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पंजाबः कोरोना से काले दिनों जैसी दहशत

20/03/2020

अमरीक
समूचे विश्व के साथ-साथ पंजाब भी कोरोना वायरस की दहशत की ज़द में है। दहशत का यह आलम पंजाबियों को 80 के दशक की याद दिला रहा है। तब आम लोग आतंकियों और पुलिस से बेतहाशा खौफजदा रहते थे और अब कोरोना वायरस से। जिंदगी तब भी थमी-थमी सी रहती थी और अब भी सबकुछ थमता जा रहा है। बाजारों से रौनक गायब है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं और अब तो बसें, टेंपू और ऑटो बंद करने के शासनादेश भी जारी हो चुके हैं। प्रशासनिक अमला हाई अलर्ट पर है। कोरोना वायरस से पंजाब में हुई एक मौत के बाद दहशत और ज्यादा गहरा गई है। चौतरफा अफरातफरी का आलम है।
80 और 90 के दशक के दौरान आतंकवाद की वजह से अक्सर कर्फ्यू लगता था। लोगबाग कर्फ्यू की आशंका के चलते या कर्फ्यू में ढील के दौरान खरीदारी करते थे। राशन, सब्जी और दवाई की दुकानों पर जबरदस्त भीड़ उमड़ आती थी। कई-कई दिनों के लिए सामान खरीद कर स्टोर कर लिया जाता था। ठीक वैसा ही मंजर आज दरपेश है। बेशक दहशत की वजह अलहदा है। पंजाब के किसी भी शहर, कस्बे या गांव चले जाइए। अजीब-सी भागदौड़ मिलेगी। कोई सामान खरीदने जा रहा है तो कोई खरीद कर ला रहा है। सब चीजों के दाम में इजाफा हो गया है। महामारी ने कालाबाजारी की नई बुनियाद रख दी है। दो हफ्ते पहले तक जिस मास्क को कोई पूछता नहीं था, वह अब चार गुणा ज्यादा कीमतों पर बिक रहा है। रातों-रात मास्क बनाने वाली कई तदर्थ फैक्ट्रियां खुल गई हैं। किराने की दुकानों पर भी मास्क बिक रहे हैं। कोरोना वायरस के नाम पर कई ऐसी दवाइयां भी राशन की दुकानों से बेची जा रही हैं जिनका इस महामारी से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। यहां एक कवि की ये पंक्तियां प्रासंगिक हैं, "आ दोस्त धंधा करें... अकाल पड़ा है चंदा करें...!"
आतंकवाद के दौर में भी कालाबाजारिए बेखौफ होकर लोगों को लूटते थे। कोरोना वायरस की इस दहशत में भी लूट रहे हैं। अफवाह माफिया इनकी सहायता के लिए खूब सक्रिय है। ठीक वैसे जैसे पंजाब के काले दौर में होता था। कोरोना वायरस ने शेष विश्व और देश की तरह पंजाब में भी बड़ा भयोत्पादक उद्योग पैदा कर दिया है जिससे जमकर मुनाफा हासिल किया जा रहा है। यह सब उतना ही मानवता और जिंदगी के खिलाफ है, जितना महामारी का प्रकोप। जबकि जरूरत है कोरोना वायरस के अतिरेक भरे डर के बीच मनुष्यता को और ज्यादा विवेकपूर्ण बनाने की, करने की। कई डॉक्टर और अस्पताल सामान्य बीमारियों की बखूबी जांच के बाद (पुष्टि के बावजूद) कि मरीज को दूर-दूर तक कोरोना नाम का वायरस नहीं है, अनाधिकार 'ऑब्जरवेशन' के नाम पर दाखिल करके लूट रहे हैं। बेवजह के टेस्ट भी करवाए जा रहे हैं। इस 'मेडिकल आतंक' से कौन और कैसे लड़ेगा? यक्ष प्रश्न है!
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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