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राष्ट्र निर्माण में कहानी शिक्षण का महत्व

19/03/2020

इंटरनेशनल स्टोरी टेलिंग डे 20 मार्च पर विशेष
मुरलीधर गुर्जर
जानवरों की कहानियां हो या फिर परियों की, सभी में मानसिक आनंद तो मिलता ही है, उत्सुकता के साथ-साथ सुनने वाले के मन में एक मानसिक संसार का निर्माण हो रहा होता है। यही कारण है कि कहानियों का महत्व प्राचीनकाल से आजतक कम नहीं हुआ। कहानियां साहित्य का हिस्सा है और साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज में किस-किस तरह की विचारधाराएं, सोच, नजरिया, विश्वास, भेदभाव, संस्कृति व जीवनशैलियां हैं, कहानी पढ़कर इसका आभास किया जा सकता है। साहित्य में लेखक का सृजन अनुभवों पर आधारित कल्पना के रूप में होता है जो लम्बे अनुभवों एवं विश्लेषण के बाद निकलकर आता है। थीम, विषय वस्तु, पात्र, समस्याएं/चुनौतियां आदि मिलकर ही एक कहानी का रूप लेती है। बच्चे जन्मजात भाषिक क्षमता के साथ जन्म लेते हैं पर वह भाषा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संदर्भों में ही सीख पाता है क्योंकि उसकी भाषाई अभिव्यक्ति संदर्भ के हिसाब से ही होती है। इस अभिव्यक्ति में उम्र के हिसाब से क्लिष्टता आती जाती है। पर यह भी सत्य है कि भाषा बिना समाज के नहीं सीख सकते। कहानी बच्चे को यह सभी संदर्भ देकर भाषा के विकास में मदद कर रही होती है।
कहानी असली घटना पर आधारित हो या फिर काल्पनिक पर उसे सुनाते वक्त श्रोता का ध्यान आकर्षण पर भी हमारा जोर होता है। श्रोताओं के लिए महत्वपूर्ण चीज कहानी से अपना संबंध जोड़ना है। वह कहानी के पात्रों की कल्पना अपने अनुभवों के अनुसार करता जाता है। कहानी में आयी घटनाओं व पात्रों के कर्मों के औचित्य-अनौचित्य की विवेचना करता है। क्योंकि हर कहानी से अपने ही हिसाब से सीख लेना, बच्चे का मौलिक अधिकार है, आप उसे अपने हिसाब से ही नैतिक मूल्य नहीं सीखा सकते। बालक उसी कहानी को ठीक से समझ पाएगा जो उसके अनुभव संसार से जुड़ रही हो। इसलिए किस उम्र के बच्चों को कौन-सी कहानी सुनाएं या पढ़ने को दें यह सोच-समझकर चुनने का मामला है।
हमारे आसपास बच्चों के लिए कई सारी कहानियों का संग्रह है जैसे पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक, महाभारत, बेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, पौराणिक कहानियां, देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों की लोककथाएं, ऐतिहासिक कहानियां, परिवेशीय दंतकथाएं आदि आदि। कहानियों को लेकर कुछ पत्रिकाएं भी काफी वर्षों से काम कर रही हैं जिनमें चंपक, नंदन, बालहंस आदि-आदि हैं। बहुत सारी समाजसेवी संस्थाएं जो बच्चों की शिक्षा पर कार्य कर रही हैं, वे भी बच्चों के स्तर की शिक्षण सामग्री में कहानियों का समावेश कर रही हैं। जिनमें एकलव्य की चकमक, पिटारा पत्रिका है, साईकिल, प्लूटो जैसी पत्रिकाएं भी आ रही हैं। कुछ प्रकाशन भी बच्चों के लिए अच्छी कहानियों का प्रकाशन कर रहे है जिनमें नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इण्डिया, सीबीटी प्रकाशन, एकलव्य प्रकाशन, भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति आदि-आदि है। इन्होंने छोटे बच्चों के लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकों का प्रकाशन किया है। बड़ों के लिए कुछ और भी प्रकाशन कार्य कर रहे है। पाठ्य पुस्तकों में भी विशेषकर प्राथमिक कक्षाओं में कहानियों का समावेश लगभग पूरी पुस्तक में 30-40 प्रतिशत हिस्सा कहानियों के पाठकों का ही होता है। सरकार की और से प्रयास किये जा रहे हैं कि प्रत्येक विद्यालय में एक पुस्तकालय होना जहां बच्चे कहानियों की पुस्तकें पढ़ सकें। कई गैर सरकारी संगठनों ने बच्चों के लिए पुस्तकालय चलाने पर काफी कार्य किया है। इन सभी का प्रयास यही है कि बालमन के सामने अधिक से अधिक कहानियां पढ़ने के लिए आ पाएं। बच्चों में अधिक से अधिक सीखने की ललक होती है, कहानियां उनकी इस ललक को बनाये रखते हुए संसार की समझ दे रही होती है।
