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बिहार सरकार का साहसिक फैसला

03/09/2019

योगेश कुमार सोनी

बिहार सरकार ने बीते शुक्रवार को एक और साहसिक फैसला लेते हुए पान मसालों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। सरकार के इसी कार्यकाल में नीतीश कुमार ने शराब, दहेज के लेन-देन व प्लास्टिक को बैन किया था। इस फैसले के वजह की हकीकत जानकर आप दंग रह सकते हैं। दरअसल, कई दिनों से सरकार को कई नामी-गिरामी पान मसालों में जहर मिलाने की शिकायतें आ रही थी। सरकार ने गंभीरता दिखाते हुए स्वास्थ्य विभाग को जांच के आदेश दिए थे। जांच में पता चला कि बारह पान मसालों के लगभग बीस प्रोडक्ट में मैग्नीशियम कार्बोनेट पाया गया है। डॉक्टरों के अनुसार यह एक रसायनिक पदार्थ है, जिसे पान मसाले में नशे के साथ नमी से भी बचने के लिए मिलाया जाता है। यदि इसको 5-6 बार खा लिया जाए तो बार-बार इसकी तलब लगने लगती है। जिससे इसको खाने वाले इसके आदी बन जाते हैं। इसके सेवन से हृदयगति रुकने की आशंका भी बनती है। फिर भी, आम धारणा है कि चूंकि सरकारों को नशीले पदार्थों की बिक्री से सर्वाधिक राजस्व मिलता है। इसीलिए सरकारें नशीले पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाने से हिचकती हैं। बहुत हद तक यह सही भी है। ऐसे में नीतीश कुमार का यह फैसला निश्चित रूप से सराहनीय है। सरकार चाहे केंद्र की हो अथवा राज्य की, वह जनता के वोट से चुनी जाती है। इसलिए जनता का हित करना उसका ध्येय होना चाहिए। वह सरकार किस काम की, जो जनता का अहित करे? क्या ही अच्छा होता कि देशभर में नशीले पदार्थों की बिक्री और निर्माण पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता। जब नशीले पदार्थ बनेंगे ही नहीं, तो बिकेंगे कैसे? इससे देश में नशाखोरी की प्रवृति अपने आप समाप्त हो जाएगी। देश में नशाखोरी का सबसे ज्यादा चलन पंजाब में है। वहां रोज ही नशे के ओवरडोज से लोगों के मरने की खबर आती है। हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छतीसगढ़, झारखंड और बिहार की स्थिति भी चिंताजनक है। यूपी-बिहार में तम्बाकू का सेवन करने वाले सर्वाधिक हैं। शराबबंदी के बावजूद बिहार में शराब की लगातार बरामदगी चिंताजनक है। सरकार को इस पर सख्ती बरतने की जरूरत है।                 
नशीले पदार्थों से होने वाले नुकसान का जिक्र करें तो आज भी रोजाना हमारे देश के हजारों घर खराब हो रहे हैं। शराब, सिगरेट, पान मसाला, तम्बाकू और गुटखा के अलावा अन्य किसी भी तरह के नशीले पदार्थों की ब्रिकी में कमी नहीं देखी जाती क्योंकि इनके उपभोक्ताओं की संख्या कम आयु से प्रारंभ होने लगती है। देश में चाहे कोई चीज कहीं आसानी से मिले न मिले, लेकिन नशीले पदार्थों की दुकान हर 15-20 कदम की दूरी पर जरूर दिखाई दे जाती है। हालांकि बिहार सरकार ने जो वादा चुनाव के समय में किया था वो बेहद मजबूत तरीके से निभा रही है। वहां राजस्व वसूली में भी बहुत दिक्कत नहीं आई है। राज्य सरकार अन्य संसाधनों से उसकी भरपाई कर रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरे देश में शराबबंदी चाहते हैं। कई राज्यों में वह इसके लिए अभियान भी चलाते रहे हैं। नीतीश के इस मुहिम से बिहार में क्राइम के आंकड़ों में कमी आई है। पारिवारिक झगड़े कम हुए हैं। महिलाएं-बच्चे खुश हैं। 
हमारा देश युवाओं का देश माना जाता है। जरूरत इस तरह के फैसले पूरे देश में लेने की है। यदि घर में एक भी सदस्य नशे की गिरफ्त में आ जाए तो पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है। यदि परिवार का मुखिया अथवा कमाने वाला इसकी चपेट में आ जाता है तो घर में सभी सदस्यों का जीवन दूभर हो जाता है। महानगरों में अधिकतर लोग शराब और सिगरेट को स्टेटस सिंबल मानते हैं। गरीब तबका भी नशीले पदार्थों की गिरफ्त में है। वह अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा नशीले पदार्थों को खरीदने में खर्च कर देता है। वैसे तो, दुकानों पर लिखा होता है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे-बच्चियों को बीड़ी-सिगरेट नहीं मिलेगी। शराब की दुकानों पर भी नोटिस लगा होता है कि 25 वर्ष से कम के लोगों को शराब नहीं मिलेगी। लेकिन इसकी धज्जियां हर रोज उड़ती हैं। हमारे देश में कानून बनाना सरल है लेकिन उसको मानना या मनवाना दोनों ही बहुत कठिन है।
पिछले दिनों देश के बड़े डॉक्टरों के पैनल ने बताया था कि जो बच्चे कम आयु में नशे की लत में पड़ जाते हैं, उनको कैंसर या अन्य घातक बीमारी के अलावा माता-पिता बनने का सुख प्राप्त नहीं हो पाता। इसलिए नशे की रोकथाम के लिए सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी अपने परिवार और देश को संभाल सके। इसके अलावा स्वयं की इच्छाशक्ति को भी जगाना होगा। जरूरी नहीं कि शासन-प्रशासन के डर या उनके बनाए कानून के बाद ही सुधरा जाए। 
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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