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कांग्रेस का दोहरा रवैया

24/01/2020

कांग्रेस का दोहरा रवैया

जितेन्द्र चतुर्वेदी

मैडम, मैं शरणार्थियों के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। हमारे देश के विभाजन के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे मुल्कों में जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं, उन्हें वहां बहुत प्रताड़ित किया जाता है। इस वजह से वे भागकर भारत आ जाते हैं। वे शरणार्थी की तरह यहां रहते हैं। भारत सरकार को चाहिए कि वह उन अभागों के लिए व्यवस्था करे। उनको नागरिकता देने की प्रक्रिया को सहज बनाएं।… मैं आशा करता हूं कि उप प्रधानमंत्री मेरी बातों पर गौर करेंगे और नागरिकता अधिनियम में फेरबदल करेंगे। ताकि इन अभागों के साथ न्याय हो सके।….यह बात भारत के बाद में बने प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने 2003 में राज्यसभा में कही थी। वे चाहते थे कि तत्कालीन एनडीए सरकार नागरिकता अधिनियम में संशोधन करें ताकि बांग्लादेश और पाकिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता मिल सके। कमोवेश यही मांग अशोक गहलोत ने भी की थी। यह वाकया 2012 का है। तब पी चिदंबरम गृहमंत्री हुआ करते थे।

कांग्रेस के बड़ें नेताओं सहित कई अन्य दलों के नेताओं ने यही मांग की थी। वह भी कांग्रेस राज में। कांग्रेस ने तब अपने ही वरिष्ठ नेताओं की मांग पूरा नहीं की। क्योंकि कांग्रेस सरकार ने हिम्मत नहीं जुटाई। आज कांग्रेस नेताओं की मांग को मोदी सरकार ने पूरा किया। मगर वह स्वागत नहीं विरोध कर रही है। हिंसा के लिए उकसा रही है।

अशोक गहलोत उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने तब तत्कालीन गृहमंत्री को एक पत्र लिखा था। उसमें मांग की थी कि पाकिस्तान से आए हिन्दू और सिख भाइयों को नागरिकता दी जाए। पी. चिदंबरम ने या कहें तत्कालीन यूपीए सरकार ने अशोक गहलोत की मांग नहीं मानी।मौजूदा सरकार ने उनकी मांग को पूरा कर दिया। उसने नागरिकता देने के लिए कानून में संशोधन कर दिया। लेकिन कांग्रेस उसका स्वागत नहीं कर रही है। वह तो विरोध पर उतर आई है। उसके दिग्गज नेता कल तक बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात कर रहे थे। जब एनडीए ने उनकी मांग मान ली तो उसके खिलाफ खड़े हो गए। कह रहे हैं कि यह काला कानून है। इसमें भेदभाव किया जा रहा है। सोनिया गांधी तो दलबल के साथ धरने पर बैठ गई थी। लेकिन सबसे ज्यादा चौकाया उनके बयान ने। उन्होंने जो कहा, वह कम से कम उन्हें शोभा नहीं देता। वह इसलिए क्योंकि उनका दल हमेशा से इसका पक्षधर रहा है।

25 सितंबर 1947 को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई थी। उसमें तय हुआ था कि पाकिस्तान के गैर-इस्लामिक लोग जब चाहे, भारत वापस आ सकते हैं। उस कार्य समिति में महात्मा गांधी भी थे और पंडित नेहरू भी। तो क्या यह माना जाए कि दोनों किसी धर्म विशेष के खिलाफ थे? या फिर साम्प्रदायिक थे? कारण वे ही चाहते थे कि गैर-इस्लामिक लोग जब चाहें, भारत आ सकते हैं। तब कांग्रेस ने इसे गलत नहीं माना था। उसे तब भी कोई गलती नहीं लगी थी, जब इंदिरा गांधी ने यूगंडा के हिन्दुओं को भारत लाकर बसाया था। वह गलत नहीं थीं। कांग्रेस ने उसे कभी इस तरह से देखा भी नहीं। राजीव गांधी ने भी करोड़ों तमिलों को भारत में बसाया था। वह एक ऐसा दौर था जब तमिल श्रीलंका में हिंसा के शिकार थे। उनके लिए तत्कालीन राजीव सरकार ने प्रावधान किया और उन्हें भारत की नागरिकता दी। तब भी किसी न शोर नहीं मचाया। सिर्फ तमिलों को क्यों? मुस्लिमों को क्यों नहीं? इसे साधारण घटना के रूप में लिया गया था। वह थी भी। कांग्रेस भी इसे जानती थी। उसे मालूम है कि कोई भी सरकार ऐसा ही कदम उठाती। लेकिन मौजूदा समय में वह इसका विरोध कर रही है।

जाहिर तौर पर उसकी वजह राजनीतिक है। लेकिन वह खतरनाक है। इसलिए क्योंकि कांग्रेस की वजह से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ रहा है। सामाजिक ताना टूटने की कगार पर खड़ा है। कांग्रेस उस पर राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। इसे कोई भी जायज नहीं कह सकता। फिर भी कांग्रेस भ्रम फैलाने में लगी है। शायद वह चाहती है कि हिंसा और भड़कें। संभव है कि यही उनकी राजनीति हो। अगर ऐसा नहीं होता तो हिंसा के दौरान सोनिया गांधी ने जिस तरह का संदेश जारी किया, वैसा जारी करने से वे परहेज करतीं। जनता से शांति बनाए रखने की अपील करती। चलिए, अगर मान लिया जाए कि राजनीति के तहत वे शांति बनाए रखने की अपील नहीं करती तो कम से कम हिंसा न करने की अपील तो कर ही सकती थीं।

