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शिक्षा का क्षेत्र न बने राजनीति का अखाड़ा

11/08/2019

योगेश कुमार सोनी 
श्चिम बंगाल में जय श्री राम के नारे को लेकर मुद्दा सुर्खियों में है। इस बार हुगली जिले के एक स्कूल में दसवीं की परीक्षा में एक प्रश्न पूछा गया है कि वह जय श्रीराम नारे का दुष्परिणाम बताएं। साथ ही, एक और सवाल यह भी आया है कि वह कट मनी लौटाने के फायदे बताएं। इन सवालों को लेकर एक बार फिर से माहौल गर्म है। इससे पहले भी दक्षिण 24 परगना जिले के विष्णुपुर थानांतर्गत बाखराहाट उच्च विधालय में जय श्रीराम बोलने को लेकर बाहरी लोगों द्वारा स्कूल में घुसकर छात्रों से मारपीट किए जाने का मामला प्रकाश में आया था। जैसे ही घटना की जानकारी मिली, मौके पर पहुंची पुलिस ने लाठीचार्ज कर बाहरी लोगों की पिटाई की थी। इस मामले को लेकर छात्रों और उनके अभिभावकों ने प्रदर्शन किया था। एक अन्य मामले में मध्य हावड़ा स्थित श्रीरामकृष्ण शिक्षालय नामक स्कूल में एक टीचर ने क्लास वन में पढ़ने वाले बच्चे की सिर्फ इसलिए बेरहमी से पिटाई कर दी थी क्योंकि उसने क्लास में जय श्रीराम बोल दिया था। अब यह बच्चा स्कूल जाने के नाम से ही खौफ में आ जाता है।
ऐसी घटनाओं से एक बात तो तय हो चुकी है कि कोई भी पार्टी एक-दूसरे को नीचा दिखाने में पीछे नहीं हट रही। बीते लोकसभा चुनाव में बेहद शर्मनाक, घटिया व तथ्यहीन बयान सुनने को मिले थे। साथ में इतिहास के साथ छेड़छाड़ व फर्जी खबरों से भी लोकतंत्र को हिलाने का प्रयास लगातार जारी है। लेकिन अब हद तो तब हो गई जब भगवानों और क्रांतिकारियों की जीवनी के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। इसके कुप्रभाव की बात करें तो पढ़ने वालों बच्चों के मस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? जो भी सरकार आती रहेगी वो किसी भी भगवान के चरित्र का चित्रण अपने हिसाब से करती रहेगी तो सही व सच किसको माना जाएगा? यह हमारे देश की संचालन प्रक्रिया का सबसे घृणित चेहरा है। यदि समय रहते इस पर पाबंदी नहीं लगाई गई तो निश्चित तौर पर हमारे देश का भविष्य दांव पर लग सकता है। देश की शिक्षा में बदलाव का जो पैनल हो, वो किसी सरकार के अंतर्गत नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि सरकारें बदलती रहेंगी और एक-दूसरे के प्रति कुंठा निकालने के लिए इतिहास के साथ छेड़छाड़ करती रहेंगी तो बच्चे भ्रमित होते रहेंगे। वह सच कभी जान ही नहीं पाएंगे। इससे पहले भी राजस्थान में कांग्रेस सरकार ने स्कूल पाठयक्रम में बदलाव करते हुए देश के महान व्यक्ति वीर सावरकर को अंग्रेजों से माफी मांगने वाला बताया था। उसके पहले के पाठयक्रम में सावरकर को वीर, महान, क्रांतिकारी व देशभक्त जैसे शब्दों से नवाजा गया था।
पिछले दिनों दो बार ऐसा देखा गया कि पश्चिम बंगाल में कुछ लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए जिससे ममता बनर्जी इतनी नाराज हो गईं कि गाड़ी से उतरकर ऐसे लड़ रही थीं कि जैसे यह नारा उन्हें परेशान कर रहा हो। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। एक मुख्यमंत्री का ऐसा व्यवहार चिंता करने वाला है। वोटबैंक और आस्था अलग-अलग हैं। हमने देखा है कि वोटबैंक के लिए कांग्रेस ने कश्मीर को कैसे अशांत कर रखा था। आखिर इस तरह की घटनाओं से ममता बनर्जी क्या दिखाना चाहती हैं? पश्चिम बंगाल के भविष्य के लिए यह बेहद गलत हो रहा है। भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप व बेतुके बयानों की दुकानें हमेशा सजी रहती हैं लेकिन बच्चों व शिक्षा को इसमें घसीटना ठीक नहीं है। इस तरह की शैली से ममता बनर्जी के मन की कुंठा स्पष्ट हो जाती है कि वो हिंदुत्व को पसंद नहीं करती हैं या फिर यह समझ में आता है कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में जिस तरह अपने पैर पसारे हैं तो उससे ममता को अपनी सियासी जमीन खिसकती नजर आ रही है। 
