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छात्र आंदोलन के अहम पड़ाव

13/11/2019

छात्र आंदोलन के अहम पड़ाव


जादी के पहले और आजादी के बाद भारत में जितने भी परिवर्तनकारी सामाजिक आंदोलन हुए, उनमें छात्रों की भूमिका बहुत अहम रही है। कुछ ऐसे आंदोलन भी हुए जो पूर्णत: छात्रों के हितों के लिए खड़े किए गए और उनमें समाज के व्यापक हिस्से की भागीदारी नहीं थी, फिर भी इन आंदोलनों ने समाज को झकझोर कर रख दिया और बहुत गहरे में दबे असंतोष को खुलकर आवाज दी। इनमें जेपी आंदोलन को प्रमुख माना जा सकता है, जिसने देश की तात्कालिक तस्वीर बदल कर रख दी। आज भी जेपी आंदोलन को एक नजीर की तरह पेश किया जाता है।स्वतंत्रता के पहले के सभी संघर्ष अविच्छिन्न रूप से आजादी की लड़ाई से जुड़े थे, या कहें उन्हीं का एक लघु संस्करण थे। उनकी स्वतंत्र पहचान नहीं थी, जबकि आजादी के बाद जितने भी आंदोलन हुए उनके मूल में सामाजिक -राजनीतिक बदलाव की चाह थी। 1905 का स्वदेशी आंदोलन पहला संघर्ष था, जिसमें छात्रों ने बड़े पैमाने पर पहली बार हिस्सा लिया। इस आंदोलन का दायरा और प्रभाव काफी व्यापक था।

 उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 1920-22 के दौरान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के पहले ही महीने में करीब 90,000 छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए और राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं में दाखिला ले लिया। उस वक्त देश में करीब 800 राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज थे। पूरे देश में शिक्षा का सामूहिक बहिष्कार हुआ, पर सबसे अधिक असर पश्चिम बंगाल में देखा गया। उसी दौरान इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में कई नए विश्वविद्यालयों की भी नींव रखी गई, जिनमें प्रमुख काशी हिंदू विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ रहे। इन्होंने कालांतर में तमाम क्रांतिकारियों को पैदा किया और आजादी के बाद भी छात्र आंदोलनों के लिए प्रेरणा स्रोत साबित होते रहे।

 1930-31 के दौरान सविनय अवज्ञा आंदोलन में विदेशी कपड़ों और मदिरा के बहिष्कार में छात्रों ने काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। असम में उस ‘कनिंघम सर्कुलर’ के विरोध में छात्रों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली आंदोलन चलाया गया, जिसमें छात्रों एवं उनके अभिभावकों से सद्व्यवहार का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। भारत छोड़ो आंदोलन में हालांकि समाज के सभी तबकों की सहकारिता थी, लेकिन आंदोलन की खबरों को गांव-गांव तक पहुंचाने में खासकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 देश आजाद होने के बाद भी असम के छात्रों ने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा। वस्तुत: आजादी के बाद भी असम कई छात्र आंदोलनों का सूत्रधार बना। 1950 के दशक में असमिया छात्रों के नेतृत्व में एक आंदोलन का सूत्रपात हुआ जिसमें राज्य सरकार की नौकरियों में असमी भाषी लोगों को प्राथमिकता देने तथा असमिया को राज्य की एक मात्र सरकारी भाषा एवं स्कूल तथा कॉलेजों में पढ़ाई का माध्यम बनाने की बात कही गई।

 वैसे तो असम में गैरकानूनी आव्रजन का सवाल 1950 से ही उठता रहा है। किन्तु 1979 के राज्य विधानसभा चुनावों में गैर कानूनी प्रवासियों द्वारा बड़ी संख्या में मतदाता सूची में शामिल होने की बात से वहां के छात्रों के कान खड़े हो गए। इसके विरुद्ध आॅल असम स्टूडेंट यूनियन (ए.ए.एस.यू.) ने ‘असम गण संग्राम परिषद’ (जो क्षेत्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक संगठनों का एक गठबंधन था) के साथ मिलकर गैर कानूनी प्रवासियों के विरुद्ध आंदोलन आरंभ कर दिया। इस आंदोलन ने असमी बोलने वाले हिन्दू हो या मुसलमान और इनमें कई बंगाली भी शामिल थे, वस्तुत:सभी तबकों का समर्थन हासिल किया। इस आंदोलन को इतना भारी जनसमर्थन हासिल था कि सोलह में से चौदह चुनाव क्षेत्रों में चुनाव नहीं हो पाए।

