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सवालों के घेरे में केजरी की निष्क्रियता

16/03/2020

सवालों के घेरे में केजरी की निष्क्रियता

संजय वर्मा

दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के लिए कौन जिम्मेवार था, किसने दिल्ली की सड़कों और गलियों को मौत के सौदागरों के हवाले किया? दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका सही तरीके से निभाई या नहीं, दंगों को लेकर किसने राजनीति की और किसने नहीं, ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनका जवाब भविष्य को तलाशना होगा। लेकिन एक सवाल जो इन दंगों के दौरान, सभी दिल्लीवासियों को परेशान करता रहा, वह था, सारे प्रकरण पर प्रदेश के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का निष्क्रिय रहना। विषेष तौर पर रविवार 23 और सोमवार 24 फरवरी को। राजनीति में प्रवेश के समय से ही अरविंद केजरीवाल अपनी बयानबाजियों के लिए चर्चित रहे हैं। ऐसे में हिंसा की शुरुआती दो दिनों तक उनकी चुप्पी बहुत सारे सवाल खड़ी करती है, विशेष तौर पर इसलिए भी क्योंकि मुश्किल से दो सप्ताह पहले ही दिल्ली की जनता ने उनकी आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत से विधान सभा चुनाव जिताया था।

घटना के समय मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके विधायकों ने किसी भी इलाके में पार्षदों और संबंधित अधिकारियों के साथ-साथ उन इलाकों के प्रभावशाली लोगों के साथ न बैठक की और न शांति की अपील। इसके बाजय उन्होंने ट्वीटर को अपडेट करना ही अपना कर्तव्य समझा।

सबल नेतृत्व की पहचान अच्छे वक्त में नहीं बल्कि संकट की घड़ी में होती है। लेकिन ऐसे वक्त में जब केजरीवाल को सबसे अधिक सक्रिय होना चाहिए था, वे परिदृश्य से लगभग गायब थे। दो दिनों तक अरविंद केजरीवाल चुप रहे लेकिन उनके समर्थक सोशल मीडिया पर दिल्ली पुलिस का नियंत्रण राज्य सरकार के हाथों में न होने का वही पुराना राग अलापते रहे। ऐसे में उनके राजनीतिक विरोधी केजरीवाल के 2013 में किए गए उस ट्वीट की याद बार-बार दिलाते रहे जिसमें उन्होंने कहा था प्रत्येक बलात्कार की घटना के बाद शीला दीक्षित की यही प्रतिक्रिया होती है कि मैं क्या कर सकती हूं? दिल्ली पुलिस मेरे नियंत्रण में नहीं है? क्या दिल्ली की जनता ऐसा असहाय मुख्यमंत्री चाहती है? हास्यास्पद है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद, दिल्ली में होने वाली घटनाओं पर खुद केजरीवाल की भी वही रूटीन प्रतिक्रिया होती है। बेशक, दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के नियंत्रण में नहीं है लेकिन ऐसा बहुत कुछ है जो दिल्ली का निर्वाचित मुख्यमंत्री पुलिस के बिना भी कर सकता है और जो इन दंगों की शुरुआत में अरविंद केजरीवाल ने नहीं किया।

वे मंगलवार 25 फरवरी को तब जागे जब हालात बेकाबू हो चुके थे। जागने की शुरुआत भी उन्होंने अपने चिर-परिचित नाटकीय अंदाज में ही की। ऐसे वक्त में जब उनका प्रदेश हिंसा से सुलग रहा था, वे ट्वीटर पर दुख प्रकट कर रहे थे और फिर अपने मंत्रिमंडल के साथियों के साथ राजघाट जाकर बैठ गए। दिल्ली के सबसे लोकप्रिय नेता (विधान सभा चुनाव परिणाम के आधार पर) और राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें राजघाट जाने की बजाय, उपराज्यपाल और देश के गृहमंत्री के पास जाना चाहिए था और जनता की समस्याओं को उनके सामने रखना चाहिए था। दिल्ली पुलिस उनके नियंत्रण में नहीं है लेकिन दिल्ली के 62 विधायक तो उनके नियंत्रण में हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर हालात पर चर्चा की जबकि केजरीवाल भी यह काम कर सकते थे। दूसरों पर आरोप लगाने की बजाय राज्य सरकार मुख्यमंत्री कार्यालय के अधीन एक हेल्पलाइन की स्थापना कर सकती थी। जिसके माध्यम से हिंसक घटनाओं पर पुलिस की निष्क्रियता से संबंधित शिकायतों को पुलिस प्रमुख या संबंधित सबडिविज नल मजिस्ट्रेट को प्रेषित किया जा सकता था। मुख्यमंत्री हॉटलाइन के माध्यम से दिल्ली के उपराज्यपाल के साथ जुड़कर निरंतरता के साथ शहर के हालात पर चर्चा कर सकते थे। इसके अलावा हिंसा प्रभावित इलाकों में शांति समितियों के गठन के लिए भी मुख्यमंत्री को केंद्र सरकार या उपराज्यपाल से पूछने की जरूरत नहीं थी।

दंगा प्रभावित इलाकों में ऐसी समितियों का गठन किया जाता रहा है, जिनमें स्थानीय विधायकों, पार्षदों और संबंधित अधिकारियों के साथ-साथ उन इलाकों के प्रभावशाली लोगों को शामिल किया जाता है। जाहिर तौर पर ट्वीटर पर ज्ञान बांटने की बजाय इन उपायों के बेहतर परिणाम सामने आ सकते थे। राजघाट पर जाकर बैठने की बजाय, अगर केजरीवाल, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य और पार्टी विधायक हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों से मिलते और उन्हें यह भरोसा दिलाते कि सरकार उनके साथ है, तो वह अधिक कारगर होता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने जब उनसे हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर लोगों से मिलने को कहा, उसके बाद केजरीवाल दंगा प्रभावित लोगों से मिले, जबकि उन्हें खुद ही ऐसा करना चाहिए था। अगर केंद्र सरकार, उपराज्यपाल या दिल्ली पुलिस का सहयोग नहीं मिला होता तो वे अपने जाने-माने धरने वाले अंदाज को भी अपना सकते थे।

लेकिन शायद उन्हें यह चिंता सता रही होगी कि अगर ज्यादा बोले तो कहीं विधान सभा चुनावों में साथ आए मतदाता हाथ से निकल न जाएं इसीलिए उन्हें हिंसा से पीड़ित लोगों की बजाय इस बात की अधिक चिंता थी कि उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी के कार्यक्रम से दूर क्यों रखा गया। उनकी पार्टी की तरफ से कहा गया कि लगातार मांग के बाद भी केंद्र सरकार ने प्रभावित इलाकों में सेना की तैनाती नहीं की या फिर कμर्यू नहीं लगाया। यह भी खुद को बेबस दिखाने का नाटक ही था। किसी इलाके में सेना बहाली के कुछ साधारण से नियम हैं। इसके लिए संबंधित क्षेत्र के जिलाधिकारी से सेना बुलाने का औपचारिक अनुरोध किया जाता है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने ऐसा किया? मुख्यमंत्री जब गृहमंत्री से मिले थे तब उन्होंने ऐसा कोई अनुरोध क्यों नहीं किया? जाहिर तौर पर ऐसा बहुत कुछ है जिसके लिए दिल्ली पुलिस पर राज्य सरकार का नियंत्रण होना जरूरी नहीं है और दिल्ली के लोगों की अपने मुख्यमंत्री से सबसे बड़ी शिकायत यही है।


 
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