हाल ही में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में 42 में से रिकार्डतोड़ जीत हासिल करते हुए 18 सीटों पर विजय प्राप्त की है। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मात्र 22 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने पहली बार इतनी सीट हासिल की है। वहां लगातार दो बार से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनती आ रही हैं। 2016 में विधानसभा चुनाव में 294 में से 211 सीटों पर अकेले तृणमूल कांग्रेस ने कब्जा किया था लेकिन इस बार हुए लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल से बनर्जी की जमीन खिसकती नजर आती है। आगामी विधानसभा चुनाव जो 2021 में होने हैं उसको लेकर ममता को चिंता सताने लगी है जो स्वभाविक भी है। कोई भी अपना किला भेदते हुए या गिरते हुए नहीं देख सकता। किसी पार्टी का निर्माण करना, उसके बाद उसको संचालित करना बहुत कठिन काम है। अब राजनीति का फॉर्मेट पूरी तरह बदल चुका है। जो जनता के साथ खड़ा होगा, जो काम करेगा वो ही टिकेगा। अब राजनीति, पार्ट टाइम का खेल नहीं बची। इस बार के लोकसभा चुनाव से उन लोगों का भ्रम भी दूर हो गया जो लगातार जीतने वाली सीटों को अपनी पैतृक सीट समझने लगे थे। अब ग्राउंड लेवल पर हर घटना की जानकारी जरूरी है। क्योंकि, जनता जितनी जल्दी सिर पर बैठाती है उससे ज्यादा जल्दी उतार भी देती है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार इसका उदाहरण है। इस हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बेहद चिंतित और परेशान हैं। यह उनके हाव-भाव और बयानों से स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
2019 के लोकसभा चुनावों के सभी सातों चरणों में पश्चिम बंगाल में बड़े स्तर पर हिंसा हुई थी। कई लोगों की जानें गई। पार्टियों के कार्यकर्ता भी मारे गए। जान-माल का भारी नुकसान हुआ। इसको लेकर राजनीतिक विशेषज्ञों ने यह मान लिया कि बंगाल में हिंसा के बिना चुनाव होना संभव नहीं। दृढ़ निश्चय जीत का संकल्प होता है लेकिन ऐसी राजनीति किस काम की जिसमें निर्दोषों की जान जाए। राजनीति हमेशा से विचारों की लड़ाई रही है। हमेशा नेता मंच पर एक-दूसरे की पार्टी को नीचा दिखाने का प्रयास करते आए हैं लेकिन उन्होंने वैचारिक लड़ाई को कभी व्यक्तिगत नहीं लिया। लेकिन बीते दशक में राजनीति का स्तर बहुत गिरा है। अब शब्दों की मर्यादा का किसी को ख्याल नहीं रहा। आरोप-प्रत्यारोप के चक्कर में मुद्दा हर बार भटकता गया। ज्यादातर एक-दूसरे के निजी जीवन पर वार किया गया। चुनावों में मुकदमों की संख्या बढ़ती गई। हमारे नेता शायद भूल गए कि यहां लोकतंत्र है। अपने देश में किसी भी नेता को हर धर्म को साथ लेकर चलना अनिवार्य है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में तो कुछ पार्टियों ने कई जातियों खासतौर अल्पसंख्यकों पर अपना कॉपीराइट समझते हुए इस तरह वोट मांगे थे जिससे देश बांटने का स्टंट साफ दिख रहा था। हालांकि उन्हें मुंह की खानी पड़ी सौभाग्य का इतराना सबको अच्छा लगता है। लेकिन अब अपनी जीत के लिए कुछ भी करना या बोलना दुर्भाग्य को भी इतराने का मौका देने लगा। 
आज के तकनीकी युग में जरूरत है रोजगार, सुरक्षा, रक्षा, नौकरियां जैसे मुद्दों पर चर्चा करने व उस पर काम करने की क्योंकि अब युवा पीढ़ी बदलाव व तरक्की चाहती है। 
(लेखक पत्रकार हैं।) 


 
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