युगवार्ता

Blog single photo

फिल्म और भविष्य की आहट

02/08/2019

फिल्म और भविष्य की आहट

 मनोज मोहन
सिनेमा हमेशा से साहित्य के निकट रहा है। यह अलग बात है कि आज हम जो वैश्विक समाज देख रहे हैं, उसकी बुनियाद में आर्थिक और व्यावसायिक हित सर्वोपरि हो गए हैं। उसके व्यवहार में नीतियां प्रमुख हैं, नैतिकता नहीं। इसका असर हम आपसी संबंधों और मानवीय सरोकारों पर पड़ता देख रहे हैं। स्थानीय भाषाएं, साहित्य, कलाएं और संस्कृतियां ही संवेदनशील समाज का दर्पण है। इसी आलोक में विजय शर्मा ने ‘सिनेमा और साहित्य : नाजी यातना शिविरों की त्रासद गाथा’ में होलोकास्ट पर लिखे साहित्य और उन पर बनी फिल्मों का जिक्र किया है।
वे कहती हैं कि मनुष्य एक स्वतंत्रचेता प्राणी है और उससे अनुशासन के नाम पर उसकी स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती। होलोकास्ट जिसे सामान्यत: यहूदियों के जातीय सफाये के अर्थ में लिया जाता है, की उस विभीषिका में यहूदियों की एक पूरी पीढ़ी को मौत के घाट उतार दिया गया था। ग्रीक भाषा में भी होलोकास्ट का अर्थ है पूरी तरह जला देना और यही उस वक्त किया गया था। साठ लाख यहूदियों को जिंदा जला दिया गया, उन्हें गैस चैंबर में डालकर भून दिया गया था। उस समय यहूदी शिक्षा, व्यापार, उद्योग, संगीत, कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में सबसे अलग थे, सबसे अव्वल थे। और यही अव्वल होना उनका दोष करार दिया गया था। रोमान पोलांस्की ने तो अपनी आंखों के सामने अपने माता-पिता को नाजियों के हत्थे चढ़ते देखा था।
इसके बावजूद उन्होंने शिंडलर्स लिस्ट का निर्देशन करने से यह कहते हुए इंकार किया था कि होलोकास्ट से बचने वाले भाग्य और संयोग से बचे थे न कि किसी के हृदय-परिवर्तन से। लेकिन बाद में ‘द पियानिस्ट’ की कहानी पढ़ते हुए उन्होंने इस सच्चे अनुभव और इतिहास के अंधेरे पक्ष पर फिल्म बनाई। आज भी रोमान पोलांस्की की ‘द पियानिस्ट’ को देखते हुए एक गहरी पीड़ा आंखों को नम कर जाती है। उन अनुभूतियों और दारुण स्थिति को पढ़ते-देखते सहसा विश्वास नहीं होता कि आदमी, आदमी के ऊपर ऐसा भयंकर अत्याचार कर सकता है। लेखिका ने ‘द पियानिस्ट’ को शिंडलर्स लिस्ट पर तरजीह देते हुए सोफीज च्वॉइस, सनशाइन और द ग्रे जोन को विशेष रूप से सराहा है। उन्होंने निरपेक्ष भाव से होलोकास्ट से जुड़े साहित्य और फिल्मों के बारे में एक जगह इतनी जानकारियां जुटाने का मुश्किल भरा काम किया है। कहते हैं सही समय पर निर्भीक होकर सही सवाल पूछना बहुत सारे अन्यायों को रोक सकता है।
काश यह प्रश्न पूरी शिद्दत के साथ तत्कालीन समय में किया गया होता, तो शायद इस भयंकर होलोकास्ट से बचा जा सकता था। जर्मन लेखक गुंटर ग्रास जैसे महान लोग ही अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से एक साथ खेल सकते हैं। लेखिका गुंटर ग्रास की आत्मस्वीकृतियों का जिक्र करते हुए कहती हैं कि वे शुरू में होलोकास्ट को प्रौपेगैंडा समझ रहे थे। जबकि वास्तविकता से परिचित होते ही उन्होंने अपनी पूरी सर्जनात्मक ऊर्जा नाजीवाद और उसके अतीत के खिलाफ वातावरण तैयार करने में झोंक दी। 2005 में जब हैरोल्ड पिंटर को नोबेल पुरस्कार मिला तो उन्होंने भी तत्कालीन परिस्थितियों में प्रश्न पूछने को सबसे अहम दायित्व माना था।
भारत में भी उपनिषद का एक नाम प्रश्नोपनिषद ही है। इस किताब से हमें अपने वर्तमान समय के वैश्विक प्रश्नों से जूझने का साहस मिलता है। विजय शर्मा इस किताब के माध्यम से पाठकों को होलोकास्ट पर बनी तमाम फिल्में देखने के लिए प्रेरित करती हैं। नि:संदेह अंग्रेजी में लिखे लेखों से सामग्रियों का चयन किया गया है, लेकिन हिंदी में पढ़ने वालों के लिए यह महत्त्वपूर्ण किताब है। इस किताब में शामिल कई लेख पूर्व प्रकाशित है। अगर परिकथा में प्रकाशित एक ऐसे ही पुराने लेख की भाषागत छंटाई हो जाती तो अच्छा रहता।


 
Top