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फिर नेताविहीन दिल्ली कांग्रेस

30/07/2019

फिर नेताविहीन दिल्ली कांग्रेस

 संजय वर्मा

दिल्ली में डेढ़ दशक तक कांग्रेस का चेहरा रहीं पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का निधन कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ महीनों बाद ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

कांग्रेस के बुरे दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे। कर्नाटक की सरकार चली गई और मध्य प्रदेश एवं राजस्थान की राज्य सरकारों पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। इन तमाम परेशानियों के बीच दिल्ली में डेढ़ दशक तक कांग्रेस का चेहरा रहीं पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का निधन कांग्रेस के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ महीनों बाद ही दिल्ली विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस को ऐसा कोई चेहरा नजर नहीं आ रहा जो शीला दीक्षित का स्थान ले सके और जिसके नेतृत्व में अगला विधान सभा चुनाव लड़ा जा सके। ऐसे में एक जमाने के अपने गढ़ दिल्ली में कांग्रेस अनाथ नजर आ रही है।
15 वर्षों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने 2015 के विधान सभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी के हाथों मिली पराजय के बाद खुद को प्रदेश की राजनीति से किनारे कर लिया था। उनके स्थान पर अजय माकन ने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला था लेकिन अपने कार्यकाल में वे कुछ विशेष नहीं कर पाए। उन्होंने लोकसभा चुनावों के कुछ महीने पहले स्वास्थ्य को कारण बताते हुए अध्यक्ष पद छोड़ दिया। तब पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए राजनीति से दूर रह रहीं 81 वर्षीय शीला दीक्षित को फिर से दिल्ली में कांग्रेस की बागडोर सौंप दी। हमेशा ही चुनौतियों का सामना करने वाली शीला दीक्षित ने एक बार फिर दिल्ली में कांग्रेस को खड़ा करने का बीड़ा उठा लिया।
उनके नेतृत्व में ही दिल्ली कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में भाजपा और आम आदमी पार्टी का मुकाबला किया। खुद शीला दीक्षित ने 81 वर्ष की आयु में भाजपा के युवा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के खिलाफ चुनाव लड़ने की चुनौती स्वीकार की। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस भले ही हार गई, लेकिन पार्टी तीसरे स्थान से उठकर दूसरे पर पहुंच गई। इसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही हो।
कांग्रेस को 21 फीसदी वोट मिले और दिल्ली की 7 में से 6 लोकसभा सीटों पर पार्टी के प्रत्याशियों को प्रदेश में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी से ज्यादा वोट मिले। इस तरह दिल्ली में मुख्य मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस रहा। इससे दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक बार फिर वापसी की आस जगी थी। यह लगभग तय था कि कांग्रेस 2020 में होने वाला अगला विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ेगा क्योंकि शीला दीक्षित ने अपने डेढ़ दशक के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रदेश में जो विकास कार्य किए थे उसके बूते ही कांग्रेस दिल्ली में बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद कर सकती थी। लेकिन अचानक 20 जुलाई की दोपहर में दिल का दौरा पड़ने से शीला दीक्षित का निधन हो गया और पार्टी को फिर से प्रदेश की राजनीति में तीसरे नंबर पर खिसक जाने का डर सताने लगा है। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आखिर शीला का उत्तराधिकारी कौन होगा। कांग्रेस के लिए यह चुनौती इसलिए भी काफी बड़ी है क्योंकि इस वक्त न सिर्फ कांग्रेस कमजोर हो चुकी है बल्कि गुटबाजी भी चरम पर है।
मौजूदा समय में दिल्ली में ऐसा कोई नेता नहीं है जो शीला के उत्तराधिकारी होने का दावा कर सके। फिलहाल दिल्ली कांग्रेस में अशोक वालिया, अजय माकन, राजकुमार चौहान, अरविंदर सिंह लवली, योगानंद शास्त्री, परवेज हाशमी और हारून यूसुफ जैसे नेता हैं। लेकिन शीला के जाने से कांग्रेस में जो खालीपन आया है उसे भरना इनमें से किसी भी नेता के लिए संभव प्रतीत नहीं होता। रोचक तथ्य यह है कि आज भले ही कोई नेता शीला दीक्षित का स्थान लेने को तैयार नहीं हो लेकिन जब शीला दीक्षित दिल्ली में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने से संबंधित निर्णय ले रही थीं तब इनमें से ही कई नेता उनके खिलाफ खड़े हो गए थे।
