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भारतीय परंपराओं एवं जीवन मूल्यों में छिपे रक्षा कवच

24/03/2020

डॉ. मोक्षराज
लॉर्ड मैकाले चाहता था कि भारत की शिक्षा नीति ऐसी बने कि जिसके प्रसार से भारतीय लोग अपनी संस्कृति व सभ्यता से ग्लानि करने लगें तथा उस पद्धति से पढ़े-लिखे भारतीय लोग अंग्रेजों की जीवनशैली को बेहतर मानें। वेदों के जर्मन विद्वान् प्रो. मैक्समूलर का लक्ष्य था भारतीय अपनी संस्कृति से घृणा करें। ब्रिटेन फूट डालकर भारत को गुलाम बनाये रखना तथा उसके सभी संसाधनों-खजानों पर उनका कब्जा जमाना चाहता था। मुगल तलवार व जेहाद के बल पर भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते थे। चर्च चालाकी, लालच व चमत्कार के पाखंड से भोले लोगों को भ्रमित कर धर्मान्तरित करने के मंसूबों पर काम कर रहा था। वस्तुतः ये सभी मतवादी ऐसा पाप कर रहे थे कि जिससे विश्व के सभी मानव संकट में पड़ सकते थे। आज यदि भारत में आर्य संस्कृति की परंपरा नष्ट हो चुकी होती तो न संसार में योग, प्राणायाम-ध्यान की परंपरा रहती न दाह-संस्कार की वैज्ञानिक पद्धति, न नमस्ते करने की रीति होती न शाकाहारी भोजन बनाने के सैकड़ों ढंग बच पाते और न ही गोत्र प्रणाली के निर्वाह से आनुवांशिकी (जेनेटिक) विकास का विज्ञान समझ आता।
कोरोना वायरस, स्वाइन फ़्लू, प्लेग, एचआईवी-एड्स जैसी गंभीर संक्रामक बीमारियाँ तथा ग्लोबल वार्मिंग, परमाणु रेडिएशन, पर्यावरण प्रदूषण, कैंसर, मधुमेह और जैनेटिक बीमारियाँ विश्व की बड़ी समस्याओं में गिनी जाती हैं। तनाव, एकाकीपन, आत्महत्या, नशा एवं हिंसा की प्रवृत्ति भी इन्हीं में सम्मिलित की जा सकती हैं। इन सभी के समाधान की दृष्टि से यदि हम 40 वर्ष पहले के किसी भी भारतीय गाँव को देखें तो अनेक उपाय हमारे सामने होंगे। खाद के लिए कूड़े व गोबर के ढेर, कंडे (छाने) राख, तालाब, कुँए, बावड़ी, चौपाल, गाय-भैंस, भेड़-बकरी वाले गाँव के बाहर अखाड़ा, साधु-संतों की बगीची, रामलीला, हवन, वेदपाठ, दशहरा एवं होली के आयोजन व संयुक्त परिवार थे। अभिवादन के रूप में हाथ जोड़कर नमस्ते या राम-राम करते थे। उत्तम स्वास्थ्य की अवस्था में चरण स्पर्श या गले मिलने की भी परंपरा थी। लिपा हुआ आँगन, चौका से बाहर ही पादुका उतारने का संस्कार, पूर्णिमा-अमावस्या पर खीर, ब्राह्मणों को भोजन अंगारों पर ही घी-भात या खीर के भोग की भीनी-भीनी सुगंधी, बड़ों के प्रति सम्मान व उत्साह से भरा कर्त्तव्य भाव था। किसी भी मोहल्ले विरादरी की कन्या के विवाह का प्रबंध विलक्षण था। प्रत्येक ग्रामवासी उस कन्या को अपनी पुत्री मानकर श्रद्धा से कन्यादान करता था। छह गोत्र बचाकर विवाह किया जाता था। प्रायः सभी दम्पति एक पति व एक पत्नीव्रत में बँधकर निष्ठा से जीते थे।
