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मॉब लिंचिंग की रोकथाम के लिए करने होंगे सामूहिक प्रयास

02/08/2019

चन्द्र प्रकाश
झारखंड के दुमका जिलान्तर्गत चिहुंटिया गांव में गुरुवार को तड़के एक व्यक्ति की चोरी के शक में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। पुलिस का कहना है कि भोला हाजरा नामक युवक हिस्ट्रीशीटर था। इससे मॉब लिंचिंग (भीड़ की हिंसा) पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। वैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, असम, राजस्थान के कुछ पिछड़े इलाकों में मॉब लिंचिंग कोई नई बात नहीं है। देश के दूसरे इलाकों में भी यदा-कदा इस प्रकार की घटनाएं होते ही रहती हैं। विपक्ष का कहना है कि मोदी राज में मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ गई हैं। संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मॉब लिंचिंग यानी भीड़ की हिंसा गूंज रही है। इस प्रकार की हिंसा में लोगों के एक समूह की भूमिका होती है। यह वैयक्तिक और संगठित न होकर बिना सोचे-समझे की गई प्रतिक्रिया है। अब यह एक प्रकार का चलन बनता जा रहा है। इस हिंसा में किसी की जान जाती है। इसलिए कानून के लिहाज से यह अपराध है। इसके दोषियों पर भी कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसके मूल में अधिकतर मामलों में अफवाह या अंधविश्वास ही होता है। अक्सर निरपराध व्यक्ति ही इसका शिकार बनते हैं। इसका एक दुखद पहलू यह भी है कि इस प्रकार की हिंसा को भी जाति-धर्म के चश्मे से देखा जाता है। इस नजरिए से सोचने वाले लोगों को समझना चाहिए कि भीड़ की न तो कोई पहचान होती है और न ही कोई धर्म। इस हिंसा में विवेक का भी सर्वथा अभाव होता है। इसलिए इसको किसी खास वर्ग से जोड़ कर देखना न तो तर्कसंगत ही जान पड़ता है और न ही विवेकसम्मत।
ऐसा भी नहीं है कि पहले भीड़ की हिंसा नहीं होती थी। बदलाव सिर्फ इतना आया है कि पहले यह घटनाएं मीडिया में सुर्खियां नहीं बनती थीं और दब जाती थीं। वर्तमान में मीडिया का तेजी से विस्तार हुआ है। तकनीक ने इसे गति प्रदान कर दिया है। मीडिया की सक्रियता से अब ऐसी घटनाओं का तत्काल पर्दाफाश और देश में बहस शुरू हो जाती है। बुद्धिजीवी अपने-अपने ढंग से मीमांसा करने लगते हैं। यह सही है कि सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इसको हतोत्साहित करने के लिए कड़ी कार्रवाई भी की जानी चाहिए। सिर्फ कानून बनाकर ही इतिश्री नहीं कर लेनी चाहिए। हिंसा करने वालों को यह साफ संदेश दिया जाना चाहिए कि कानून को हाथ में लेने वालों को कदापि बख्शा नहीं जाएगा। इसको लेकर देश के तीनों प्रमुख अंगों विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के साथ चौथे स्तम्भ प्रेस को भी देश और समाज हित में ईमानदारी से प्रयास करने होंगे।
कानून बना देने से ही अपराध नहीं थम जाते हैं। कहा जाता है कि अपराधी बड़े सयाने होते हैं। वे बचने का रास्ता निकाल लेते हैं। हालात इतने खराब हो गए हैं कि जुल्म के शिकार को ही बचाव के लिए बार-बार निशाना बनाया जाता है, ताकि वह चुपचाप सब कुछ सहन कर ले। 'जबरा मारे, रोने न दे' की तर्ज पर धड़ल्ले से खून-खराबा किया जा रहा है। आखिर हम किस युग या समाज में जी रहे हैं, जहां बचपन खेल नहीं पाता और जवानी जी नहीं पाती। उससे ही पहले कोई क्रूर पंजा दबोच लेता है। इससे भी अधिक तकलीफ तब होती है जब यह सिलसिला लगातार जारी रहता है। ऐसे संगीन जुर्म करने वाले या तो बच जाते हैं या जेल में मौज काटते हैं और पीड़ित न्याय की आस में ही जीवन गुजार देता है। अपने देश के सिस्टम कहीं न कहीं छेद है, जिसके चलते लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसा कब तक चलेगा? कब तक मासूम बच्चे और निरीह लोग हवश या हत्या के शिकार बनेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि अब कोई नया सिस्टम बन रहा है, जिसमें मनमर्जी की खुली छूट होगी। देश को चलाने वाली संस्थाएं सिर्फ सफेद हाथी बनकर राष्ट्र को सुशोभित करेंगी। यदि ऐसा हुआ तो हालात और भी खतरनाक हो जाएंगे। देश में एक ऐसी परिस्थिति बन जाएगी, जहां किसी भी व्यक्ति या संस्था का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। सब एक दूसरे के आमने-सामने महाभारत के लिए तैयार होंगे। शांति और मानवता आंख मूंदे कहीं कोने में दुबकी होगी। जिस प्रकार प्रकृति से किया गया खिलवाड़ सब पर भारी पड़ रहा है, उसी प्रकार मानवता से किया गया दुर्व्यवहार भी गले की फांस बन जाएगा। उस समय हमारे पास कुछ कहने-सुनने या सोचने-समझने का भी वक्त नहीं होगा। हालात ऐसे न बनें और भावी पीढ़ी भी जीवन पाने का कुछ आनंद उठा सके, इसके लिए जरूरी है कि समय रहते गम्भीरता से उपाय किए जाएं। 
देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ प्रेस को गम्भीरता से सोचने की जरूरत है। समय और परिस्थिति विचित्र और विषम बन गई है। अपराध का दानव पूरे समाज को निगलने की स्थिति में पहुंच गया है। अगर पूरी ताकत और सच्चाई से इसका अंत नहीं किया गया तो यह सबके लिए घातक सिद्ध होगा। जो त्राहि-त्राहि की आवाज दूर से सुनाई पड़ रही है, वह एकदम करीब होगी। आज जो दूसरों के साथ हो रहा है, कल वह हमारे साथ भी होगा। इसलिए इसकी रोकथाम के लिए सभी को संकल्पबद्ध होना पड़ेगा। विधायिका को चाहिए कि वो कड़े प्रावधान करे। कार्यपालिका को चाहिए कि वो विधियों का कड़ाई से पालन करे। न्यायपालिका को चाहिए कि दोषियों को सजा मिले। प्रेस को चाहिए कि देश में सद्भावना का प्रसार हो और नफरत फैलाने वाली नकारात्मक शक्तियों का निषेध हो। समाज के हर छोटे-बड़े नागरिक के जेहन में यह बात पैठनी चाहिए कि हर गुनाह की सजा होती है। यदि हम इसमें कुछ कामयाब हो गए तो आने वाली पीढ़ी को सुंदर माहौल दे सकते हैं। अन्यथा हमारे पीछे हमारी पीढ़ियां भी अंधकार और अराजकता की खोह में लुप्त हो जाएंगी।  
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)    


 
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