कांग्रेस भ्रम फैलाने में लगी है। शायद वह चाहती है कि हिंसा और भड़कें। संभव है कि यही उनकी राजनीति हो। अगर ऐसा नहीं होता तो हिंसा के दौरान सोनिया गांधी ने जिस तरह का संदेश जारी किया, वैसा जारी करने से वे परहेज करतीं। जनता से शांति बनाए रखने की अपील करती। चलिए, अगर मान लिया जाए कि राजनीति के तहत वे शांति बनाए रखने की अपील नहीं करती तो कम से कम हिंसा न करने की अपील तो कर ही सकती थीं।

भाजपा और सरकार के लोग बार-बार यही सवाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि सोनिया गांधी का संदेश ऐसे समय में आया, जब पूरा देश हिंसा की आग में झुलस रहा था। उस दौर में उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस उन छात्रों और लोगों के साथ खड़ी है जो संघर्ष कर रहे हैं। लोगों को गलत निर्णय व नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने और अपनी चिंता जाहिर करने का हक है। कांग्रेस पार्टी भरोसा दिलाती है कि वह संविधान के आधारभूत मूल्यों को बचाए रखने के लिए हो रहे आंदोलन में पूरी तरह लोगों के साथ है।’ भाजपा का दावा है कि यह हिंसा भड़काने वाला संदेश था। इनकी माने तो कायदे से उन्हें शांति की अपील करनी चाहिए थी। पर उन्होंने और उनकी पार्टी ने ऐसी कोई अपील से परहेज किया। उनका इरादा हिंसा को बढ़ावा देने का रहा। उसी लिहाज से पार्टी अपील करती रही और धरना देकर, उसे बढ़ावा दे रही है। उसका मानना है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम संविधान के मूलभूत सिद्धांतों से इत्तेफाक नहीं रखता। उनका दावा है कि यह समानता के आधार का उल्लघंन है। लेकिन सरकार कांग्रेस के दावों को सिरे से खारिज कर रही है। खुद गृहमंत्री कई साक्षात्कार में कांग्रेस के दावों की पोल खोल चुके हैं। प्रधानमंत्री भी कह रहे हैं कि कांग्रेस दुष्प्रचार कर रही है। कैसे? उस पर आने से पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम को जानना होगा। यह नागरिकता देने वाला कानून है। इसमें नागरिकता छीनने का कोई प्रावधान नहीं है। यह कानून अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से जो अल्पसंख्यक किसी भी कारण से बतौर शरणार्थी भारत आए है, उन्हें नागरिकता देता है।

कांग्रेस ऐसा कई बार कर चुकी है। वह जानती भी है कि भारत को इस संशोधन की जरूरत भी थी। उसकी वजह नेहरू-लियाकत समझौता था। यह समझौता 1950 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ। इसके चार बिंदु थे। पहला, अल्पसंख्यकों को अपने मूल देश जाकर संपत्ति बेचने का अधिकार होगा और वहां की सरकार उन्हें सुरक्षा देगी। दूसरा, अपहरण की गई महिलाओं और लूटा गया सामान वापस दिया जाएगा। तीसरा, जबरन धर्म परिवर्तन मान्य नहीं किया जाएगा। चौथा, अल्पसंख्यकों को बराबरी का अधिकार दिया जाएगा। संसद में कई बार समझौते को लेकर सवाल पूछे गए। सरकार ने हर बार माना कि पाकिस्तान में हिंदुओं के अधिकारों का लगातार हनन हो रहा है। अगस्त 1966 में भारतीय जनसंघ के सांसद निरंजन वर्मा ने सरकार से पूछा था कि नेहरू-लियाकत समझौते की स्थिति क्या है? तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने उत्तर दिया, ‘पाकिस्तान लगातार अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित कर रहा है।’

राज्यसभा में 1970 में तत्कालीन विदेश मंत्री दिनेश सिंह ने भी इस समझौते पर सरकार को असहाय बताया था। उनका कहना था कि बंटवारे के 20 साल बाद तक पाकिस्तान से भारत में शरणार्थी आते रहे क्योंकि पाकिस्तान ने उनकी सुरक्षा का वादा पूरा नहीं किया। वहां, वे प्रताड़ित होते रहे। बांग्लादेश देश में भी वही हाल रहा। अफगानिस्तान की कहानी भी अलग नहीं रही। इस वजह से तमाम पीड़ित अल्पसंख्यक का भारत की ओर पलायन जारी रहा। वे यहां शरणार्थी के तौर पर गुजर-बसर करने लगे। मौजूदा सरकार ने उन्हें एक गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार मुहैया कराया। महात्मा गांधी और पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के गैर इस्लामिक लोगों से इसका वादा किया था। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उस वादे को पूरा किया। शायद इसलिए कांग्रेस इसका विरोध कर रही है।



 
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