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यह भी राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक! अदालत की मुहर

25/11/2019

यह भी राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक! अदालत की मुहर

बनवारी

क लंबी प्रतीक्षा के बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय ने रामजन्म भूमि विवाद का निपटारा करते हुए रामलला विराजमान के पक्ष में निर्णय सुनाकर उस स्थान पर एक भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। यह विवाद हमारी सभ्यतागत आस्था से संबंधित था और देश के स्वतंत्र होते ही एक राजनीतिक निर्णय द्वारा उसे हल कर लिया जाना चाहिए था। लेकिन उस समय के दुविधाग्रस्त राजनीतिक नेतृत्व के कारण यह विवाद अदालतों तक पहुंचा। अदालतों में यह विवाद एक भूमि विवाद के रूप में देखा और हल किया जा सकता था। अदालतों में यह विवाद लंबा खिंचा लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यों की पीठ ने अंत में उसकी निरंतर सुनवाई का निर्णय लिया। पूरे चालीस दिन की सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय के पांच मान्य न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया। कुछ विसंवादी स्वरों को छोड़ दें तो उनके निर्णय का व्यापक समर्थन हुआ है। हिन्दू और मुसलमानों के सभी वर्गों ने इस निर्णय पर व्यापक सहमति प्रकट की है। निर्णय से पहले अतिवादी तत्वों की हिंसक प्रतिक्रिया की आशंका के कारण सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए थे। लेकिन यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई और देश भर में शांति बनी रही। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का मुखर विरोध आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ सदस्यों ने किया है। विशेष कर असदुद्दीन ओवैसी व जफर याब जिलानी, ने उस पर अपना असंतोष प्रकट किया है। लेकिन उत्तर प्रदेश के सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड ने जो इस मामले में पक्षकार है, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया गया है। इसके अलावा मुसलमानों के अधिकांश मुख्य मजहबी या राजनीतिक संगठनों और नेताओं ने भी निर्णय का स्वागत किया है।

राम जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण एक राजनीतिक प्रश्न था, एक सभ्यतागत प्रश्न था, जिसे 1947 में ही सुलझा लिया जाना चाहिए था। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद हमने सोमनाथ मंदिर के निर्माण का निर्णय किया। वह एक राजनीतिक निर्णय था। उसे केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से बनवाया गया था। यह निर्णय इसलिए किया गया क्योंकि सोमनाथ मंदिर को राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया था।

राज्यों के दलों में केवल मार्क्सवादियों ने कुछ शंकाएं प्रकट की हैं। उनसे संबंधित छात्रों ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरोध में एक मार्च तक निकाल दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने आरंभ में ही घोषित कर दिया था, कि उसे केवल भूमि के स्वामित्व के बारे में निर्णय करना है। अपना निर्णय वह लोगों की आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर करेगा। लेकिन सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हो गया था कि भूमि के स्वामित्व से संबंधित निर्णायक साक्ष्य किसी के पास नहीं है। इसलिए तथ्य के रूप में साक्ष्यों के साथ-साथ लोगों के विश्वास का समावेश भी करना आवश्यक हो गया। अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह दोहराया अवश्य कि अदालत के लिए केवल जन आस्था आधार नहीं हो सकती। पर निर्णायक साक्ष्यों के अभाव में उसने इस बात को महत्व दिया, कि 1857 में अवध पर अंग्रेजों के नियंत्रण से पहले के मुस्लिम काल में हिन्दू समाज जन्म स्थान पर पूजा-अर्चना को लेकर सक्रिय रहा है। मुस्लिम पक्ष यह सिद्ध करने में असफल रहा है कि बाबरी मस्जिद पर सदा एक मात्र उसका नियंत्रण रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ अपने निर्णय में यह घोषित करने से बची कि वह मानती है कि बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे का ही स्थान राम जन्मभूमि था, जैसी कि लोगों की आस्था रही है, उसने केवल इतना कहा कि उपलब्ध सभी तरह के साक्ष्यों के आधार पर मुस्लिम पक्ष की तुलना में हिन्दू पक्ष के दावे के सही होने की उसे अधिक संभावना दिखाई दी है। लेकिन पीठ के मुख्य निर्णय के साथ पीठ के एक मान्य जज का नोट संलग्न है जो विस्तार से इस प्रश्न की विवेचना करता है कि विवादित भूमि राम जन्मभूमि है या नहीं। इस नोट में हिन्दू पक्ष की ओर से प्रस्तुत सभी साक्ष्यों और मुस्लिम पक्ष की ओर से उन पर उठाई गई आपत्तियों की विस्तृत समीक्षा की गई है। और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध हो जाता है कि विवादित स्थान जन्म स्थान ही है। पीठ ने अपने मुख्य निर्णय में इस नोट का उल्लेख करके उसे पीठ के सदस्य द्वारा तैयार किया गया बताते हुए उसे अपने निर्णय का अंग ही बना लिया है। इसलिए नोट के निष्कर्ष पीठ के निष्कर्ष भी माने जाने चाहिए। यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि इस विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय मध्यम मार्ग अपनाने की कोशिश कर रहा था। उसने भरसक कोशिश कि दोनों पक्ष आपसी बातचीत से इस विवाद का समाधान कर लें।