किसी भी भारतीय परंपरा के गाँव का यह चित्र दुनिया की सभी समस्याओं के समाधान के लिए ब्लू प्रिंट हो सकता है। उनकी सादगी व सरलता का यह दर्शन प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम को व्यक्त करता है। जहाँ के घर मिट्टी व गोबर से इसलिए बने होते थे ताकि देवता तुल्य पहाड़-पर्वतों का प्राकृतिक सौन्दर्य बचा रह सके। गोबर से लिपे मिट्टी के घरों पर रेडिएशन का प्रभाव भी नगण्य होता है। जैविक खेती एवं श्रम की संस्कृति के कारण कैंसर-मधुमेह नहीं था। राख, अपामार्ग, बबूल व नीम के प्रयोग से बुढ़ापे में भी दाँतों की बीमारियां नहीं थी। मच्छर न होने से मलेरिया केवल शहरों तक सीमित था। बैठकर पानी पीना व भोजन करना तथा बैठकर लघुशंका करना आदि कुछ ऐसे सद् व्यवहार हैं, जिनके औचित्य पर आधुनिक विज्ञान या पाश्चात्यों का ठप्पा लगना शेष है । पनघट का संवाद व अखाड़ों में जोर-आज़माइश के चलते एवं योग, प्राणायाम, ध्यान, भक्ति के कारण आत्महत्या, तनाव, एकाकीपन की समस्या न के बराबर थी। विशाल स्तर पर होलिका दहन व यज्ञ होते थे। अंत्येष्टि (दाह संस्कार) के लिए प्रत्येक घर से समिधास्वरूप कंडे या लकड़ी इकट्ठी हो जाती थी। स्वच्छता व शुद्धि के साथ नित्य-नैमित्तिक यज्ञ होते थे, वहाँ कोरोना, स्वाइन फ्लू, एड्स जैसे संक्रामक रोग केवल बाहर के देशों से ही आ सकते हैं।
चींटियों तक को बचाकर चलना और मीठा आटा (पंजीरी) खिलाना, सब प्राणियों में अपने समान आत्मा मानकर जीने वाले अधिकांश लोग शाकाहारी ही थे। आयुर्वेदिक, श्रौत व स्मार्त ग्रन्थों के आधार पर किए जाने वाले हवन व शाकाहार के गुण ग्लोबल वार्मिंग एवं पर्यावरण संतुलन के लिए अभूतपूर्व उपाय हैं। आजकल धूल-धूप व जीव जन्तुओं के संपर्क मात्र से तथा भोजन में ग्लूटन, मूंगफली से भाँति-भाँति की एलर्जी हो रही है। मानसिक अवसाद, पागलपन जैसी अनेक बीमारियों ने करोड़ों विदेशियों का जीवन नरक बना दिया है। यदि वर्णसंकर एवं स्वगोत्रीय विवाह न होते तो इतनी जेनेटिक बीमारियाँ उत्पन्न ही नहीं होती।
भारत की वैज्ञानिक परंपराओं की रक्षा एवं उनके मूलभूत सिद्धान्तों को जीवित रखने के लिए 145 वर्ष पहले महर्षि दयानंद सरस्वती ने “वेदों की ओर लौटो” का नारा देकर आर्यसमाज रूपी आंदोलन चलाया। उन्होंने यह भी कहा कि शव को धरती में गाढ़ने से जल, वायु एवं भूमि तो प्रदूषित होते ही हैं, कृषि-पशुपालन शिक्षा एवं उद्योग धंधों में काम आने योग्य भूमि धार्मिक पाखंड के कारण अनुपयोगी व रोग उत्पन्न करने वाली हो जाती है। अतः उन्होंने “संस्कार विधि” में अंत्येष्टि की विधि लिखी। भारत के रीति-रिवाज़ एवं जीवन मूल्य न केवल संपूर्ण मानव जाति के लिए बल्कि पूरी पृथ्वी के लिए भी रक्षा कवच हैं।
 “जिसको मिटाने में सदियाँ गँवाईं,
मुमकिन नहीं पर उसे अब मिटाना।”
(लेखक वॉशिंगटन डीसी में भारतीय संस्कृति शिक्षक हैं।)


 
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