भारतीय समाज की शक्ति


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भारतीय समाज की शक्ति


इस संकट काल में अपने आत्मबल से भारतीय समाज ने अभूतपूर्व शक्ति का परिचय दिया है। वहीं समाज में आस्था के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपत्ति की इस घड़ी को अवसर में बदलते हुए इस संकट से उबरने के लिए भारतीय समाज को आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दिया है। खास बात यह है कि आत्मनिर्भरता की उनकी यह योजना गांव से शुरू होकर देश तक जाती है।

बनवारी

किसी भी समाज के आत्मबल की परीक्षा किसी बड़े संकट के समय ही होती है। कोविड-19 के कारण वैसा ही एक बड़ा संकट पैदा हुआ है। उसका सामना हमने कैसे किया है, इसमें झांककर हम अपने समाज की शक्ति और दुर्बलता दोनों का ही अनुमान लगा सकते हैं। पिछले लगभग दो महीने से पूरा देश लॉकडाउन की स्थिति में रहा है। हमारा सार्वजनिक जीवन और सभी तरह के काम-धंधे ठप पड़े रहे हैं। इस लॉकडाउन को अनंतकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता। आने वाले दिनों में सावधानी बरतते हुए सार्वजनिक जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश की जाएगी। अभी महामारी थमी नहीं है इसलिए सार्वजनिक जीवन की गतिविधियों को आरंभ करना काफी चुनौती भरा काम होगा। इसे सफलतापूर्वक करने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने समाज की विभिन्न संस्थाओं की कार्यक्षमता और शिथिलता पर बारीकी से नजर डालें और उनकी कार्यकुशलता बढ़ाने और उनकी अक्षमता दूर करने का प्रयत्न करें।

इस दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संकट की घड़ी में भारतीय समाज ने सामान्यत: बड़े अनुशासन का परिचय दिया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो शहर और गांव में सभी जगह काफी अनुशासन दिखाया गया है। यद्यपि शहरों की तुलना में गांवों में यह अनुशासन और अधिक दिखाई दिया है। इस महामारी ने देश के कई करोड़ निर्बल लोगों को विपत्ति में डाल दिया था। यह संतोष की बात है कि इस विपत्ति के समय सरकारी तंत्र से लगातार सामाजिक संस्थाओं तक सभी उन्हें उससे उबारने में लग गए। देश में जितने बड़े पैमाने पर विपत्तिग्रस्त लोगों तक भेजन पहुंचाया गया, यह सामान्य बात नहीं है। संसार के किसी और देश में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी जहां-तहां कुछ लोगों के भूख-प्यास से पीड़ित होने की खबर आई। उसके लिए हमारा तंत्र कुछ हद तक जिम्मेदार है। पर काफी समस्या लॉकडाउन के बाधाओं के कारण भी रही।

इस संकट के दौरान पूरे देश में जो अनुशासन दिखाई दिया है, उसका एक बड़ा कारण राज्य और समाज के रिश्तों में आया परिवर्तन है। जवाहर लाल नेहरू के समय से गांवों में बसे व्यापक भारतीय समाज को अंधकारयुक्त, अक्षम और पिछड़ा मानते हुए राज्य को परिवर्तनकारी या सुधारक के रूप में देखा जा रहा था। सारी योजनाएं भारतीय समाज की अब तक चली आई आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाओं को बदलने के लिए बनाई जा रही थी। राज्य में समाज की शक्ति और क्षमताओं के बारे में गहरा अविश्वास पनपा हुआ था। इसलिए राज्य और समाज में एक बड़ी खाई बनी रहती थी। नरेंद्र मोदी के सत्ता में पहुंचने के बाद यह दृष्टिकोण बदलना आरंभ हुआ। नरेंद्र मोदी में जवाहर लाल नेहरू की तरह अपने समाज और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास और हीनता की भावना नहीं थी। इसके उलट उनमें भारतीय समाज और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति आदर और विश्वास दिखाई देता है।

