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ताकि दिल्ली का कोई दंगाई बच न सके

15/03/2020

आर.के.सिन्हा
दिल्ली में 1984 के बाद 2020 में फिर दंगे भड़के। दोनों दंगों में समानता यह रही कि दोनों सुनियोजित रहे। हालांकि 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की जघन्य हत्या के बाद भड़के दंगों को प्रतिशोध की भावना से सिख समुदाय को सबक सिखाने की दृष्टि से कांग्रेस के बड़े नेताओं ने आयोजित करवाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश भी की कि “जब कोई बरगद का विशाल वृक्ष (कहने का मतलब इंदिरा गाँधी ) गिरता है तो जमीन तो हिलती ही है।'' यानि तीन हज़ार से ज्यादा सिखों की नृशंस हत्या को जायज ठहराने की कोशिश की गई। पर,1984 के बाद 36 सालों के अंतराल के बाद दिल्ली ने फिर एकबार सांप्रदायिक दंगों को देखा। दंगों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ। तब से दिल्ली सहमी-सी है। जिस किसी ने भी दिल्ली में दंगे भड़काये या उनमें भाग लिया, उन्हें किसी भी हालत में छोड़ा नहीं जाना चाहिए। उनकी सही पहचान कर उन्हें कठोर दंड मिलना ही चाहिए। दंगों के कारण देश की उजली छवि पर अकारण दाग लगा दिया गया है।
दिल्ली दंगों पर संसद में हुई चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने यह भरोसा देकर सुकून दिया कि “दोषी चाहे किसी समुदाय या किसी भी पार्टी से जुड़े क्यों न हों, बख्शे नहीं जाएंगे।“ पुख्ता प्रमाण मिल रहे हैं कि दिल्ली में भड़के दंगे सुनियोजित साजिश का नतीजा था। वर्ना इतने बड़े पैमाने पर अचानक दंगे भड़क ही नहीं सकते थे। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिन भागों में दंगे भड़के वहां पर सब धर्मों के लोग मिलजुलकर लंबे समय से रह रहे थे। इस इलाकों में अधिकतर मेहनतकश लोग हैं। इनके सुख-दुख साझा थे। इनमें आपसी वैमनस्य दूर-दूर तक का नहीं था। पर अचानक से क्या हुआ कि इस सौहार्द के वातावरण को किसी की नजर लग गई। बेशक दंगों से एकबार दहल गई है दिल्ली। एक करोड़ सत्तर लाख की आबादी वाली दिल्ली में मात्र दस-बारह लाख की आबादी वाले बारह पुलिस थाने प्रभावित हुये, जिन्हें 36 घंटों में पूरी तरह नियंत्रित कर लिया गया। दंगों को दिल्ली के दूसरे भागों में फैलने न देना दिल्ली पुलिस की भारी सफलता ही मानी जायेगी।
यह अच्छी बात है कि दंगों के दौरान संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों की तेजी से पहचान की जा रही है। गृहमंत्री ने घोषणा की है कि दंगों के लिए जिम्मेदार लोगों की संपत्तियां जब्त की जाएगी। यह किया जाना जरूरी भी था। दंगा उकसाने और भड़काने वालों के ऊपर इतनी कसकर कार्रवाई हो कि आने वाले समय में, कोई भी दंगे में लिप्त होने या भड़काने से पहले दस बार सोच ले।
यह अफसोस की बात है कि अतीत की तरह दिल्ली पुलिस को ही कुछ सेक्यलुरवादी और विपक्ष के नेता दोष दे रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि दिल्ली पुलिस की काहिली के कारण दंगे तुरंत नहीं थमे। जरा इनसे पूछिए कि वे दिल्ली पुलिस कर्मी रतन लाल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा के कत्ल पर क्यों चुप हैं। अंकित शर्मा पर दंगाइयों ने बर्बरतापूर्वक अनेकों वार किए। यह सब सुनकर मानवता भी कांप जाती है। दिल्ली पुलिस के एक उपायुक्त, दो सहायक आयुक्त, पचासों पुलिस कर्मी घायल होकर अस्पताल में भर्ती है यह कैसे हुआ? अब दंगों का सच देश के सामने आ रहा है। दंगाग्रस्त इलाकों में सैकड़ों दंगाइयों की निरंकुश भीड़ दिल्ली पुलिस के कुछ जवानों पर ताबड़तोड़ तरीके से पथराव कर रही थी। वह वीडियो खूब वायरल हो रहा है। कहना न होगा कि उस पथराव में निहत्थे पुलिस वाले कैसे बुरी तरह घायल हो रहे है, यह इन बेशरम छद्म धर्म-निरपेक्षता वादियों को कैसे दिखेगा? क्या किसी ने उन घायल पुलिस वालों की भी कभी कोई खबर ली? क्या पुलिस वाले देश के नागरिक नहीं हैं?
