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पहचान पर संकट या राजनीति

24/01/2020

पहचान पर संकट या राजनीति

अरविन्द कुमार राय

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए)और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर पूर्वोत्तर में हंगामा बरपा है। हालांकि अब यह मद्धिम पड़ा है। इस कानून का विरोध प्रदर्शन पूर्वोत्तर से शुरू हुआ। खासकर असम में विरोध हिंसक हुआ। बाद में देश के अन्य हिस्सों में भी प्रदर्शन हुए। सच्चाई से इतर अफवाहों का बाजार अभी भी गर्म है। सीएए और एनआरसी का अर्थ को समझने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। विरोध करने वालों का एकमेव एजेंडा इसे रद्द कराना है।असम और पूर्वोत्तर में भाषा, इतिहास, संस्कृति, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार की दुहाई देकर आंदोलन हो रहा है। देश के दूसरे हिस्से में इसे मुसलमानों के साथ जोड़ दिया गया है। मुख्य तौर पर हिंसक आंदोलन असम, त्रिपुरा, मेघालय और मणिपुर में हुआ। असम में जहां 5 लोगों की जान गई। असम सहित अन्य राज्यों में सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया गया। हिंसा को रोकने के लिए असम, त्रिपुरा, मेघालय में कμर्यू लगाने पड़े। मोबाइल और इंटरनेट सेवा को भी कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा। नए कानून का असम में विरोध मुख्यत: ब्रह्मपुत्र घाटी में हो रहा है। जबकि, बराक घाटी के अलावा छठी अनुसूची में शामिल हिस्सों में कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहा है।असम की बात करें तो अंग्रेजों के शासन काल से ही असमिया और बांग्ला भाषा के बीच दरार पैदा हुई थी। वह आज भी कायम है।

पूर्वोत्तर के विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस और वामपंथियों को लंबे समय से भाजपा का विरोध करने के लिए कोई मजबूत मुद्दा नहीं मिल रहा था। इनका कोई भी हथकंडा आम नागरिकों को प्रभावित नहीं कर रहा था। इसलिए नए कानून को आधार बनाकर अफवाह फैलाया गया। साथ ही धार्मिक और भाषाई चश्में से लोगों के बीच राजनीति की एक महीन लकीर खींचने की कोशिश जारी है।

साठ के दशक में यहां भाषा के नाम पर बड़ा आंदोलन हुआ। वहीं 1979 से 1985 तक असम में हिंसक आंदोलन हुए। इस आंदोलन का मूल आधार ‘अवैध बांग्लादेशी भगाओ’ था। आठ सौ से ज्यादा लोग इसमें मारे गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आंदोलनकारियों के साथ असम समझौता किया, तभी यह आंदोलन खत्म हुआ। असम समझौते में ही एनआरसी लागू कर 25 मार्च 1971 के बाद असम आए विदेशियों की पहचान कर उसे बाहर करना था। तीन दशक तक असम में एनआरसी लागू नहीं हुआ। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम में इसे लागू किया गया।सीएए के तहत सरकार 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए वहां के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात कही गई है। सत्ता में रहते कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई भी 2014 तक भारत आए लोगों को नागरिकता देने की बात कहते रहे। तब कांग्रेस सभी लोगों की नागरिकता देने की बात कर रही थी। जबकि भाजपा शरण लेने आए वहां के प्रताड़ित अल्पसंख्यक की बात कहती है। भाजपा घुसपैठियों को बाहर निकालने पर आज भी अडिग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में भी नागरिकता संशोधन विधेयक को लाया गया था। तब असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में भारी विरोध हुआ। दूसरे कार्यकाल में जैसे ही इस कानून को सदन में पेश करने की सुगबुगाहट शुरू हुई, पूर्वोत्तर में एक बार फिर विरोध की राजनीति शुरू हो गई थी।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा इस बात को भलीभांति मानकर चल रहे थे कि पूर्वोत्तर में एक तबका इसका विरोध करेगा। यही कारण है कि अमित शाह ने पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों के नेताओं को दिल्ली बुलाकर उनकी आपत्तियों पर चर्चा की। चर्चा के दौरान कुछ संगठन और राजनीतिक दल सरकार सहमत नजर आए। वहीं कुछ संगठन यह कहते हुए इसका विरोध किया कि कानून बनने के बाद पूर्वोत्तर के लोगों की पहचान खतरे में पड़ जाएगी। फिर भी अमित शाह ने इस मुद्दे पर सबको आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। उन्होंने पूर्वोत्तर की अस्मिता को संरक्षित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का आश्वासन दिया। बावजूद इसके विरोध करने वालों को सरकार के आश्वासनों पर भरोसा नहीं हुआ। नतीजा पूर्वोत्तर में आंदोलन आरंभ हो गया। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में एक-एक प्रमुख छात्र संगठन हैं। यह राज्य की राजनीति को कमोबेश प्रभावित करता है। अखिल असम छात्र संस्था (आसू) पूर्वोत्तर में सबसे बड़ा छात्र संगठन है। कहने को आसू छात्र संगठन है। पर हकीकत में ऐसा नहीं है। गैर राजनीतिक होते हुए भी आसू राजनीतिक मामलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है।