उनका कहना था कि शीला दीक्षित अब पहले की तरह सक्रिय नहीं रह गई हैं और जो अध्यक्ष खुद तीन लाख से अधिक मतों से लोकसभा चुनाव में पराजित हुआ हो वह पार्टी को फिर से कैसे खड़ा कर सकता है। जाहिर तौर पर ऐसा कोई युवा नेता ही कर सकता है जिसमें दिल्ली की सड़कों पर भाजपा और आप का विरोध करने का जज्बा हो। अध्यक्ष बनाए जाने के बाद शीला दीक्षित ने वह जज्बा नहीं दिखाया है और अब उन्हें किसी युवा नेता के लिए अध्यक्ष की कुर्सी खाली कर देनी चाहिए। राहुल गांधी को लिखे गए एक पत्र में दिल्ली मेट्रोपोलिटल काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष पुरुषोत्तम गोयल ने तो यहां तक लिख दिया था कि कांग्रेस को दिल्ली का अगला विधानसभा चुनाव कपिल सिब्बल या योगानंद शास्त्री जैसे नेताओं में से किसी एक को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर लड़ना चाहिए। उधर, शीला दीक्षित विरोधी खेमे में फिलहाल खामोशी है। इन दिनों दिल्ली कांग्रेस में सूत्रों के हवाले से यह खबर जोर-शोर से चर्चा में है कि अपने निधन से पूर्व शीला दीक्षित ने सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि अजय माकन के इशारे पर प्रदेश प्रभारी पीसी चाको ऐसे कदम उठा रहे हैं जिससे कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा।
उस पत्र में याद दिलाया गया था कि खुद शीला दीक्षित लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के खिलाफ थीं जबकि उनके विरोधी गठबंधन चाह रहे थे। गठबंधन को लेकर जो अनिश्चितता फैलाई गई उसके कारण ही कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम घोषित होने में देर हुई जिसका खामियाजा पार्टी को चुनावी हार के रूप में चुकाना पड़ा। कहा जा रहा है कि 18 जुलाई को सोनिया गांधी को यह पत्र लिखने के अगले दिन अर्थात 19 जुलाई को शीला दीक्षित की अहमद पटेल से मुलाकात भी हुई थी। यह पत्र भले ही सार्वजनिक नहीं किया गया हो लेकिन यह एक सच्चाई है कि पिछले लंबे समय से शीला दीक्षित और पीसी चाको के बीच के रिश्ते बेहद तल्ख थे। बहरहाल, विधान सभा चुनाव कुछ महीने ही दूर हैं लेकिन आंतरिक गुटबाजी की वजह से दिल्ली कांग्रेस में ऐसा कोई भी नेता नहीं है जिसके नाम पर सर्वसम्मति हो। शीला दीक्षित की एक बहुत बड़ी खासियत यह थी कि वे पंजाबी महिला होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की बहुजी भी थीं। दिल्ली के पंजाबी हमेशा से भाजपा समर्थक रहे हैं लेकिन जब शीला दीक्षित के हाथों में दिल्ली कांग्रेस की कमान थी तब पंजाबियों का एक तबका कांग्रेस की तरफ मुड़ा था।
शीला दीक्षित की वजह से ही दिल्ली के आधे से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में निर्णायक साबित होने वाले पूर्वांचल के मतदाता कांग्रेस के पीछे मजबूती से खड़े रहे थे और ऐसा माना जाता है कि लगातार तीन विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा कारण पूर्वांचल के वही मतदाता थे जो शीला दीक्षित को अपने क्षेत्र की नेता मानते थे। आम आदमी पार्टी की सफलता के पीछे भी पूर्वांचल के इन मतदाताओं का ही हाथ माना जाता है। लेकिन फिलहाल दिल्ली कांग्रेस में नेताओं की जो फौज है उसमें से किसी में भी मतदाताओं के इन वर्गों को कांग्रेस में वापस लाने का माद्दा नजर नहीं आता। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि केवल शीला दीक्षित उन्हें वापस ला सकती थीं। केंद्रीय स्तर पर कांग्रेस में जो अव्यवस्था है उसके कारण भी हालात बदतर हो रहे हैं।

शीला के जाने से कांग्रेस में जो खालीपन आया है उसे भरना किसी भी मौजूदा नेता के लिए संभव प्रतीत नहीं होता।

फिलहाल अध्यक्षविहीन कांग्रेस वैसा कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है जैसा निर्णय लेते हुए राहुल गांधी ने लोकसभा चुनावों के पहले शीला दीक्षित को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। नए प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदार तो अशोक वालिया, अजय माकन, राजकुमार चौहान, अरविंदर सिंह लवली, योगानंद शास्त्री, परवेज हाशमी और हारून यूसुफ जैसे कई नाम हैं, लेकिन उनमें से कोई भी ऐसा चेहरा नजर नहीं आता जो अगले विधान सभा चुनावों में भाजपा और आम आदमी पार्टी को टक्कर दे सके। ऐसे में फिलहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष की ही तरह दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का मामला भी अधर में लटकता प्रतीत होता है। जाहिर है अगर यही स्थिति रही तो पार्टी को इसका बहुत बड़ा खामियाजा अगले वर्ष के विधान सभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।



 
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