सर्वोच्च न्यायालय ने आरंभ में ही घोषित कर दिया था, कि उसे केवल भूमि के स्वामित्व के बारे में निर्णय करना है। अपना निर्णय वह लोगों की आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर करेगा।

अपनी ओर से उसने तीन सदस्यों का एक दल संगठित करके उसे दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करने का दायित्व भी सौंप दिया। इस मध्यस्थता की प्रक्रिया में कुछ आशा की किरणें भी जगीं लेकिन इस विवाद को जो राजनीतिक स्वरूप दिया जाता रहा था उसके कारण मध्यस्थता से कोई हल नहीं निकल पाया। सर्वोच्च न्यायालय से पहले प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से लेकर नरसिंह राव तक राजनीतिक स्तर पर उसका समाधान निकालने का प्रयत्न कर चुके थे। इन सब प्रयत्नों की असफलता के बाद सर्वोच्च न्यायालय के मान्य जजों ने इसका न्यायिक समाधान निकालने का दायित्व अपने हाथ में लिया, इसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। उनके निर्णय से स्पष्ट है कि इस विवाद का न्यायिक समाधान निकालते समय उन्होंने यह भी ध्यान में रखा कि इस विवाद के कारण पैदा होती रही राजनीतिक समस्या का समाधान हो जाए। इसी दृष्टि से उन्होंने अन्य वादों को निरस्त करते हुए केवल सुन्नी पक्ष और रामलला विराजमान के वाद ही अपने निर्णय के लिए चुने ताकि उच्च न्यायालय के 2010 के निर्णय जैसी उलझन से बचा जा सके। अपने निर्णय में पीठ ने 1948 में मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखने और 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को गैर कानूनी घोषित किया। मुस्लिम पक्ष के साथ हुए इस अन्याय की भरपाई के तौर पर ही उसने यह आदेश दिया कि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या के भीतर एक नई मस्जिद के निमार्ण के लिए पांच एकड़ भूमि दी जाए। उसके इस निर्णय को पूरा करने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां आ सकती हैं क्योंकि अयोध्या के मुख्य क्षेत्र में पांच एकड़ भूमि मिलना काफी कठिन होगा।

