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बाटला हाउस एक औसत थ्रिलर.......

18/09/2019

बाटला हाउस एक औसत थ्रिलर

प्रकाश के रे\

पराध, आतंक, जासूसी और मनोवैज्ञानिक फिल्में हर दौर में पसंद की जाती रही हैं क्योंकि वे समकालीन समाज की चिंताओं की अनेक परतों के संदर्भ में प्रासंगिक होती हैं। निखिल आडवाणी द्वारा निर्देशित ‘बाटला हाउस’ इसी कड़ी में है। कुल मिलाकर इसे समीक्षकों की भी ठीक-ठाक सराहना मिली है तथा प्रदर्शन के सात दिनों में साठ करोड़ रुपये से अधिक की कमाई भी यह इंगित करती है कि फिल्म दर्शकों को आकर्षित कर रही है। सितंबर, 2008 में दिल्ली में हुए अनेक बम धमाकों के आरोपियों की खोज में पुलिस ने शहर के एक हिस्से ओखला के बाटला हाउस मुहल्ले में एक μलैट में दबिश दी थी। इस कार्रवाई में दोनों ओर से चली गोलियों से दो संदिग्ध आतंकियों और एक पुलिस इंस्पेक्टर की मौत हो गई थी। दो लोगों को गिरμतार किया गया था, जबकि एक भागने में कामयाब रहा था। इस मुठभेड़ पर कई तरह के सवाल उठे थे और अदालती आदेश पर मानवाधिकार आयोग ने इसकी जांच की थी।

आईएसआई और लश्करे-तैय्यबा के आतंकी एजेंडे को आगे बढ़ाने में इंडियन मुजाहिदीन ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उस भूमिका पर लगाम लगाने में बाटला हाउस मुठभेड़ और बाद की जांचों से ही कामयाबी मिली थी।

यह प्रकरण फिल्म का कथानक है। कार्रवाई और जांच के केंद्र में रहे पुलिस अधिकारी का किरदार जॉन अब्राहम ने निभाया है। फिल्म कई जगहों पर अच्छे कथानक, निर्देशन, एक्शन और अदाकारी से प्रभावित करती है। अब्राहम और उनकी पत्नी की भूमिका में मृणाल ठाकुर तथा अन्य मुख्य कलाकारों ने उल्लेखनीय काम किया है। फिल्म को देखने लायक बनाने में पार्श्व संगीत और संपादन का बड़ा योगदान है। निर्देशक के पास कथानक को उत्कृष्ट बनाने का पूरा अवसर था। बाटला हाउस प्रकरण की कहानी सिर्फ एक दशक पुरानी है और इससे संबंधित हर पक्ष व जांच के दस्तावेज उपलब्ध हैं। अनेक लोगों ने फिल्म की आलोचना इस आधार पर भी की है कि इसमें पुलिस के पक्ष को ही सही दिखाया गया है। इस आलोचना को नकार भी दें, तो निर्देशक और लेखक के पास उस μलैट में रहनेवाले लड़कों तथा मुठभेड़ पर सवाल उठाने वाले तर्कों को समाहित कर उनकी काट प्रस्तुत करने के ठोस आधार थ् ा े । ऐसा कर कहानी को एकतरफा होने से बचाया जा सकता था और पुलिस की कार्रवाई को भी सही रोशनी में रखा जा सकता है।

फिल्मकार अगर इसे पुलिस अधिकारी और उसकी कार्रवाई की जांच के आयाम पर ही टिकी रहती, तो फिल्म उम्दा बन सकती थी। उसकी मानसिक बेचैनी, पारिवारिक तनाव, इस्लामिक अतिवाद की चुनौती आदि कारकों को अगर लाया ही गया है, तो उन्हें बेहद गंभीरता के साथ परदे पर लाना चाहिए था। ऐसी फिल्मों में मुख्य किरदारों की मानसिक बेचैनी और हमेशा किसी आसन्न संकट या हमले की आशंका के साथ सामान्य पारिवारिक व सामाजिक जीवन बिताने में बाधाओं जैसे तत्व होते हैं, पर उन्हें महज कहानी को लंबा खींचने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। अगर फिल्म को नायक के नजरिये से लिखा जाना था, तो फिर परस्पर विरोधाभासी मतों को आखिरी हिस्से में डालने की जरूरत नहीं थी। चूंकि दर्शक को पहले ही कहानी और उसके अंत का अंदाजा हो जाता है, तो गवाहियों के अलग- अलग होने से कोई सस्पेंस या थ्रिल नहीं पैदा हो पाता है। पुलिस अधिकारी की आंतरिक बेचैनी और अपने कर्तव्य के प्रति उसके समर्पण के साथ दर्शकों का एका बनने में भी बाधा आती है।

ऐसी कथा में कुछ अन्य किरदारों पर भी फोकस किया जाना था, लेकिन फिल्म पूरी तरह से अब्राहम की भूमिका के इर्द-गिर्द घूमती है। अहम किरदारों की तादाद ज्यादा होने से कहानी की सघनता बढ़ती है। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में पाकिस्तानी सेना की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई और लश्करे-तैय्यबा गिरोह के आतंकी एजेंडे को आगे बढ़ाने में इंडियन मुजाहिदीन ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उस भूमिका पर लगाम लगाने में बाटला हाउस मुठभेड़ और बाद की जांचों से ही कामयाबी मिली थी। इनसे संबंधित बहसों का भी आतंकवाद की समस्या और उससे जूझने के विमर्श में योगदान रहा है। इन पहलुओं का भी संज्ञान लेकर फिल्म एक महत्वपूर्ण कथानक रच सकती थी। लेकिन निर्देशक ने एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर को मेलोड्रामा और स्टार पावर के सामान्य बॉलीवुड फॉर्मूले में समेटकर बॉक्स आॅफिस पर सुरक्षित खेलने का विकल्प चुना। बहरहाल, एक समकालीन घटना पर फिल्म बनाकर निखिल आडवाणी ने 2013 के अपने ‘डी-डे’ के सिलसिले को आगे बढ़ाया है। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि कहानी क्या है, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कहानी कैसे कही गई है।


 
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