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सियासी जमीन की तलाश में जदयू

28/08/2019

सियासी जमीन की तलाश में जदयू

 डॉ. शारदा वंदना

बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रही जदयू के सर्वेसर्वा अपने पड़ोसी झारखंड में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का निर्णय ले चुके हैं। अब तक का रिकॉर्ड बता रहा है कि राज्य में न तो उनका जनाधार है और न ही कोई कद्दावर नेता, तो किसके दम पर नीतीश कमर कस रहे हैं।

झारखंड में सभी सियासी पार्टियां चुनावी मोड में आ चुकी हैं। इसके साथ ही टिकट की चाह में नेताओं की भागदौड़ भी तेज हो गई है। विधायक बनने की आस में नेता पाला बदलकर भाजपा सहित अन्य दलों में शामिल हो रहे हैं। सूबे में सत्तारुढ़ भाजपा की स्थिति अभी काफी मजबूत दिखाई दे रही है। इसलिए नेताओं का रुझान भी जाहिर तौर पर सत्तारुढ़ दल की ओर है। विपक्षी दलों की तुलना में भाजपा की तैयारी ज्यादा तेज और व्यवस्थित है। इन सबके बीच पड़ोसी राज्य बिहार में भाजपा के साथ सरकार चला रहे जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने झारखंड में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। जदयू के इस फैसले को लेकर सियासी हलकों में खूब चर्चा हो रही है।
जदयू झारखंड में न सिर्फ अपनी जमीन तैयार करने की कोशिश में है, बल्कि अपना खोया रुतबा हासिल करने की जुगत में भी है। झारखंड में भाजपा की रघुवर दास सरकार के विरोध में झंडा बुलंद करते हुए जदयू सभी 81 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। पार्टी जम्मूकश्मीर, दिल्ली और हरियाणा के चुनाव में भी अपने कैंडिडेट खड़े करने जा रही है। पार्टी के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने झारखंड के नेताओं को टास्क देकर चुनावी तैयारी करने के निर्देश दिए हैं।

इन सब के बीच झारखंड जदयू के अध्यक्ष सालखन मुर्मू कहते हैं कि भाजपा के साथ सभी राज्यों में तालमेल नहीं है। उन्होंने भाजपा के साथ रिश्ते में खटास आने से भी इंकार किया। उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने पूरे बिहार को पिछले 15 साल में चमका दिया है। उनके राज्य का जीडीपी रेट पूरे देश में नंबर वन है। हालांकि सालखन मुर्मू इस बात से इनकार करते हैं कि ऐसा करने पर झारखंड की चुनावी जंग मोदी बनाम नीतीश की हो जायेगी। माना जा रहा है कि बाकी विपक्षी दलों के साथ जदयू यहां गैर आदिवासी सीएम का मुद्दा उठाने वाला है।
रघुवर दास को इसी मुद्दे पर लगातार निशाने पर लिया जा रहा है। हालांकि लोकसभा चुनाव में रघुवर दास की अगुवाई में ही भाजपा ने शानदार जीत हासिल की है। राज्य की 14 में से 12 सीटों पर कब्जा किया है। इसके साथ ही नगर निकाय के चुनाव में भी जीत को दोहराया गया। इसके बाद विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 81 में से 62 विधानसभा सीटों पर अपनी बढ़त बरकरार रखी। माना जा रहा है कि जदयू नीतीश के ब्रांड और उनके विकास के लोकप्रिय मॉडल के सहारे विधानसभा का किला फतह करने की तैयारी में है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी झारखंड में जातीय समीकरण को भी आधार बनाकर सीटों की पहचान में जुटी है।
पार्टी उन सीटों पर खास ध्यान दे रही है, जहां पर पूर्व में समता पार्टी का आधार रहा है। कुर्मी जाति बहुल इलाकों पर भी जोर लगाने का निर्देश नेताओं को दिया गया है।\ सियासी जानकार यह भी कहते हैं कि जदयू के चुनाव लड़ने से झारखंड की सियासत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। उनका मानना है कि जदयू का यहां कोई आधार नहीं है। यहां चुनाव लड़कर वे कुछ अपना प्रचार कर सकते हैं और दूसरी पार्टियों के वोट काट सकते हैं। झारखंड में लगातार अपना जनाधार खो चुके जदयू का यहां उभरना आसान नहीं है। यहां इनका कोई कद्दावर नेता भी नहीं हैं जो अपनी बदौलत पार्टी की जमीन पुख्ता कर सके।
पार्टी के विधायक रह चुके कई बड़े नेता जदयू को छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थाम चुके हैं। उन्हें वापस लाने के लिए न तो कोई कवायद हुई है और न ही भविष्य में इसके कोई आसार लग रहे हैं। 2009 में विधानसभा चुनाव जीतने वाले दो नेताओं में एक राजा पीटर पार्टी छोड़ चुके हैं। पार्टी छोड़ने से पहले राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपी थी, लेकिन वे गुटबाजी के शिकार हो गये। इससे पहले ही पूर्व मंत्री लालचंद महतो भाजपा, तो रामचंद्र केशरी झाविमो का दामन थाम चुके हैं। उल्लेखनीय है कि झारखंड गठन के बाद राज्य में 2005 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में जदयू को पांच सीटें मिली थी। यह संख्या 2009 में घट कर दो हो गयी। 2014 के विधानसभा चुनाव में तो जदयू का खाता भी नहीं खुला था।


 
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