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सफल प्रयोग

04/03/2020

सफल प्रयोग

शाहीन बाग कोई संयोग नहीं, प्रयोग है। यह बयान प्रधानमंत्री का है। चुनावी नतीजे ने उनके कहे को सही साबित कर दिया है। वाकई में शाहीन बाग एक प्रयोग था। वैसा ही जैसा 2015 में पुरस्कार वापसी का था। तब भी चुनावी बेला थी। इस बार भी वही बेला रही। लिहाजा इसे उछाला भी खूब गया। बहुत हाय-तौबा हुई। उसका फायदा भी हुआ। आप को बहुमत मिल गई। भाजपा ज्यादा कुछ कर नहीं पाई। हालांकि उसके करने के लिए कुछ था भी नहीं। शाहीन बाग के सामने भाजपा औंधे मुंह गिर पड़ी।
उसका राष्ट्रवाद कहीं टिक न पाया। तभी तो वह महज आठ सीटों पर सिमटकर रह गई और आम आदमी पार्टी ने जीत की हैट्रिक लगा दी। यह तब हुआ जब आम आदमी पार्टी ने काम के नाम पर बस वादा किया। लोगों से झूठ बोला और उन्हें गुमराह किया। भाई-भतीजवाद का दौर चला। इस तरह के ढेरों प्रमाण हैं। एक तो उनके बहुत बड़े नेता है। वे चुनाव हारते-हारते जीते हैं। किस्सा उन्हीं के साले का किस्सा है। उनकी एक कंपनी है। उस कंपनी को बिना किसी नियम-कानून के करोड़ो का ठेका दे दिया। यह बात महानियंत्रक और लेखा परीक्षक के सवाल में समान आई। इसी तरह पार्टी के और दिग्गज नेता हैं जिनके दमाद पर सरकार मेहरबान थी।
उन्हें भी बिना किसी योग्यता पद सौंप दिया गया। पहले डॉक्टर बना दिया गया और बाद ओएसडी। इस तरह का बहुत खेल आम आदमी पार्टी की सरकार में हुआ। शिक्षा की बात कर ले। इसका आप सरकार ने बहुत ढिढोरा पीटा। लेकिन जब चुनाव की बारी आई तो शाहीन बाग का सहारा लिया। उन्हें पता था कि चुनाव बिना इसके जीता नहीं जा सकता। काम तो कुछ हुआ था। जो हुआ वह बस कागजों पर दौड़ता रहा। उससे हासिल तो कुछ होना नहीं था। मोहल्ला क्लीनिक ही लीजिए। आप सरकार ने इसका बहुत प्रचार किया। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव उसे देखने आए। स्वास्थ्य के क्षेत्र में केजरीवाल का वह प्रयोग बतौर मिसाल पेश किया जाने लगा।
लेकिन क्या सही में वह कोई प्रयोग था या महज छलावा? कम से कम प्रयोग तो नहीं था। छलावा इसलिए क्योंकि उस बाबत तमाम रिपोर्ट आ चुकी है। इसमें सबसे दिलचस्प आरटीआई का वह जवाब है जिसमें बताया गया है कि आप सरकार के मंत्री निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। इसका सीधा मतलब तो यही है कि जिस स्वास्थ्य सेवा का वो दावा कर रहे थे, वह या तो निम्न दर्जे की है या फिर है ही नहीं। यहां दूसरी बात ज्यादा सही है। मोहल्ला क्लीनिक की जो दुर्दशा हुई वह कोई भी दिल्ली में सहज ही देख सकता है। उसके लिए किसी विशेषज्ञयता की जरूरत नहीं है। हां, अगर किसी की जरूरत है तो वह नजर है।
पर आप सरकार ने फरेब का जो तानाबाना बुना था उसमें सच छिप गया था। वह किसी को दिख नहीं रहा था। लेकिन जब सबको आम आदमी पार्टी का प्रपंच दिखाई देने लगा तो आप सरकार और पार्टी दोनों परेशान हो गई। यह स्वभाविक भी था। पांच सालों में सरकार ने कुछ किया नहीं था। अगर वह जनता को पता चल जाता तो वह सत्ता से बेदखल कर देती। आप सरकार को यह मंजूर नहीं था। इसलिए जनमानस को ठगने का काम शुरू हुआ। विज्ञापन उसका जरिया बना। सफलता की कहानी बताई जाने लगी और सच छुपाया जाने लगा। हालांकि यह खेल ज्यादा दिनों तक चला नहीं। आवाम समझने लगी कि केजरीवाल मूर्ख बना रहे हैं। इस वजह से दिल्ली की हवा आप के खिलाफ होने लगी। तो नागरिकता संशोधन अधिनियम को मुद्दा बनाने की कवायद शुरू हुई। एक तबके को इसका डर दिखाया जाने लगा। उसी डर ने शाहीन बाग को खड़ा किया। फिर आप सरकार के काम का लेखाजोखा पीछे चला गया। चर्चा में शाहीन बाग आ गया। उसका फायदा आप सरकार को मिला। वह एक बार फिर सत्ता में आ गई।


 
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