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चुनाव पर नक्सली हिंसा का भय

06/12/2019

चुनाव पर नक्सली हिंसा का भय

डॉ. शारदा वंदना

प्रशासनिक स्तर पर चुनाव के दौरान कोई अप्रिय वारदात न हो इसके लिए सभी एजेंसियां सतर्क हैं, केंद्रीय बलों को भी लगाया गया है।

झारखंड विधानसभा चुनाव को लेकर सूबे में सियासी दल पूरे दमखम से मैदान में उतर गए हैं। सभी दलों के स्टार प्रचारकों ने कमान संभाल ली है। पहले चरण के चुनाव के लिए पलामू प्रमंडल में कैंपेन वार चल रहा है। वहीं, पुलिस प्रशासन शांतिपूर्ण व निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए कमर कस चुका है। इन सब के बीच विधानसभा चुनाव पर नक्सली हिंसा का भय मंडरा रहा है। राज्य के नक्सल प्रभावित 19 जिलों में शांतिपूर्ण मतदान पुलिस- प्रशासन के लिए चुनौती है। इसकी एक बानगी प्रथम चरण के चुनाव के पूर्व ही लातेहार में नक्सलियों की धमक ने दे दी है। इस घटना में एक एएसआई सहित तीन जवान शहीद हो गए। इस वारदात ने खुफिया एजेंसियों की सक्रियता की पोल खोलकर रख दी है।

67 सीटें नक्सल प्रभावित
निर्वाचन आयोग ने झारखंड के 81 में से 67 विधानसभा सीटें नक्सल प्रभावित माना है। नक्सल प्रभावित और संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण ही राज्य के चुनावों को पांच चरणों में कराया जा रहा है। पहले चरण में 13 सीटों, दूसरे चरण में 20 सीटों, तीसरे चरण में 17 सीटों, चौथे चरण में 15 सीटों और आखिरी चरण में 16 सीटों पर चुनाव होंगे। विधानसभा चुनाव में इस चुनौती से निपटने के लिए पुलिस और चुनाव आयोग पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहे हैं। चुनाव निर्वाचन आयोग ने नक्सल प्रभावित इलाकों में मतदान के दौरान विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा था कि जिन इलाकों में वोटिंग होनी हैं, वहां के जिलाधिकारी (उपायुक्त) और पुलिस अधीक्षक मतदानकर्मियों को भेजने और लाने के लिए विशेष एहतियात बरतें। झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए केंद्रीय सशस्त्र बलों के अलावा झारखंड के सशस्त्र बलों की 137 कंपनियां तैनात की गई हैं। हर कंपनी को संभालने की जिम्मेदारी पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी को दी गई है।
इन बलों में 90 कंपनी अद्धसैनिक बल और 47 कंपनियां झारखंड पुलिस की हैं। विधानसभा चुनाव के पहले फेज के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चुनावी सभा के दौरान झारखंड में नक्सलवाद में कमी का दावा करते हुए कहा कि आने वाले सालों में राज्य से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया हो जायेगा। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जगतपाल नड्डा ने चुनावी सभा के दौरान कहा था कि झारखंड में नक्सलवाद के कारण लोगों का जीवन तबाह था, लेकिन पांच साल के कार्यकाल के दौरान रघुवर सरकार ने नक्सलवाद पर काफी हद तक अंकुश लगाया है। अब देर रात भी लोग घरों से निर्भिक होकर निकलते हैं। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बार-बार दोहराया है कि राज्य में नक्सल गतिविधियां अंतिम चरण में हैं।
उन्होंने कहा है कि नक्सलवाद की घटनाओं में भी काफी कमी आई है। इसकी पुष्टि आंकड़े भी करते हैं। 2014 के आसपास 397 नक्सली वारदात प्रतिवर्ष की घटनाएं दर्ज की जा रही थीं। 2019 में 119 घटनाएं दर्ज हुई हैं। इसी तरह 2014 तक 14 नक्सली प्रतिवर्ष सरेंडर किया करते थे जबकि 2014 से 2019 के बीच सरकार की नीतियों से प्रभावित होकर 28 नक्सलियों ने प्रतिवर्ष सरेंडर किया। अभी जो कुछ नक्सली वारदातें हुई हैं, उसे चुनाव के समय नक्सली अपने वजूद को दिखाने के लिए करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुठभेड़ के दौरान शहीद होने वाले पुलिसकर्मियों की संख्या में भी पिछले पांच वर्षों में भारी कमी आई है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान झारखंड में कोई बड़ी घटना नहीं हुई है, इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले पांच सालों में सरकार ने इस दिशा में जो ठोस काम किए हैं उसका असर दिखने लगा है। जानकारों की मानें तो चुनाव के दौरान नक्सली अक्सर अपने प्रभाव वाले इलाकों में वोटरों प्रभावित करने के लिए पुलिस को टारगेट करते हैं,ताकि अपनी मौजूदगी का अहसास करा सकें।
पहले चरण में 30 नवंबर को जिन छह जिलों के 13 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होना है, वे सर्वाधिक नक्सल प्रभावित हैं। ऐसे में सुरक्षाबलों के लिए प्रथम चरण का चुनाव सुरक्षा के लिहाज से सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। प्रथम चरण में लातेहार, चतरा, गढ़वा, लोहरदगा, गुमला और पलामू जिलों में मतदान होना है। झारखंड में प्रतिबंधित नक्सली संगठन चुनाव बहिष्कार के नारे को सफल करने के लिए किसी न किसी रूप से चुनाव को बाधित करते रहे हैं। ऐसे में नक्सली संगठनों की सक्रियता भी चुनाव के दौरान और बढ़ जाती है।



 
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