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका मुख्यत: विवादित क्षेत्र में खुदाई के बाद प्रस्तुत की गई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर आधारित होना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को यह दायित्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सौंपा गया था। अपने इस दायित्व को पूरा करने के लिए उसने जो प्रक्रिया अपनाई थी वह काफी पारदर्शी थी। विवादित क्षेत्र में खुदाई पर अदालत की सतत निगरानी थी। खुदाई की पूरी प्रक्रिया दोनों पक्षों की उपस्थिति में संपन्न हुई थी और उसकी पूरी वीडियोग्राफी की गई थी। उस समय दोनों पक्षों ने उसकीे पारदर्शिता पर संतोष व्यक्त किया था। इस बात की भी सावधानी बरती गई थी कि बाद में उस पर कोई उंगली न उठाई जा सके। सर्वोच्च न्यायालय में बहस के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से पुरातत्व को अवैज्ञानिक सिद्ध करने से लेकर उसके निष्कर्षों पर गंभीर आपत्तियां की गई। लेकिन मान्य जजों ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में पुरातत्व के सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर बहुत सावधानी पूर्वक निष्कर्ष निकाले गए हैं। उनका सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बाबरी मस्जिद खाली भूमि पर नहीं बनाई गई थी। उन्होंने यह भी कहा है कि खुदाई में मिले अवशेषों से यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। लेकिन यह टिप्पणी केवल तर्क के तौर पर की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि हिन्दू पक्ष विवादित स्थान को आरंभ से ही राम जन्मभूमि मानता रहा है और पूजा के अधिकार के लिए अड़ा रहा है। अगर इसे पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट से मिलाकर देखा जाए तो यह कहना कठिन नहीं होगा कि बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि तोड़कर बनाई गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि हिन्दू पक्ष विवादित स्थान को आरंभ से ही राम जन्मभूमि मानता रहा है और पूजा के अधिकार के लिए अड़ा रहा है। अगर इसे पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट से मिलाकर देखा जाए तो यह कहना कठिन नहीं होगा कि बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि तोड़कर बनाई गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने रामलला विराजमान के पक्ष में निर्णय सुनाने के बाद राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने का दायित्व सरकार पर छोड़ दिया। उसने अपने आदेश में यह अवश्य कहा है कि तीन महीने के भीतर सरकार एक न्यास या अन्य कोई एजेंसी गठित कर दे, जिसे सरकार द्वारा अधिग्रहीत भूमि सौंपी जा सके। लेकिन उसके बारे में और अधिक निर्देश देने के फेर में पीठ नहीं पड़ी। कुछ सामान्य बातें उसने अवश्य कहीं हैं जैसे कि निर्मोही अखाड़े को नई व्यवस्था में उचित प्रतिनिधित्व दे दिया जाए या हिन्दू पक्ष को भूमि सौंपने के साथ ही मुस्लिम पक्ष को भी पांच एकड़ भूमि दी जाए। इसके अलावा उसने सरकार पर और कोई शर्त नहीं थोपी। उसे यह निर्णय करने में कोई दुविधा नहीं हुई कि मंदिर के निर्माण की उचित व्यवस्थाएं करना सरकार का काम है। इससे सरकार के सेक्युलर स्वरूप पर कोई आंच नहीं आती, यह तर्क आज भी मार्क्सवादी या अपने आपको सेक्युलर घोषित करने वाले लोग दे रहे हैं। हालांकि सत्ता में पहुंचने पर वे स्वयं मंदिरों के अधिकार छीनने और अल्पसंख्यक प्रतिष्ठानों को सुविधाएं देने में सेक्युलरिज्म की कोई क्षति नहीं देखते। सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर की या एक नई मस्जिद की शेष व्यवस्थाओं का दायित्व सरकार पर छोड़ कर इस बात की स्वीकृति प्रदान की है कि धार्मिक प्रतिष्ठान के नियमन का दायित्व राज्य का है। उसे नीति निर्धारण के अपने दायित्व से अलग नहीं किया जा सकता। उसका निश्चय ही मंदिर-मस्जिदों आदि पर सीधे नियंत्रण नहीं होना चाहिए, हालांकि इस मर्यादा का भी उल्लंघन होता रहा है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम मंदिर निर्माण की व्यवस्थाओं को बनाने का दायित्व सरकार को देने से यह बात रेखांकित हुयी है कि इस विवाद को निपटाने का मूल दायित्व भी राज्य का ही था। राम जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण एक राजनीतिक प्रश्न था, एक सभ्यतागत प्रश्न था, जिसे 1947 में ही सुलझा लिया जाना चाहिए था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद हमने सोमनाथ मंदिर के निर्माण करने का निर्णय किया। वह एक राजनीतिक निर्णय था। उसे केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से बनवाया गया था। यह निर्णय इसलिए किया गया क्योंकि सोमनाथ मंदिर को राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में देखा गया था। भारत पर मुस्लिम आक्रमण का आरंभ सोमनाथ आदि मंदिरों के विध्वंस से हुआ था। उसे अनेक बार तोड़ा गया। भारतीय राजाओं ने भारतीय आस्था के इस केंद्र को बार-बार बनवाया। आरंभ में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण का उद्देश्य उसके कोष की लूट भी था लेकिन बाद में तो वह मजहबी और राजनीतिक उद्देश्य से ही तोड़ा जाता रहा। 1947 में वह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था। उसका शीघ्र जीर्णोद्धार आवश्यक नहीं था। लेकिन उसके निर्माण को राष्ट्रीय गौरव की प्रतिष्ठा के रूप में देखा गया। उस समय भी यह स्पष्ट था कि देश का वृहद हिन्दू समाज अपने काशी और मथुरा जैसे अन्य अनेक पवित्र स्थानों के गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए दृढ़ कृतज्ञ है। इन सभी स्थानों पर मुस्लिम काल में पवित्र मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनवाई जाती रहीं। मुस्लिम शासकों के दरबारी वृतांतों में इस बात का उल्लेख है कि उन्होंने यह काम मजहवी उद्देश्य से एक नीति के अंतर्गत किए थे।

1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से एक साल पहले यह केंद्रीय कानून बनाया गया था कि अयोध्या में रामजन्म भूमि को छोड़कर और सभी धर्म स्थलों को उसी स्वरूप में बनाए रखा जाएगा जिस रूप में वे 15 अगस्त 1947 को थे। ये कानून इस लिए बनाया गया कि धर्म स्थलों को लेकर हिन्दुओं और मुस्लमानों के बीच और विवादों को रोका जा सके। लेकिन क्या यह संभव है? उसे रोकने का सबसे अच्छा तरीका यही था कि 1947 में ही एक केंद्रीय कानून बनाकर हिन्दू आस्था के सबसे पवित्र स्थानों को मूल स्वरूप लौटाने का निर्णय ले लिया जाता और मुस्लमानों को उन स्थानों पर जबरन बनाई गई मस्जिदों को छोड़ने के लिए तैयार कर लिया जाता। उसे आज हिन्दू-मुस्लिम समस्या के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन 1947 में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार को इस रूप में नहीं देखा गया था। उस पर कांग्रेस के भीतर जवाहर लाल नेहरू ने आपत्ति की थी। उन्हें मालूम था कि सरदार पटेल के इस प्रस्ताव को महात्मा गांधी का आशीर्वाद प्राप्त हो चुका है। यह वास्तव में कांग्रेस के भीतर की दो दृष्टियों का द्वंद्व था।

