लेख

Blog single photo

'तीन तलाक' से मिली मुक्ति

01/08/2019

 मनोज ज्वाला
भारतीय मुस्लिम समाज को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग-थलग किये रखने वाली 'तीन तलाक प्रथा' के उन्मूलनार्थ कानून बन जाने से इसके बहुआयामी परिणाम सामने आने वाले हैं। इससे मुस्लिम समाज की दशा और दिशा, दोनों में सुधार होगा। मुस्लिम समाज की औरतें गैर-मुस्लिम स्त्रियों की अपेक्षा अपने ही घर-परिवार में जिस प्रकार के शोषण-उत्पीड़न की जिन्दगी जीने को विवश थीं और देश के संविधान से समानता का अधिकार प्राप्त होने के बावजूद जिस मजहबी फरमान के कारण विषमता का घूंट पीने को मजबूर थीं, उन सब अवांछनीयताओं से उन्हें अब छुटकारा मिल गया। अब कोई भी मुस्लिम औरत अपने शौहर के हाथों शोषित होकर बेवजह उसके द्वारा तीन बार 'तलाक' बोल देने अथवा लिखकर सूचित कर देने मात्र से परित्यक्त नहीं की जा सकती है। अपनी बीवी को तलाक देने के लिए किसी भी मियां को अब भारतीय कानून की प्रक्रियाओं का अनुपालन करना ही होगा। 
प्रकारान्तर में कहें तो यह कि मुस्लिम समाज में शादी भले ही उसके मजहबी शरीअत के अनुसार 'निकाह' की शक्ल में होती रहेगी, किन्तु शादी के बाद उस मजहबी कानून की नकारात्मक भूमिका समाप्त हो जाएगी। अर्थात शादीशुदा मियां-बीवी के पारस्परिक सम्बन्ध को टिकाये रखने में उनके शरीअत की भूमिका चाहे जो भी हो, किन्तु उसके तोड़ने में उसकी कोई भूमिका नहीं रहेगी। उनकी शादियां अगर टूटेंगी तो भारतीय कानून की न्यायसंगत  प्रक्रिया के अनुसार टूटेंगी, जिसके तहत बीवी को उसके शौहर के द्वारा वाजिब कारणों से ही तथा उचित रीति से ही 'तलाक' दिया जा सकेगा ऐसी स्थिति तलाकशुदा पत्नी को गुजारा-भत्ता के साथ-साथ पारिवारिक सम्पत्ति में हिस्सा देना अनिवार्य होगा। जाहिर है, मुस्लिम औरतों को उनके मजहबी कानून की गिरफ्त से मुक्त कर भारतीय संविधान के कानून की परिधि में ले लाने से एक ओर जहां उनका शोषण-उत्पीड़न रुकेगा, दूसरी ओर मर्दों में एकाधिक शादियां करते रहने की प्रवृति भी थमेगी। क्योंकि, अब 'तीन-तलाक' वाली सुविधा समाप्त हो जाने से किसी पत्नी को परित्यक्त कर देना मुश्किल हो गया है। लाखों-करोड़ों मुस्लिम औरतों की जिन्दगी तबाह कर चुकी उस मजहबी कुप्रथा के समाप्त हो जाने से न केवल औरतों के जीवन में सुकून आएगा और वे समानता के अधिकार का सुख अनुभव करेंगी, बल्कि मुस्लिम समाज के मर्द  भी प्रगतिशीलता के पथ पर अग्रसर होंगे।
गौरतलब है कि दुनिया के कई देशों में, यहां तक कि मुस्लिम देशों में अर्थात इस्लामी शरीअत से शासित देशों में भी 'तीन-तलाक' प्रथा प्रतिबन्धित है। पड़ोस के इस्लामी स्टेट पाकिस्तान में भी इस कुप्रथा का वजूद नहीं है। लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज के ठेकेदार मुल्लाओं-मौलवियों ने मजहब के नाम पर अपना अलग ही शरीअत कायम कर रखा था। उसे मजहबी सियासतदारों का संरक्षण मिलते रहता था। मजहब के नाम पर समाज को शासित करने वाले उन रहनुमाओं ने ऐसा हौव्वा खड़ा कर रखा था कि 'तीन-तलाक' उनके 'अल्लाह-खुदा' का फरमान है, जो कानून से भी परे है। उस पर कोई टिका-टिप्पणी तक नहीं कर सकता। उसका निष्पादन-क्रियान्वयन उनका पर्सनल लॉ बोर्ड ही कर सकता है। उनका तर्क हुआ करता था कि इस मामले में शासनिक हस्तक्षेप से उनके धार्मिक अधिकारों का हनन होगा, जो संविधान-प्रदत मौलिक अधिकारों के विरुद्ध समझा जाएगा। तब की कांग्रेसी