 दक्षिण के राज्यों में छात्र आंदोलनों का अवलोकन करें तो इस बारे में तमिलनाडु की चर्चा अपेक्षित है। वैसे तो हिन्दी तथा हिन्दी भाषियों के विरुद्ध मुहिम तमिलनाडु में काफी अर्से से चल रही थी किन्तु इसके लिए छात्रों द्वारा किया गया संगठित आंदोलन 1965 में देखने को मिला। 25 जनवरी 1965 को छात्रों द्वारा किए गए प्रदर्शन की व्यापकता के बारे में यह कहा जाता है कि तमिलनाडु में स्वतंत्रता की पूरी लड़ाई के दौरान ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रदर्शन में जितने लोगों ने भाग लिया उसकी संख्या सिर्फ इस दिन भाग लेने वाले छात्रों की संख्या से कम है। आलम यह था कि सिर्फ चेन्नई में इस दिन लगभग 50,000 छात्रों ने प्रदर्शन किया। इसी तरह के अनेक प्रदर्शन तमिलनाडु के विभिन्न शहरों में किए गए। बाद में भड़की हिंसा में कई छात्र मारे भी गए।

 इन सभी आंदोलनों की चमक उस आंदोलन के सामने फीकी पड़ जाती है जिसमें छात्रों की न सिर्फ राष्ट्रव्यापी भागीदारी रही बल्कि इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक नवीन अध्याय को जन्म दिया। यह आंदोलन था 1974 का जेपी आंदोलन। वस्तुत: इसकी शुरुआत गुजरात से हुई जहां जनवरी 1974 में अनाज, रसोई तेल और अन्य आवश्यकपदार्थों की कीमतों में हुई वृद्धि से पैदा हुआ जनाक्रोश, राज्य के शहरों और महानगरों में छात्र आंदोलन के रूप में फूट पड़ा। विपक्षी दलों ने शीघ्र ही इसमें हिस्सा लेना शुरू कर दिया। दस सप्ताह से अधिक समय तक राज्य में करीब-करीब अराजकता छाई रही। हड़ताल, लूट-पाट, दंगे और आगजनी की घटनाएं घटती रहीं। जवाब में पुलिस ने भी अंधाधुंध गिरμतारियां, लाठीचार्ज और गोलीबारी का सहारा लिया। किंतु फरवरी 1974 में केंद्र सरकार को राज्य सरकार पर त्यागपत्र देने के लिए दबाव डालने पर मजबूर होना पड़ा। गुजरात विधानसभा निलंबित कर दी गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

 गुजरात आंदोलन की सफलता से प्रेरणा लेकर उसके पद चिह्न पर चलते हुए मार्च 1974 में बिहार के छात्रों ने भी इसी प्रकार का आंदोलन शुरू कर दिया। छात्रों ने अपनी शुरुआत 18 मार्च को विधानसभा के घेराव से की और अति सक्रिय पुलिस के साथ बार-बार मुठभेड़ होने लगी। फलत: एक सप्ताह के भीतर 27 छात्र मारे गए। बिहार आंदोलन गुजरात से इस अर्थ में भिन्न था कि जयप्रकाश नारायण ने अपने राजनीतिक संन्यास त्याग कर इस आंदोलन का नेतृत्व करने लगे। उन्होंने छात्रों को संगठित कर ‘छात्र संघर्ष वाहिनी’ बनाई और ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया यह उस व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष था जो हर व्यक्ति को भ्रष्ट होने पर मजबूर कर रही थी।

 मंडल विरोधी आंदोलन सवर्ण वर्ग के छात्रों द्वारा शुरू किया गया था। जब वीपी सिंह सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा की थी। यह छात्र आन्दोलन बहुत ही संगठित तरह से आयोजित किया गया था। आंदोलन का मुख्य मांग जाति आधारित आरक्षण को हटाने और आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करना था।


 
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