भारतीय समाज के अपनी निष्ठाओं की ओर लौटने का अर्थ अन्य निष्ठाओं का निषेध नहीं है। भारतीय समाज की प्रकृति बहुमुखी बनी रहने की है और भारतीय सभ्यता समावेशी रही है।

एक दृष्टि वह थी जो सनातन धर्म को भारतीय सभ्यता का केंद्रीय तत्व मानती थी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन इसी दृष्टि से प्राप्त मान्यताओं के आधार पर लड़ा गया था। भारतीय सभ्यता की दृष्टि समावेशी है। इस्लाम की दृष्टि समावेशी नहीं है। फिर भी यह माना गया था कि भारतीय सभ्यता में इतनी शक्ति है कि वह मुस्लिम समाज को इस्लाम की असमावेशी दृष्टि छोड़ने के लिए राजी कर लेगी। जवाहर लाल नेहरू सनातन धर्म को भारतीय सभ्यता के केंद्रीय तत्व के रूप में नहीं देखते थे। उन्होंने भारतीय सभ्यता को मिश्रित संस्कृति के रूप में ढालने की कोशिश की, जिसमें सनातन धर्म, इस्लाम तथा अन्य सभी बराबर का प्रभाव रखते थे। यह आशा की गई कि उनके बीच सह अस्तित्व बना रहेगा। यह दृष्टि मूल रूप से अंग्रेजों ने दी थी। इस तरह की मिश्रित संस्कृति दुनिया में कहीं भी पनप नहीं पाई। यह भारत में भी नहीं पनपी। परिणाम यह हुआ कि दोनों तरफ के अतिवादी तत्वों ने अनवरत एक हिन्दू-मुस्लिम युद्ध जैसी स्थिति पैदा किए रखी। अंग्रेजी शासन के अनुकरण पर कांग्रेसी शासन ने भी अधिकाशत: अल्पसंख्यक समुदाय का पक्ष लिया इससे स्थिति और बिगड़ती गई। कांग्रेस पर जैसे- जैसे नेहरू परिवार का नियंत्रण बढ़ा गांधी काल में पैदा हुई दृष्टि को छोड़कर कांग्रेस नेहरू काल की दृष्टि को अंगीकार करती गई। उसे ही सेकुलर राजनीति का नाम दे दिया गया। भारतीय समाज में इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। बहुसंख्यक हिन्दू समाज पर दोहरी मार पड़ रही थी। एक तरफ आधुनिकता के नाम पर यूरोपीय विचार और जीवनशैली उसकी सभ्यतागत मान्यताओं पर दबाव पैदा कर रहे थे। दूसरी तरफ राजनैतिक स्तर पर की जाने वाली अल्पसंख्यक पक्षधरता उसको दबाव में डाल रही थी। इस सबकी जो भी प्रतिक्रिया हुई उसी ने आज की स्थति पैदा की है।

आज हिन्दू समाज में राजनीतिक शक्ति अपने हाथ में लेने का संकल्प दिखाई दे रहा है। लेकिन यह संतुलनकारी प्रयत्न ही है। भारतीय समाज के अपनी निष्ठाओं की ओर लौटने का अर्थ अन्य निष्ठाओं का निषेध नहीं है। भारतीय समाज की प्रकृति बहुमुखी बनी रहने की है और भारतीय सभ्यता समावेशी रही है। यह अकारण नहीं है कि इसराइल की संसद में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि भारत अकेला देश है कि जहां यहूदी बिना किसी असुरक्षा के शताब्दियों तक बने रहे। पर समावेशी होने का अर्थ आत्मनिषेध पूर्वक समावेशी होना नहीं होता। यह बात आज विवेकशील नेता और संगठन समझ रहे हैं। इसकी एक झलक शिया नेताओं के कथन में दिखाई देती है कि मुसलमानों को विवादग्रस्त अन्य महत्वपूर्ण स्थानों को भी छोड़ देना चाहिए और दोनों समुदायों के बीच सद्भाव पैदा करने की कोशिश की जाने चाहिए। मुसलमानों में पैदा हुई सकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। उनकी बाधा मुस्लमानों का अतिवादी वर्ग कम हिन्दुओं के विचारधारात्मक वर्ग अधिक हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि महात्मा गांधी के समय हिन्दू-मुस्लिम एकता की जो शुरुआत हुई थी उसे दृढ़ता से आगे बढ़ाया जाए।


 
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