युगवार्ता

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दरकते किले को बचाने की चुनौती

24/12/2019

दरकते किले को बचाने की चुनौती

विनय कुमार

हार से डरे हेमंत सोरेन दो सीटों दुमका और बरहेट विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। दुमका में उनके सामने हैविवेट उम्मीदवार के तौर पर कल्याण मंत्री लुइस मरांडी चट्टान की तरह खड़ी हैं।

झारखंड मुक्ति मोर्चा का अभेद्य किला संथाल परगना पिछले कुछ सालों में हिल सा गया है। पिछले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों में भाजपा ने झामुमो के सबसे बड़े कद्दावर नेता शिबू सोरेन और फिर हेमंत सोरेन को उनके पारंपरिक सीट दुमका से पटखनी दी। खिसकते और हिलते जनाधार के बीच इस बार महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष खुद दो सीटों से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। संथाल परगना जो हमेशा से झामुमो का गढ़ रहा है वहां पिछले चुनाव से सीख लेते हुए हेमंत सोरेन दो सीटों दुमका और बरहेट विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रहते हुए हेमंत सोरेन दुमका से चुनाव हार गए थे जबकि बरहेट की जीत ने उनकी लाज बचाई थी।
दुमका में भाजपा की लोईस मरांडी ने उन्हें पराजित किया था और रघुवर दास सरकार में कल्याण मंत्री का दायित्व पांच साल तक निभातीं रही। इस बार हेमंत सोरेन पिछली पराजय का बदला चुकाने के प्रयास में जुटे हैं। महागठबंधन के संयुक्त प्रत्याशी के रूप में हेमंत सोरेन मैदान में हैं। लेकिन इस चुनाव में झामुमो को कांग्रेस और राजद का कितना समर्थन मिलेगा यह समय बतायेगा। पिछले चुनाव में बरहेट की जनता ने हेमंत सोरेन को जिताया था इस कारण हेमंत विपक्ष के नेता बन पाये थे। आसन्न विधानसभा चुनाव में संताल परगना में भाजपा प्रत्याशी कल्याण मंत्री लोइस मरांडी,सारठ से कृषि मंत्री रणधीर सिंह, मधुपुर में राज पलिवार, राजमहल में निवर्तमान विधायक अनंत ओझा, महगामा में अशोक भगत, देवघर में नारायण दास और गोड्डा में अमित मंडल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। हेमंत सोरेन के अलावा लगातार छह बार निर्वाचित नलिन सोरेन, कद्दार नेता स्टीफन मरांडी, लोबिन हेम्बरम, साईमन मरांडी के पुत्र दिनेश विलियम मरांडी, रविन्द्र महतो अपनी प्रतिष्ठा बचाये रखने के लिए पसीना बहा रहे हैं।
जबकि कांग्रेस के कद्दावर नेता पाकुड़ में आलमगीर आलम जुझारू नेता जामताड़ा में इरफान अंसारी और जरमुंडी में मिस काल पर जनता की समस्या दूर करने का दावा कर जीतने वाले बादल पत्रलेख अपनी पार्टी की लाज बचाने की फिराक में हैं। इस बार संथाल परगना में राजग में शामिल लोजपा, जदयू और आजसू के साथ बागी प्रत्याशी ने भाजपा के समीकरण को बिगाड़ दिया है। जबकि झाविमो के स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने से उसके प्रत्याशी सारठ, शिकारीपाड़ा महेशपुर में झामुमो के लिए परेशानी उत्पन्न किये हुए हैं। आजसू और लोजपा ने भाजपा के चुनावी गणित को पूरी तरह गडमड कर दिया। हालांकि भाजपा संथाल परगना को झामुमो मुक्त बनाने के संकल्प को जमीन पर उतारने के लिए पूरी तैयारी से जुट गई है।
इन समीकरणों के बीच संताल परगना की अधिकांश सीटों पर भाजपा और झामुमो के बीच ही सीधा मुकाबला होने के आसार हैं, जबकि पोडैयाहाट और सारठ में झाविमो मजबूत दावेदार बन कर उभरने के प्रयास में है। संथाल परगना की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हेमंत सोरेन के दुमका और बरहेट समेत दो सीटों से चुनाव मैदान में उतरने से दुमका के आम मतदाता संशय में है। पिछले चुनाव में भाजपा की लोईस मरांडी से हारने के बाद से हेमंत सोरेन का क्षेत्र से लगभग पूरी तरह किनारा कर लेने से उनके दल के कई जुझारू पार्टी कार्यकर्ता दल छोड़ भाजपा में शामिल हो गए हैं। इससे फिलहाल दुमका में कल्याण मंत्री लोइस मरांडी को स्थानीय उम्मीदवार होने तथा विकास के कई उल्लेखनीय कार्यों को मुद्दा बनाकर भाजपा एक बार फिर जनता की सहानुभूति बटोरने के प्रयास में सफल होती दिख रही है। हालांकि कौन किस पर भारी पड़ा यह तो 23 दिसंबर को ही पता चलेगा जब ईवीएम अपना निर्णय सुनाएगा।



 
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