आसू का प्रभाव पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी समान रूप से है। अन्य राज्यों के प्रमुख छात्र संगठन भी आसू की तर्ज पर ही राजनीतिक क्षेत्र में दखल देते हैं। आसू के नेतृत्व में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के छात्र संगठनों को एक कर नार्थ ईस्ट स्टूडेंट आॅगेर्नाइजेशन (नेसो) का गठन किया गया है। इसी संगठन के नेतृत्व में सीएए के विरुद्ध पूरे पूर्वोत्तर में आंदोलन चलाया जा रहा है। इसमें ऐसे राज्य भी शामिल हैं, जहां सीएए का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। बावजूद इसके सिर्फ आसू का साथ देने के लिए उन राज्यों में आंदोलन हो रहे हैं। नए कानून को लेकर कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के साथ ही गैर राजनीतिक संगठनों ने भ्रम फैलाया है। अगर सीएए अस्तित्व में आता है तो असमिया भाषा, संस्कृति, इतिहास, परंपरा आदि पूरी तरह से बदल जाएगी। स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे। अफवाह फैलाने वालों में वामपंथी विचारों की पोशाक कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) के संस्थापक और मुख्य सलाहकार अखिल गोगोई प्रमुख हैं। अखिल ने भ्रम फैलाया कि इस कानून से बांग्लादेश में रहने वाले एक करोड़ 90 लाख से अधिक हिंदुओं को यहां लाकर असम में बसाएगी। जब उनसे इन आंकड़ों के बारे में पूछा जाता तो वे जवाब नहीं दे पाते। हालांकि, अखिल गोगोई को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने सीपीआई (माओवादी) नेता होने के आरोप में गिरμतार कर चुकी है।

नए कानून का असर मुख्य तौर पर असम, मेघालय, त्रिपुरा और नगालैंड के कुछ हिस्सों तक ही होगा। कारण, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम में इनर लाइन परमिट की व्यवस्था है। जिसकी वजह से देश के लोग भी वहां बस नहीं सकते। इस कड़ी में मणिपुर को भी जोड़ा गया है। केंद्र सरकार ने लंबे समय से राज्यवासियों की इस मांग को मानते हुए नए कानून के साथ ही इसे लागू कर दिया है। वहीं दूसरी ओर असम, नगालैंड, मेघालय और त्रिपुरा के अधिकांश इलाके जनजातीय है। इस कारण वह क्षेत्र संविधान की छठी अनुसूची में आते हैं। ऐसे इलाकों में जनजातीय संस्कृति को संरक्षित किया गया है। देश का नागरिक भी इन क्षेत्रों में बस नहीं सकता है। यानी नए कानून का प्रभाव असम, मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा के गैर जनजाति बहुल वाले इलाकों में ही पड़ना है। इसलिए विरोध की वजह कुछ और ही नजर आती है। 2014 के बाद से पूर्वोत्तर में राजनीतिक बदलाव जिस तरह से हुआ है, उससे वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस के साथ ही कुछ क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व पूरी तरह से हाशिए पर चला गया। यह भी सत्य है कि आजादी के बाद पहली बार जिस गति से पूर्वोत्तर का विकास हो रहा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था।

राजनीतिक पार्टियों को लंबे समय से भाजपा का विरोध करने के लिए कोई मजबूत मुद्दा नहीं मिल रहा था। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का कोई भी हथकंडा आम नागरिकों को प्रभावित नहीं कर पा रहा था। ऐसे में नए कानून को आधार बनाकर इसे धार्मिक और भाषाई चश्मे से लोगों के बीच राजनीति की एक लकीर खींचने की कोशिश की गई है। ताकि, भाजपा विकास की लाख बातें करें लेकिन लोग अपनी अस्मिता के नाम पर उनसे जुड़े। सत्ताधारी पार्टी भाजपा शतरंज की इस चाल को विफल करने में जुटी हुई है। असम के मुख्यमंत्री सवार्नंद सोनोवाल कहते हैं, ‘विपक्षी पार्टियां बांग्लादेशी हिंदुओं को लेकर जो आंकड़े दे रही हैं, उसमें कोई सच्चाई नहीं है। नए कानून के तहत 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आए लोगों को ही नए कानून का लाभ मिलेगा।’ यहां की सरकारों के आश्वासन के बाद मेघालय को छोड़कर नगालैंड, अरुणाचल, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में आंदोलन का स्वर काफी धीमा हो चुका है।


 
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