सरकार उनके इन तर्कों का न केवल समर्थन करती थी, बल्कि उन्हें उनके उस मजहबी कारोबार को शासनिक संरक्षण भी दिया करती थी। ऐसा करके वह उनके वोटों का सौदा किया करती थी। तब ऐसा लग रहा था जैसे देश में संविधान से इतर एक असंवैधानिक मजहबी सत्ता का कानून भी समानान्तर कायम हो। साम्प्रदायिक तुष्टिकरण-आधारित उस वोटबैंक के बावजूद कांग्रेस के सत्ता से बेदखल हो जाने और उसकी नीतियों के विरुद्ध देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करने सहित विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों को उभार कर भाजपा के सत्तासीन हो जाने के बाद से ही यह अपेक्षा की जा रही थी कि देश में एक समान नागरिक कानून कायम किए जाएं, जिसका वादा भी हर संसदीय चुनाव के मौके पर भाजपा करती रही है। ऐसे में 'तीन-तलाक' नामक एक प्रकार के मजहबी कानून को संसद से पारित विधेयक द्वारा निरस्त कर देश की सभी महिलाओं को एक ही कानून के दायरे में ले लाने से अब ऐसा समझा जा सकता है कि भाजपा-सरकार देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की ओर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। सरकार का यह कदम बिल्कुल सधा हुआ संयमित और संतुलित है। पहले महिलाओं को इस बाबत प्रेरित-प्रोत्साहित व जागरूक करने तथा बाद में तत्सम्बन्धी अध्यादेश जारी करने से मुस्लिम समाज में तदनुसार मानस विकसित किया गया। तब इस हेतु विधेयक तैयार कर उसे लोकसभा में पेश किया गया। फिर देशभर में संसद से लेकर गांवों-शहरों के चौपालों तक मुस्लिम औरतों  के सामानाधिकार सम्बन्धी चर्चा-संवाद और बहस-विमर्श होने के बाद जिस तरह से तीन तलाक के विरुद्ध सरकारी पहल के पक्ष में जनमत निर्मित हो जाने पर इसे निरस्त किया गया। समाज में इस बाबत जनमानस निर्मित किए बिना अगर इसे कानूनन प्रतिबन्धित कर दिया जाता, तो अब तक उन मजहबी कठमुल्लाओं के इशारे पर इस्लाम का वास्ता देते हुए मुसलमानों की भीड़ सड़कों पर उतर कर विरोध-प्रदर्शन करने लगती, किन्तु अब हालत ऐसी है कि इस मसले पर उनकी सुनने वाला ही कोई नहीं है। मुस्लिम समाज ही उनसे विमुख हो चुका है। देश का सर्वोच्च न्यायालय तो बहुत पहले ही 'तीन-तलाक' को अवैध घोषित कर चुका है। अब शादी व तलाक मसले पर मुस्लिम औरतें भी एक ही कानून के दायरे में आ गईं। तब जाहिर है, इससे मुस्लिम समाज में मोदी-सरकार के आगामी सम्भावित कदम- समान नागरिक संहिता के बाबत जनमानस निर्मित होने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाएगी। यह जरूरी भी है। छोटे-छोटे कदमों से बड़े-बड़े मुकाम हासिल करना आसान होता है। कठोर परिवर्तनों व सुधारों को अंजाम देने से पहले उन्हें आत्मसात कर सकने योग्य जन-मानस निर्मित कर लेना भी जरूरी होता है। मोदी-सरकार यही कर रही है। देश में एकात्मता स्थापित करने की बाबत सबके लिए एक समान कानून की सख्त आवश्यकता है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि 'तीन-तलाक' से मुक्ति वस्तुतः देश में राष्ट्रीय एकात्मकता स्थापित करने की एक युक्ति है। लेकिन सिर्फ इसी युक्ति से राष्ट्र का अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा, अपितु ऐसी अन्य मजहबी अवांछ्नीयताओं को दूर करने वाली दो-चार अन्य युक्तियों को भी प्रयुक्त करना होगा। उनमें बहुविवाह की रीति और जनसंख्या-नीति को प्राथमिकता देनी होगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
Top