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लाल किला : तब और अब

11/08/2019

लाल किला : तब और अब

 सौरव राय

लाल किले का हर कोना इतिहास का अध्याय है। इसने मुगलकाल का स्वर्णिम दौर भी देखा है और आजादी की जंग भी। इसलिए इस विरासत को भावी पीढ़ी के लिए सहेजना हमारा कर्तव्य है। और इसका वीणा उठाया है एक विशेष योजना के जरिए मोदी सरकार ने।

17 वीं शताब्दी में शाहजहां ने बतौर बादशाह यह निर्णय लिया कि अब राजधानी आगरा नहीं दिल्ली होगी। फिर क्या बादशाह के आदेशानुसार उस स्थान की खोज के लिए निकल पड़े सैकड़ों घुड़सवार। काफी खोजबीन के बाद सन 1639 में, दिल्ली के केंद्र में स्थित चयनित स्थल की उस्ताद अहमद लाहौरी और उस्ताद हामिद ने भव्य किलेबंदी की और नाम दिया गया शाहजहांनाबाद। इसका निर्माण शहर के रूप में और बादशाह के रहने के लिए भी किया गया था। जिसका शुरुआती नाम किला- ए-मुबारक था। चूंकि यह किला लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है इसलिए बाद में यह लाल किला के रूप में अधिक जाना गया। लाल किला जो, अपनी स्थापना से लेकर मुगल काल के स्वर्णिम दौर का साक्षी भी रह है और क्रूरता के चरम से लेकर आजादी की जंग का गवाह भी। यमुना के किनारे बनाया गया यह किला 254.67 एकड़ में फैला हुआ है। 18 अप्रैल 1648 को यह पूरे भारत में शासन का केंद्र बना।
यही बात आक्रमणकारियों की आंखों में चुभने लगी और विदेशी आतातायी नादिरशाह ने सन 1739 में जमकर लूटा। कहा जाता है कि उस वक्त लाल किले में किले को छोड़ कर ऐसा कुछ भी नहीं था जिस पर रश्क किया जाए। बादशाह का तख़्त-ए ताउस सिंहासन और कोहिनूर दोनों अपने साथ ले गया। दूसरा ग्रहण जल्द ही लगा अहमद शाह अब्दाली के रूप में सन 1748- 61 तक एक निश्चित अंतराल पर शाहजहांनाबाद लुटता रहा। तीसरा और अंतिम ग्रहण 1857 में लगा। अंग्रेजों ने लाल किला से अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को बंदी बनाकर रंगून भेज दिया। इस तरह मध्य एशिया से आया मुगलिया शासन का अंत हुआ। अंग्रेजों ने किले में सैनिकों के रहने के ठिकाने बना दिए। जो किला कभी पूरे भारत का केंद्र था वह मात्र सैनिकों का बैरक बन कर रह गया था। लेकिन लाल किले के हिस्से में एक स्वर्णिम सफर की दास्तान थी जो पूरी हुई सन 1947 में भारत की आजादी के साथ। उसका सबसे पहला गवाह लाल किला था जहां पहली बार आजाद भारत का तिरंगा फहराया गया।

वर्तमान स्थिति
समय का कालखंड हर उस बड़ी और मजबूत नींव को भी जीर्ण बना देता है जो कभी मजबूती का पर्याय था। ऐसा ही कुछ है लाला किला के साथ। जिसके रखरखाव और जीर्णोद्धार पर 2014 के पहले कदाचित ही ध्यान दिया गया हो। साल 2014 में देश में सरकार बदली और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने एक कमेटी बनाई और देश के जितने भी पूंजीपति हैं उन्हें देश के बड़े ऐतिहासिक स्थलों को ‘अडॉप्ट अ हेरिटेज-अपनी धरोहर अपनी पहचान’ के तहत 2018 में सहेजने का जिम्मा दिया। लाल किला डालमियाग्रुप को टेंडर के तहत मिला। इसके साथ ही विरोध का एक स्वर अचानक से सोशल मीडिया में तैरने लगा। विपक्ष ने भी जमकर इस पर राजनीति की। इस राजनीति के बदौलत कुछ लोगों को यह भ्रम भी हुआ कि लालकिला डालमिया को बेंच दिया गया है। विरोध होना लजिमा है पर विरोध सकरात्मक और रचनात्मक होना चाहिए। लेकिन इस राजनीति से दूर केंद्र सरकार का वह निर्णय लाल किले के लिए किसी सौगात से कम नहीं है। आज अगर आप लाल किला को देखें तो समझ में आता है कि इसका समय से सहेजा जाना कितना जरूरी था। वहां स्थित छत्ता बाजार के ही एक दुकानदार से पूछा कि टेंडर से पहले का किला और अब के किला में क्या अंतर आया है? तो दुकानदार ने कहा कि पहले स्थिति ज्यादा खराब थी। तारों का जाल था। दीवारों और छत्तों की हालात एकदम खराब थी। देखरेख के नाम पर कुछ गार्ड होते थे। लेकिन प्रधानमंत्री ने जबसे इसे सहेजने का प्रस्ताव डालमिया ग्रुप को दिया है। तब से यहां बड़े पैमाने पर संरक्षण का काम चल रहा है। इनमें छत्ता बाजार की छतों की मुगलकालीन नक्काशी और दुकानों के गेट मेहराब की तरह करना शामिल है। इसके अलावा, खास महल और दीवान-एखास में भी संरक्षण का काम चल रहा है। कंपनी सीएसआर इनिशिएटिव यानी कॉपोर्रेट सामाजिक उत्तरदायित्व के जरिए इनका रखरखाव करने और पर्यटकों के लिए शौचालय, पीने का पानी, रोशनी की व्यवस्था करने की उचित व्यवस्था की है।