उन्होंने समाज की गतिशीलता बढ़ाने के लिए उसकी नैतिक शक्ति को जगाने का प्रयत्न किया। यह एक अच्छा संयोग था कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले 13 वर्ष से अधिक समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। इस अवधि में प्रकट हुई उनकी सामाजिक निष्ठा से ही भारतीय समाज में उनकी सकारात्मक छवि बनी और उन्हें नेतृत्व सौंपकर भारतीय जनता पार्टी पहली बार केवल अपने बहुमत के आधार पर सत्ता में पहुंच गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राज्य को स्वामी की बजाय सेवक बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने आपको जनता का प्रधान सेवक कहा। उसके बाद राज्य की भूमिका सहायक की रही है, नियंत्रक की नहीं। राज्य और समाज के बीच पैदा हुए इसी परस्पर विश्वास का परिणाम है कि हम इस बड़ी विपत्ति का इतने अनुशासनपूर्वक सामना कर रहे हैं।

अपने समाज में आस्था के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपत्ति की इस घड़ी को अवसर में बदल दिया है। इस महामारी के दौरान उन्होंने देश के लोगों से सीधे संवाद करने की प्रक्रिया भी आरंभ की है। यह संवाद एकतरफा नहीं है, जैसा कि अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के काल में था। नरेंद्र मोदी अपनी बात कहने से पहले देश के सर्वसामान्य लोगों की बात सुन रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है। देश के लोगों की क्षमता में विश्वास के कारण उनमें देश को वर्तमान स्थिति से नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प दिखाई दे रहा है। महामारी के दौरान दिए गए अपने सभी भाषणों में उन्होंने देश को आत्मनिर्भरता की ओर तेजी के साथ आगे बढ़ाने और शक्तिशाली बनाने का संकल्प व्यक्त किया है। इस संकल्प की गंभीरता 12 मई को दिए गए उनके संबोधन में देखी जा सकती है।

अपने इस संबोधन में उन्होंने इस संकट से उबरने के लिए और आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ने के लिए भारतीय समाज को 20 लाख करोड़ रुपये उपलब्ध किए जाने की घोषणा की। यह देश के सकल राष्ट्रीय उत्पादन के 10 प्रतिशत के बराबर है। अब तक बड़े से बड़े उदारवादी अर्थशास्त्री सरकार से सकल राष्ट्रीय उत्पादन के पांच प्रतिशत के बराबर साधनों की व्यवस्था करने का आग्रह कर रहे थे। दुनिया में केवल चार समृद्ध देशों ने ही इस संकट के समय अपने सकल राष्ट्रीय उत्पादन का इससे बड़ा प्रतिशत उपलब्ध करवाने की घोषणा की है। लंबे समय से मंदी का शिकार जापान ने सकल राष्ट्रीय उत्पादन का 21 प्रतिशत, अमेरिका ने 13 प्रतिशत, स्वीडन ने 12 प्रतिशत और जर्मनी ने 10.7 प्रतिशत साधन उपलब्ध करने की घोषणा की है। यूरोप के सबसे प्रभावित इटली, स्पेन, फ्रांस और ब्रिटेन भी अपने सकल राष्ट्रीय उत्पादन का उतना प्रतिशत उपलब्ध करने की स्थिति में नहीं है, जितना भारत है। यह अपने आपमें बहुत महत्वपूर्ण बात है।

विश्व के इन अन्य समृद्ध देशों से भारत की स्थिति इसलिए भी अलग है कि उनका लक्ष्य केवल इस महामारी के दौरान हुई अपनी अर्थव्यवस्था की क्षतिपूर्ति करना है। उनकी तुलना में भारत आत्मनिर्भरता के एक नए संकल्प के साथ आगे बढ़ने की योजना बना रहा है। भारत के संकल्प की तुलना एक सीमित अर्थ में अमेरिका से की जा सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पिछले पचास वर्ष में सस्ते श्रम के लोभ में बाहर स्थानांतरित की गई अमेरिकी फैक्टरियों को वापस लाकर अमेरिका को फिर से आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश में लगे हैं। नरेंद्र मोदी ने देश को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयत्न 2014 में ही आरंभ कर दिया था। उनकी सरकार ने रक्षा, दवा और इलेक्ट्रॉनिक के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेक तरह की पहल की थी।

