युगवार्ता

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महात्मा गांधी की स्वदेश वापसी

12/08/2019

महात्मा गांधी की स्वदेश वापसी

जुगनू शारदेय

इस पुस्तक का काल 9 जनवरी, 1915 से 9 जनवरी, 2015 है। जबकि इसे होना चाहिए था 1917 तक यानी चंपारण की कथा तक। इसका कारण यह है कि 2019 महात्मा गांधी का 150वीं जयंती मनायी जा रही है। दरअसल संपूर्ण गांधी वांग्मय पढ़ना कठिन भी है, पर इसे पढ़ना सरल है। एक और प्रकाशकीय संकट है कि प्रकाशकों को थोड़ी मोटी किताब चाहिए, इसलिए यह कुछ ज्यादा पृष्ठों की हो गयी है। इतिहासकारों के लेख से यह पुस्तक भरी पड़ी है। अपनी बात के तहत संपादक ने ‘गांधीजी की डायरी, इंटरव्यू और अखबारों की प्रतिक्रिया तथा भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ‘संपूर्ण गांधी वांग्मय’ खंड तेरह, 1965 और ‘गांधीजी की आत्मकथा’ पर आधारित है।
डायरी लिखने और अपने सहयोगियों को लिखने के लिए कहते थे। 9 जनवरी 1915, 28 फरवरी तक की डायरी है। इसमें 24 जनवरी, रविवार को गांधीजी लिखते हैं : मोढ़ जाति की ओर अभिनंदन (यहां मोढ़ जाति का मतलब तेली या घांची से है) महात्मा गांधी की बातें, महात्मा गांधी की जुबानी: यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें गांधीजी को भारतीय रेल का अनुभव है: बर्दवान पहुंचकर हमें तीसरे दरजे का टिकट लेना था। उसे लेने में परेशानी हुई। जवाब मिला ”तीसरे दरजे के यात्री का टिकट पहले से नहीं दिया जाता” मैं स्टेशन मास्टर से मिलने गया। उनके पास मुझे कौन जाने देता? किसी ने दया करके स्टेशन मास्टर को दिखा दिया।
मैं वहां पहुंच गया। उनसे भी वही उत्तर मिला। खिड़की खुलने पर टिकट लेने गया, पर टिकट आसानी से मिलने वाला न था। बलवान यात्री एक के बाद एक घुसते जाते और मुझ जैसों को पीछे हटाते जाते। आखिर टिकट मिला। गाड़ी आई। उसमें भी जो बलवान थे, घुस गए। बैठे हुए और चढ़ने वालों के बीच गाली-गलौज और धक्का-मुक्की शुरू हुई। इसमें हिस्सा लेना मेरे लिए संभवतया हम तीनों इधर से उधर चक्कर काटते रहे। सब ओर से एक ही जवाब मिलता था, ‘यहां जगह नहीं है’ मैं गार्ड के पास गया। उसने कहा ‘जगह मिले तो बैठो, नहीं तो दूसरी ट्रेन में जाना’। मैंने नम्रतापूर्वक कहा,’लेकिन मुझे जरूरी काम है।’ यह सुनने के लिए गार्ड के पास समय नहीं था। मैं हारा। मगन लाल से कहा, ‘जहां जगह मिले बैठ जाओं।’ पत्नी को लेकर मैं तीसरे दरजे के टिकट से ड्योढ़े दरजे में घुसा। गार्ड ने मुझे उसमें जाते देख लिया था। आसनसोल स्टेशन पर गार्ड ज्यादा किराए के पैसे लेने आया।
मैंने कहा, ‘मुझे जगह बताना आपका धर्म था। जगह न मिलने के कारण मैं इसमें बैठा हूं। आप मुझे तीसरे दरजे में जगह दिलाइए। मैं उसमें जाने को तैयार हूं।’ गार्ड साहब बोले ‘मुझसे बहस मत कीजिए। मेरे पास जगह नहीं। पैसे न देने हों, तो गाड़ी से उतरना पड़ेगा।’ मुझे किसी भी तरह पूना पहुंचना था। गार्ड से लड़ने की मेरी हिम्मत नहीं थी। मैंने पैसे चुका दिए। उसने ठेठ पूना तक का यह ड्योढ़ा भाड़ा लिया।
यह अन्याय मुझे अखर गया। गांधीजी का अखरना बहुत सारी बातों को उनके मन में बस गया। उनकी जवानी का दक्षिण अफ्रीका का रेल अनुभव भारत के रेल अनुभव से बुरा तो नहीं रहा होगा। डा. रजी अहमद भले आदमी हैं। उन्हें किसी ने समझाया होगा कि गांधीजी पर लिखें या लिखवाएं। बस उन्होंने सभी इतिहास पढ़ाने वालों को, एक दो को छोड़कर लिखने का आग्रह किया। जो भी हो किताब न अच्छी है, न बुरी। पूरी गांधी वांगमय पढ़ने से तो बेहतर ही है।


 
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