों में निर्धारित विस्तार का संशोधन विधेयक 2001, किसानों से संबंधित बीज विधेयक 2004, कीटनाशक संशोधन 2011, खान संशोधन विधेयक 2011, एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले श्रमिकों के कानून में संशोधन विधेयक 2011, महिलाओं के साथ अभद्रता संशोधन विधेयक 2012, बिल्डिंग एवं अन्य निर्माण कामगारों से संबंधित संशोधन विधेयक 2013,वक्फ संपत्ति पर अवैध कब्जा संशोधन विधेयक 2014 आदि ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक हैं जो अभी राज्यसभा में लंबित हैं।
सभापति महोदय ने कहा कि हम सभी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं हमारा योगदान है और हमें गंभीरता से सोचना होगा कि एक सार्थक बहस और सहमति ही इस समस्या का निदान है। हमें वाद-विवाद और संवाद से सहमति ढूंढना है, न कि ‘असहमति’। आज देश की आबादी में 65 प्रतिशत, 35 वर्ष से कम नवयुवक-नवयुवतियों की है। हमें इस आबादी की संरचना को ध्यान में रखते हुए उनके विकास की गति पर खरा उतरना होगा। यदि हम ऐसा कर पायेंगे तभी हम राज्यसभा जिसे उच्च सदन भी कहा जाता है उसकी प्रतिष्ठा को कायम रख सकेंगे और अपने सार्थक योगदान को सिद्ध कर पायेंगे।नायडू की चिंता से वे सभी सांसद अपने को जोड़कर जरूर ही आहत होते होंगे जो राज्य सभा में किसी विधेयक पर बहस के लिए पूरी तैयारी के साथ पहुंचते हैं, पर वहां पर तो बहस की बजाय हंगामा ही हो रहा होता है। उन दुखी सांसदों में मैं भी एक हूं। पिछले पांच वर्षों तक मैंने भी इस अवसाद को भोगा है। सदन को बार-बार बिना वजह स्थगित करना पड़ता है। जब सदन चलेगा ही नहीं तो वहां पर कामकाज कैसे होगा? सच बात तो यह है कि हंगामा करने वाले सदस्यों को अपने दल के नेताओं से हरी झंडी मिली होती है। हरी झंडी इस बात की मिली होती है कि वे सदन में नारेबाजी करते रहे।
कामकाज न होने दें। सरकार के सभी सार्थक प्रयासों का विरोध करें। बहुत बार तो यहां तक देखने में आता है कि किसी दल के नेता की मौजदूगी में ही उसके कुछ सदस्य सदन की कार्यवाही में हंगामा कर रहे होते हैं और नेता भी मौन बैठे मुस्कराते रहते हैं। बहुत साफ है कि ये सब उन नेताओं के इशारों पर हो रहा होता है। जरा देख लीजिए इनके दोहरे मापदंड। मुझे जब विपक्ष के समझदार और विद्वान सदस्य सेन्ट्रल हॉल में हंगामे के बाद सदन स्थगित होने पर मिलते हैं, तो साथ बैठकर हम चाय पीते हैं और गप्पें भी लगाते हैं। उस वक्त विपक्षी सांसद मित्र अपनी व्यथा सुनाते हैं। दिल और दिमाग से न चाहते हुए भी उन्हें हंगामा करना पड़ता है, यह उनकी मजबूरी है क्योंकि, उनके आलाकमान का यही आदेश है। आखिरकार कब तक चलेगा यह? विपक्ष को यह समझना चाहिए कि उनका लक्ष्य सरकार के साथ हर विधेयक पर हुज्जत करना और विधेयक को गिराना नहीं, सरकारी कामकाज पर निगाह रखना है। पर वे तो इस तरह से पेश आते हैं मानो उनका मुकाबला किसी शत्रु देश से हो।

विपक्ष को यह समझना चाहिए कि उनका लक्ष्य सरकार के साथ हर विधेयक पर हुज्जत करना और विधेयक को गिराना नहीं, सरकारी कामकाज पर निगाह रखना है। पर वे तो इस तरह से पेश आते हैं मानो उनका मुकाबला किसी शत्रु देश से हो।

विपक्ष को सिर्फ हंगामा करके यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसके दायित्वों की पूर्ति हो गई। आपको याद होगा राज्यसभा के पिछले कुछ सत्रो के दौरान राफेल विमान सौदा, कावेरी डेल्टा के किसानों की समस्याओं और आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग वगैरह के सवालों पर भारी हंगामा हुआ। इस वजह से सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित हुई। राफेल पर सबसे ज्यादा हंगामा हुआ। लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद अब इस पर कोई बात नहीं कर रहा। बड़ा सवाल यह है कि जिस मुद्दे को इतने जोर-शोर से उठाया जा रहा था अब उस पर मौन क्यों? बहरहाल, ये देखने वाली बात है कि नायडू की सांसदों से नयी अनुकरणीय शुरुआत करने की अपील का कितना सकारात्मक असर होता है।

(लेखक राज्य सभा सदस्य एवं
हिन्दुस्थान न्यूज एजेंसी के अध्यक्ष हैं)


 
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