संग्रहालय
किले में पहले आर्कलॉजिकल विभाग का एक संग्रहालय था। जिसकी स्थिति भी दयनीय थी। लेकिन जबसे किले को संरक्षित करने का काम चल रहा है तब से इनकी स्थिति में काफी सुधर हुआ। बल्कि हम यह कह सकते हैं कि इनका पुनरुद्धार हुआ है। इस परिसर में कुल पांच संग्रहालय हैं। पहला द्रीशकला (भारतीय कला पर एक संग्रहालय) है। दूसरा याद-ए-जलियां, संग्रहालय जिसमें पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियांवाला बाग हत्याकांड के पूरे इतिहास और घटनाक्रम को दर्शाया गया है। इस संग्रहालय में आने वाले लोगों को साल 1919 में हुई उस दर्दनाक घटना की जीवंत रूप में तस्वीर देखने को मिलेगी। इस संग्रहालय में उन वीरों की गाथा और संघर्ष भी दर्शाया जाएगा, जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के दौरान अपने प्राण तक गंवा दिए थे। वहीं तीसरा संग्रहालय आजादी की पहली लड़ाई यानी 1857 से संबंधित है। इन संग्रहालय में टूरिस्टों को बेहरतीन अनुभव के लिए तस्वीरों, पेंटिग, अखबारों की क्लिपिंग, प्राचीन पब्लिक रिकॉर्ड्स, ऐनिमेशन और आॅडियो व वीडियो क्लिप के जरिए आजादी के संघर्ष और वीरों की गाथा दिखाई गयी है। चौथा संग्रहालय सुभाष चंद्र बोस और इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) संग्रहालय है। जिसमें नेताजी के जीवन और संघर्ष से जुड़ी कई चीजें हैं। इस संग्रहालय में नेताजी द्वारा इस्तेमाल की गई तलवार, कुर्सी के साथ ही आईएनए से जुड़े पदक, वर्दी, बैज और अन्य चीजों को भी देखा जा सकता है। आईएनए के खिलाफ जो मुकदमा दायर किया गया था उसकी सुनवाई लाल किले के परिसर में ही की गई थी।

प्रधानमंत्री ने जबसे इसे सहेजने का प्रस्ताव डालमिया ग्रुप को दिया है। तब से यहां बड़े पैमाने पर संरक्षण का काम चल रहा है।

पांचवा संग्रहालय जिसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया (एएसआई) द्वारा निर्मित किया गया है। देश के स्वतंत्रता संग्राम के बेशुमार नायकों को समर्पित ‘अजादी के दीवाने’ संग्रहालय है। इसमें उन सभी नायकों कि वीरगाथा है, जिन्होंने अपनी जान आजादी कि लड़ाई में गंवाई। हाल ही आर्कियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया (एएसआई) को खुदाई के दौरान एक और हमाम मिला है। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह शाही हमाम बादशाह के बच्चों के लिए बनया गया होगा। एएसआई के अनुसार खुदाई पूरी होने पर इसमें और सुधार किया जायेगा। जैसे ही काम पूरा होगा यह आम जनता के लिए जल्द ही खोल दिया जयेगा। लाल किले के अन्दर भी काम तेजी से चल रहा है दीवान-ए-खास, रंग महल, शाही महल और हमाम में काम चलने कि वजह से पर्यटकों को अन्दर जाने की मनाही है। लेकिन इन सब के बीच एक बात गौर करने वाली है कि लाल किले को देखने का टिकट पहले से काफी बढ़ा दिया गया है। इसका असर भारतीय पर्यटकों के साथ विदेशी पर्यटकों पर भी पड़ा है। जिसका नुकसान छत्ते बाजार के दुकानदारों को हो रहा है। वहीं के एक दुकानदार ने बताया कि काम चलने और टिकट का किराया बढ़ने की वजह से व्यापार पर असर पड़ा है। इन सबके बावजूद ये सभी दुकानदार इस आशा में भी हैं कि जितना काम प्रस्तावित है अगर पूरा हो गया तो पर्यटक भी आयेंगे और व्यापर भी अच्छा हो जायेगा। उस वक्त लाल किले कि शान ओ शौकत इतनी थी की किले के दीवाने-ए-खास में मशहूर सूफी संत और कवि अमीर खुसरो के खूबसूरत शब्द लिखे हैं। गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त, हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त अर्थात धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। यह स्वर्ग कितना और किस हालत में बचेगा यह तो भविष्य में छिपा है। लेकिन लाल किले में जीर्णोद्धार के कार्यों को देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि आने वाला कल इस किले की बेहतरी के लिए एक वरदान साबित होगा।


 
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