कहानियों पर किस तरह शिक्षण कार्य करवा सकते हैं, इसे लेकर कई शिक्षाविदों ने योगदान दिया है। उनका मानना था कि कहानी आनंद के लिए ही नहीें यह बालक के सर्वांगीण विकास में काफी मददगार है। जरूरत है अच्छी कहानियों का चुनाव कर, विविध आयामों के साथ कार्य करने की। इसको शिक्षण प्रक्रिया में अहमियत देने की। गिजूभाई बधेका, प्रोफसर कृष्ण कुमार, टाॅल्सटाॅय एवं शिक्षा पर नवाचार करने वाली संस्थाओं ने भी शिक्षण में कहानियों का भरपूर उपयोग किया है। इसमें शक नहीं कि जहां शिक्षण प्रक्रिया में कहानियों का उपयोग करने के अवसर दिये जा रहे हैं, वहां बच्चों की भाषाई क्षमता, तर्क, चिंतन, विश्लेषण एवं सामाजिक मूल्य अंकुरित होते दिखायी देंगे। कहानी सुनाना व पढ़ने के अलावा उसपर चर्चा करना, किसने क्या किया? आप उसकी जगह होते तो क्या करते? साथ ही कहानी पर नाटक किया जा सकता है। नाटक करने की क्षमता हर बच्चे में होती है। नकल करना, किसी बात को बढ़ा-चढ़कर कहना, अपने जीवन के अनुभवों को हावभाव के साथ पुनः प्रस्तुत करना, यह सब वह किसी न किसी रूप में करता ही रहता है। अतः बच्चों को इसके लिए उपयुक्त वातावरण दिया जा सकता है। आरम्भ में साज-सज्जा, पोशाक, एक निश्चित संवाद याद करने की बजाए सामान्य रूप से ही डायलाॅग व बिना पोशाक के यह किया जा सकता है। बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ाने के लिए कहानी सृजन का कार्य भी विविध तरीकों से किया जा सकता है। जब ऐसी प्रक्रियाएं बच्चों के साथ चलेंगी तो स्वतः ही उमें पढ़ने की आदत विकसित होगी।
सदियों से कहानियां बच्चों के सामाजिकरण में मदद कर रही होती थी। उनमें संस्कार बना रही होती थी पर आधुनिकीकरण के युग में तीन वर्ष के बच्चे को स्कूलों एवं आंगनबाड़ी में भेजा जाने लगा है। मन बहलाने के लिए उनके सामने मोबाइल व टेलीविजन एवं कम्प्यूटर के खेल आ रहे हैं। परिवार के सदस्य कहानियां सुनने-सुनाने की बजाए मोबाइल, टेलीविजन देखने में व्यस्त होते है। बच्चों से बातें करने का समय कम होता जा रहा है। सरकार, संस्थाओं एवं शिक्षाविदों के प्रयासों के बावजूद शिक्षण संस्थाओं में कहानियां बक्सों में ही बंद नजर आती हैं। हर बच्चे तक कहानियां पहुंच नहीं पा रही है। जिसका हश्र यह हुआ कि बच्चों का कहानी सुनने व पढ़ने का नैसर्गिक व मौलिक अधिकार खत्म होता नजर आता है। अतः बदली हुयी परिस्थितियों में स्कूल व आंगनबाड़ी में कहानी शिक्षण पर बढ़ावा देकर, सामुदायिक भागीदारी से गांव-गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय संचालित कर, पंचायत स्तर पर संचालित गांधी पुस्तकालयों को और व्यवस्थित रूप से चलाकर, बच्चों को ऐसे अवसर और अधिकता से उपलब्ध करवाने की जरूरत है जहां पर उसे पुनः कहानियां पढ़ने व सुनने के अवसर मिले, जिससे उसकी भाषाई क्षमता मजबूत होने के साथ-साथ उसमें वे तमाम तरह के कौशल, समझ व मूल्य विकसित हो पाएं जो एक कहानी से हो रहे होते हैं, ताकि आगे जाकर बालक एक विवेकपूर्ण समझ के साथ जिम्मेदार नागरिक के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ अपनी भूमिका निभाकर राष्ट्र व समाज निर्माण में अहम भूमिका निभा सके।
कहानी का समाज व राष्ट्र निर्माण में महत्व अब दुनिया समझ चुकी है। यह इस बात से भी झलकता है कि संसार में हर वर्ष 20 मार्च को कहानी दिवस के रूप में देखा जाने लगा है। इसकी शुरूआत सबसे पहले स्वीडन में 1991 में की गयी। 1997 में ऑस्ट्रेलिया ने पांचदिवसीय कहानी उत्सव के रूप में मनाया। इस प्रकार 2009 तक आते आते 20 मार्च संसार में कहानी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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