अब तक इसके लिए उन्होंने राज्यतंत्र और उद्योगतंत्र का ही सहारा लिया था। अब उन्होंने आत्मनिर्भरता के इस मंत्र को पूरे भारतीय समाज में फैलाने का अभियान छेड़ दिया है। कुछ पहले अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उन्होंने अपना यह संकल्प बड़े सरल शब्दों में पूरे देश से साझा करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि हमें अपने गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है, अपने जनपदों को आत्मनिर्भर बनाना है। इसी तरह हमें अपने प्रांतों और देश को आत्मनिर्भर बनाना है। यह महत्वपूर्ण बात है कि आत्मनिर्भरता की उनकी योजना गांव से शुरू होकर देश तक जाती है। अब तक यह कल्पना देश से आरंभ होती थी और उसके बाद वह औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में सिमट जाती थी। नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता की इस योजना के केंद्र में लोगों को और भौगोलिक, सामाजिक इकाइयों को रखा है। दोनों दृष्टियों में यह मौलिक अंतर है।

देश को आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनाने की दिशा में यह आवश्यक है कि हम अपनी सामान्य आवश्यकताओं को पूरी करने वाली सभी वस्तुएं स्वयं पैदा करें। इसके लिए बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की भी आवश्यकता होगी। इस सिलसिले में हमारी और पश्चिमी दृष्टि में मौलिक अंतर है। हम अपने जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए औद्योगिक वस्तुओं को प्रतिमान नहीं समझते, उन्हें केवल सहायक समझते हैं। इसलिए हमारी पूरी अर्थव्यवस्था उद्योग तंत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं ढलनी चाहिए। उद्योग तंत्र को ही हमारे लोगों के आवश्यकताओं के अनुरूप ढलना चाहिए। पश्चिमी देशों का उद्योग तंत्र लोगों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए नहीं, उनकी इच्छाएं और आवश्यकताएं पैदा करने और बढ़ाते चले जाने के लिए है। इसी अर्थ में वह लोगों को मूलत: उत्पादक के रूप में नहीं बल्कि उपभेक्ता के रूप में ही देखता है।

वहां का उत्पादन तंत्र लोगों से अधिक मशीन और प्रौद्योगिकी पर निर्भर है। इस कारण वहां आर्थिक तंत्र व्यापारिक कंपनियों और राजकीय शक्ति पर टिका हुआ है। यूरोपीय समाज सामंती व्यवस्था से निकलकर पूंजीवादी या साम्यवादी व्यवस्था में आया है। सामंतीकाल में यूरोप में सारी शक्ति राज्य और प्रभुवर्ग के हाथ में थी। लोग उनके अधीन थे। भारत में राजकीय पराधीनता के समय भी लोगों ने अपनी स्वाधीनता बनाए रखी। इसलिए उनकी स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने वाली कोई शक्ति खड़ी नहीं हो पाई। अब तक का नेतृत्व देश को यूरोपीय तरीके पर आगे बढ़ाना चाहता था। इसलिए न उद्योग तंत्र पनपे, न राजकीय मशीनरी सक्षम हो पाई। अब की सरकार समस्याओं का हल खोजने के लिए भारतीय सभ्यता की ओर देख रही है। अभी हमारी सभ्यतागत मान्यताओं को लेकर काफी अस्पष्टता है। हमारे शिक्षित वर्ग को अपनी सभ्यता की ओर लौटने में समय लग रहा है। लेकिन नरेंद्र मोदी ने जो राजनैतिक संकल्प दिखाया है, वह भारतीय समाज की शक्ति को पुनर्स्थापित करेगा और देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।

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