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पात्रों तक स्वास्थ्य योजनाएं नहीं पहुंचने के कारण

10/08/2019

रमेश ठाकुर
आधुनिक स्वास्थ्य योजनाएं जितनी जमीन पर दिखनी चाहिए, उतनी दिख नहीं रहीं। ऐसी खबरें यदा-कदा आती रहती हैं कि प्रशासनिक उदासीनता के चलते जनस्वास्थ्य योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता। केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ आज भी दूरदराज के जिलों में पात्रों तक नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के जिले पीलीभीत का सामने आया है जो हर जगह चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां चिकित्सकों ने टीबी पीड़ित मरीज को भर्ती करने की बजाय घर पर जिदंगी बिताने की सलाह दे दी। इस डर से उसे भर्ती नहीं किया कि दूसरे मरीजों में कहीं टीबी न फैल जाए। जबकि टीबी का इलाज फ्री में किया जाता है और उसके लिए बकायदा प्रत्येक सरकारी अस्पतालों में अलग वार्ड का प्रबंध है। बावजूद इसके चिकित्सक उदासीनता दिखा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी लोगों तक स्वास्थ्य योजनाएं पहुंचाने के लिए कमर कसी हुई है लेकिन उसके प्रयासों में चिकित्सक ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। रूचि इसलिए नहीं लेते क्योंकि सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले चिकित्सकों पर निजी प्रैक्टिस करने पर चाबुक चला दिया गया है। ऐसे डाॅक्टर इस वक्त अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। कुछ चिकित्सक जानबूझकर मरीजों का इलाज नहीं कर रहे। इसी कड़ी में पीलीभीत जिले के सरकारी अस्पताल के चिकित्यकों का घोर अमानवीय व्यवहार सामने आया है। डाॅक्टरों ने टीबी रोग से पीड़ित एक महिला से कहा कि तुम्हारे अस्पताल में भर्ती होने से दूसरों को भी टीबी होने का अंदेशा है इसलिए तुम घर जाओ, वहीं अपनी बची हुई जिंदगी गुजार लो। ऐसा प्रतीत होता है कि डाक्टरों की मानवता पूरी तरह से मर चुकी है।
पीलीभीत जिले के चिकित्सकों द्वारा किए गए अमानवीय कृत्य का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब ऐसा उस मरीज से कहा गया होगा तो क्या बीती होगी पीड़िता पर और उसने क्या महसूस किया होगा? चिकित्यकों की जिम्मेदारी मरीजों को अंतिम सांस तक बचाने की होती है लेकिन कलयुगी चिकित्सक शायद अब कर्तव्यनिष्ठ नहीं रहे। डाॅक्टरों के ऐसे व्यवहार को देखने के बाद सरकारों द्वारा जनस्वास्थ्य क्षेत्र में की जाने वाली तमाम घोषणाएं कागजी लगती हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार केंद्र सरकार की बहुयामी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत का समूचे प्रदेश में जोरों से प्रचार कर रही है लेकिन उसके अधिकारी इन प्रयासों में पलीता लगा रहे हैं। ऐसे मामलों पर सरकार को बिना देर किए तुरंत संज्ञान लेना चाहिए और दोषी अधिकारियों पर कठोरतम कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि दूसरे अधिकारी ऐसा करने से डरें।
पीलीभीत के पूरनपुर क्षेत्र की रहने वाली संबंधित महिला को करीब दो वर्षों से टीबी है। घर की माली हालत इतनी अच्छी नहीं है कि इलाज करा सके। स्वास्थ्य जब ज्यादा गिर गया तो इलाके के लोगों ने चंदा एकत्र कर सामाजिक संस्था नेकी की दीवार के जरिए अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन वहां भी महिला की परेशानियां कम नहीं हुई, किस्मत वहां भी दगा दे गई। अस्पताल से भगाए जाने के बाद पीड़िता के परिजन महिला को उत्तराखंड के हलद्वानी ले गए हैं। पीड़ित महिला के संबंध में जब सोशल मीडिया पर खबरें वायरल हुई तो कई लोग मदद के लिए सामने आए, पर जिला प्रशासन के किसी अधिकारी का दिल नहीं पसीजा।
आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डाॅ केके अग्रवाल कहते हैं कि चिकित्सकों के अमानवीय कृत्यों पर सरकारों को तुरंत एक्शन लेना चाहिए। ऐसे कृत्यों पर डीएम और चिकित्साधिकारी से आयुष्मान भारत योजना के तहत सरकार को जबाव मांगने चाहिए। जिससे पता चल सके कि आखिर इस योजना का लाभ पात्रों को क्यों नहीं मिला। मोदी सरकार ने स्वास्थ्य को लेकर देशभर में कई योजनाओं का श्रीगणेश किया हुआ है। लेकिन कुछ राज्यों में योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही दिख रही हैं। दरअसल सरकारों और नौकरशाहों के बीच इस वक्त बड़ी खाई खिंच चुकी है। नाकारा अधिकारी जिस तरह से किनारे लगाए जा रहे हैं उससे अधिकारी विशेषकर केंद्र सरकार से खुन्नस खाए बैठे हैं लेकिन इसका खामियाजा सिर्फ आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। हम बदलाव के कितने भी दावे क्यों न कर लें पर अभी भी सरकारी अस्पतालों के हाल ज्यादा ठीक नहीं हैं। सरकारी चिकित्सक आज भी अस्पतालों में कम, निजी अस्पतालों में ज्यादा समय देते हैं। दोनों तरफ से माल खाने की ऐसी आदत पड़ चुकी है, जो छूटने का नाम नहीं ले रही। लेकिन ऐसे चिकित्सकों पर केंद्र सरकार व मोदी की दृष्टि बनी हुई है। उनपर कब चाबुक उनपर चल जाए, किसी को नहीं पता।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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