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सामरिक और आर्थिक मायने

19/09/2019

सामरिक और आर्थिक मायने

जितेन्द्र चतुर्वेदी

चंद्रयान, चंद्रमा पर पहुंच चुका है। यह बहुत बड़ी सफलता है। वह इसलिए क्योंकि अब भारत का अंतरिक्ष में दखल होगा। मौजूदा समय में यह जरूरी भी है। कारण, सुरक्षा है। जमीन पर करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। इसकी वजह यह है कि सब कुछ वहीं से नियंत्रित होता है। मसलन संचार व्यवस्था को ही लें। वह उपग्रह के जरिए चलती है। अगर उसे नष्ट कर दिया जाए तो संचार व्यवस्था ठप हो जाएगी। सूचनाओं का आदान-प्रदान रुक जाएगा। इससे स्थिति कितनी भयावह हो जाएगी, सहज ही कल्पना की जा सकती है। लेकिन कोई देश ऐसा तभी कर सकता है जब अंतरिक्ष में उसका दखल हो।

डीएसए का काम बाहरी अंतरिक्ष में भारतीय हितों की रक्षा करना है। जहां तक बात डीएसआरओ की है तो उसकी जिम्मेदारी तकनीकी सहयोग देने की है। डीएसए के मुखिया वायस चीफ मार्शल हैं। उनके साथ 200 स्टाफ काम कर रहे हैं। यह अतंरिक्ष में राष्ट्रीय हित को सुरक्षित करने की पहल है।

अमेरिका, रूस और चीन का तो अच्छा दखल है। इन लोगों ने सेना भी बना रखी है। जो सीधे तौर पर अंतरिक्ष के सैन्यकरण से जुड़ा है। हालांकि भारत भी किसी से पीछे नहीं है। मिशन शक्ति के जरिए उसने पहला कदम बढ़ा दिया है। मिशन शक्ति वही है जिसमें एक उपग्रह को मार गिराया गया था। यह किसी को डराने या धमकाने के लिए नहीं किया गया था। हां, सावधान करने के लिए जरूर किया गया होगा। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। अतंरिक्ष ही भविष्य है। भारत उसी हिसाब से तैयारी भी कर रहा है। उसने अनुसंधान और सुरक्षा के लिए दो अलग- अलग संगठन बनाए है। एक का नाम रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (डीएसए) है। और दूसरे का नाम अंतरिक्ष रक्षा अनुसंधान संगठन (डीएसआरओ) है। मोटे तौर पर डीएसए का काम बाहरी अंतरिक्ष में भारतीय हितों की रक्षा करना है। जहां तक बात डीएसआरओ की है तो उसकी जिम्मेदारी तकनीकी सहयोग देने की है।

डीएसए के मुखिया वायस चीफ मार्शल हैं। उनके साथ 200 स्टाफ काम कर रहे हैं। यह अतंरिक्ष में राष्ट्रीय हित को सुरक्षित करने की पहल है। चीन इस दिशा में बहुत आगे बढ़ चुका है। उसने अतंरिक्ष के लिए अपनी एक अलग सैन्य टुकड़ी बना ली है। उसे देखते हुए भारत ने अपनी अतंरिक्ष नीति में बदलाव किया है। चंद्रयान उस बदली हुई नीति को नया आयाम देगा। इसके अलावा भी कई कारण हैं जो इस मिशन को महत्वपूर्ण बनाते हैं। एक तो गगनयान ही है। 2021 में मानव को चांद पर भेजने की योजना है। यह तभी संभव है, जब आपके पास चांद तक पहुंचने की क्षमता हो। चंद्रयान-2 ने वहां तक जाने की क्षमता पर मुहर लगा दी है। इसके अलावा अंतरग्रहीय मिशन के लिए भी संभावनाओं के रास्ते खुल गए हैं। भारत भी अब अमेरिका की दूसरें ग्रहों पर मिशन भेज सकता है। यह अनुसंधान के लिहाज से महत्वपूर्ण है। उसमें जानने वाली बात सौर मंडल का इतिहास है। यह सबसे बड़ी पहेली है। उसे सुलझाने के लिए चांद पर जाना जरूरी है। वहीं जाकर समझा जा सकता है कि यह सौर मंडल बना कैसे है।

पृथ्वी आज जिस अवस्था में है, वहां तक कैसे पहुंची, उसे समझने की कुंजी चांद पर ही है। इतना ही नहीं सौर मंडल के अन्य ग्रहों को भी जानने समझने का सफर यही से आरंभ होगा। इसलिए हर देश चांद पर अपनी पहुंच बनाना चाहता है। अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा देश है, जो वहां तक पहुंच सका है। यह इलाका भविष्य की ऊर्जा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हीलियम-3 का यहां खजाना है। इसके अलावा और भी बहुत खनिज मौजूद है। उस पर सबकी नजर है। हालांकि मसला इतना भर नहीं है। अंतरिक्ष क्षेत्र सीधे तौर पर रुपये-पैसे से भी जुड़ा है। जैसा की हम जानते हैं कि भारत कई तरह के उपग्रह अंतरिक्ष में भेजता है। वह दूसरे देशों को भी सेवा मुहैया कराता है। उसके एवज में वह मेहनताना लेता है। इसरो की कमाई का एक जरिया यह भी है। चंद्रयान की सफलता ने इस बाजार को भारत के लिए और बड़ा कर दिया है।



 
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