युगवार्ता

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गोरक्षा विरोधी है यह कानून

02/08/2019

गोरक्षा विरोधी है यह कानून

 संजय कुमार झा

मध्य प्रदेश में गोवध, गोमांस रखना और लाना-ले जाना निषेध है। प्रदेश सरकार इस कानून के संबंध में एक ऐसा संशोधन विधेयक ला रही जिसमें इस तरह की अनिवार्यता खत्म हो रही है। इसे लेकर लोगों में रोष देखा जा रहा है।

कांग्रेस ने कसम खा रखी है कि वह एक समुदाय विशेष को खुश रखने के लिए कुछ भी कर सकती है, भले ही पार्टी रसातल में चली जाए। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले यह खबर आयी थी कि मध्य प्रदेश सरकार गोरक्षकों के कथित उत्पात से निपटने के लिए कानून बनाएगी। राज्य सरकार का तर्क था कि विधानसभा चुनाव से पहले जारी घोषणा पत्र में पार्टी ने इसका वादा किया था, उसी को पूरा करने के लिए ऐसा किया जाएगा।
कमलनाथ सरकार ने यह जताने का प्रयास किया कि पार्टी राज्य की जनता से किए वादों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इसके ऐलान की टाइमिंग से अंदाजा लगाना कठिन नहीं था कि कांग्रेस का निशाना कहां था। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने पार्टी को सकते में डाल दिया, तो मामला कुछ समय के लिए धीमा रहा। लेकिन कांग्रेस ने जो जिन्न बोतल से निकाल दिया था, उसका कुछ तो करना था, तो संशोधन विधेयक विधानसभा में पेश कर दिया गया। लेकिन विपक्ष के कड़े विरोध के बाद राज्य सरकार ने संशोधित कानून को प्रवर समिति, सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने का फैसला किया है। असल में मध्य प्रदेश में गोवध, गोमांस रखना और लाना-ले जाना निषेध है।
गायों की रक्षा के लिए 2004 में शिवराज सरकार ने यह कानून बनाया था। उसमें यह प्रावधान है कि गोवंश को कहीं लाने या ले जाने के लिए सरकार द्वारा जारी परमिट आवश्यक है। लेकिन संशोधन विधेयक में इसकी अनिवार्यता खत्म कर दी गयी है। सीधे-सीधे कहें तो यह प्रावधान गो तस्करों या कसाईखाना चलाने वालों को खुश करने वाला है। इसका व्यवहारिक पक्ष यह है कि अगर किसी की गाय कोई जबरदस्ती ले जा रहा हो, तो भी वह उसे रोक नहीं सकता, क्योंकि उसे हिंसक गोरक्षक करार दिया जाएगा।
गोमांस के लिए गायों की अवैध तस्करी को रोकने का प्रयास करने वालों के बारे में जिस तरह की हवा बनायी गयी है, उसमें गोरक्षा का प्रयास करने वाले अपने को शायद ही निर्दोष साबित कर पाएंगे। अगर राज्य सरकार भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा को रोकने के लिए सचमुच गंभीर है, तो उसे हर तरह की हिंसा को उसमें शामिल करना चाहिए। पूरे देश में केवल गोरक्षा में ही हिंसा नहीं होती। बच्चों को उठाने, चोरी-डकैती के मामले में भी भीड़ हिंसक हो जाती है। इसके अलावा धार्मिक भावनाएं भड़काने के नाम पर भी हिंसा की जाती है। उसका क्या? जिस तबरेज अंसारी को लेकर देश भर में हंगामा मचा हुआ था, वह एक चोर था। संयोग की बात है कि वह मुसलमान था। अभी कुछ दिन पहले ही बिहार के सारण में तीन लोगों को भीड़ ने भैंस चुराने वाला समझ कर मार डाला।

विधेयक में क्या है प्रावधान 
प्रस्तावित विधेयक में यह प्रावधान है कि जो कोई भी गायों की सुरक्षा के नाम पर हिंसा करेगा उसे एक से पांच साल तक की सजा हो सकती है। साथ में 25 से 50 हजार तक का जुर्माना भी भरना पड़ेगा। अगर वह व्यक्ति दोबारा ऐसा करता पाया जाएगा और उसका अपराध साबित हो गया, तो उसे दो गुनी सजा होगी। इतना ही नहीं गोरक्षा के नाम पर हिंसा के लिए उकसाने वाले को एक से तीन साल तक की सजा हो सकती है।

मरने वालों में हिंदू भी थे और मुसलमान भी। भीड़ जाति और धर्म पूछ कर मारपीट नहीं करती है। चूंकि गायों की तस्करी या गोमांस के धंधे में अधिकतर मुसलमान ही हैं। इसलिए वह भीड़ की हिंसा के शिकार होते हैं। दिक्कत यह है कि कोई उनको यह कहने के लिए तैयार नहीं है कि आप गैरकानूनी ढंग से गोमांस का करोबार ना करें। बिहार के कई शहरों में खुलेआम सड़क किनारे गायों को काटा जाता है और गोमांस की बिक्री होती है। दुकान पर बोर्ड नहीं होता पर उसके आगे कटे पैर रख दिए जाते हैं। आप समझ जाइए कि वहां गोमांस है। सड़कों पर आवारा गाय-बैल घूमने पर हिंदुओं खासकर यादवों का मजाक उड़ाया जाता है, पर कम ही लोग जानते हैं कि वे गाय-बछड़े कसाईखानों के होते हैं। उनको पहचानने के लिए उनके कान पर बना निशान या छेद देख सकते हैं। पर इतना करने की किसको फुर्सत है।


 
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