निश्चित रूप से दिल्ली पुलिस को क्रेडिट जाता है कि उसकी मेहनत और मशक्कत के कारण दंगे दिल्ली के दूसरे हिस्से में नहीं फैले। याद करें कि 1984 को दिल्ली में ही नहीं देशभर में दंगे भड़के थे। दिल्ली पुलिस की कमियां निकालते रहिए पर कभी उसे उसका हक भी तो मिलना चाहिए। खासतौर पर तब जब उसने बेहतरीन काम करके दिखाया हो। जैसा कि इसबार के दंगों को काबू करने में। दिल्ली पुलिस पर बेवजह आरोप लगाने वाले न भूलें कि इसके जवान रोज-12 घंटे से अधिक कभी-कभी 16 घंटे लंबी ड्यूटी करते हैं।
बहरहाल, विपक्ष का तो काम ही रह गया है सरकार की मीनमेख निकालना। जब दिल्ली का एक भाग धू-धू करके जल रहा था, तब कोई भी विपक्ष का नेता मौके पर नहीं गया, ताकि दंगों को रूकवा सकें। जो सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका गांधी रामलीला मैदान में रैली आयोजित कर देश के एक खास वर्ग को सड़कों पर उतरने के लिए भड़का रहे थे, आर-पार की लडाई के लिए उकसा रहे थे, वे भी दंगे के समय कहीं नजर नहीं आ रहे थे। जब दिल्ली पुलिस ने दंगा रूकवा दिया तो राहुल गांधी पिकनिक मनाने के अदाज में दंगा प्रभावित इलाकों में घूमने के लिए चले गए। वहां भी वे एक जली मस्जिद को देखना नहीं भूले लेकिन पड़ोस में ही उन तमाम मंदिरों की तरफ रूख नहीं किया जिन्हें जलाया गया था, मूर्तियाँ तोड़ी गई थीं।
अब दंगों की 'सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण हो रहा है। दिल्ली के आम नागरिकों से भी अपील की गई है कि उनके पास जो भी फुटेज हो, उसे दिल्ली पुलिस को दे दें। यानी अब दंगाइयों के बचने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता होता। अब तो उन्हें पताल से भी निकाल लेगी पुलिस। दिल्ली पुलिस फेस आइडेंटिटी सॉफ्टवेयर के सहारे दंगाइयों को पकड़ रही है। याद रख लें कि यह सॉफ्टवेयर धर्म नहीं देखता है। लगभग एक हजार दंगाइयों की पहचान भी कर ली गई है। यानी दंगा सोची-समझी रणनीति का परिणाम था। देश की राजधानी को स्वाहा करने की कोशिश की गई थी ताकि दुनिया में भारत की बदनामी हो जाये और धर्मनिरपेक्षतावादी पीट सकें। इन दंगाइयों के कारण भारत की साख में इजाफा तो नहीं हुआ। मित्र देश ईरान तक ने दिल्ली दंगों पर भारत को ज्ञान देना शुरू कर दिया। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ सुनियोजित हिंसा की बात की है। उन्होंने कहा- ''भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ प्रायोजित हिंसा की ईरान निंदा करता है। सदियों से ईरान और भारत दोस्त रहे हैं। मैं भारत की सरकार से आग्रह करता हूं कि सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करे।'' अब उन्हें भी सीसीटीवी फुटेज भेज देने की जरूरत है। पाकिस्तान, इंडोनेशिया या तुर्की की तरफ से भारत के खिलाफ बयानबाजी हो तो समझ आता है। पाकिस्तान तो भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता ही रहता है। इंडोनेशिया और तुर्की भी भारत के खिलाफ धारा 370 और 35-ए को खत्म करने के बाद बोलने लगे। पर ईरान तो हमारा मित्र है। ईरान के दिमाग में भारत की छवि बिगाड़ने वाले दंगाई किसी भी सूरत में बख्शे तो नहीं जाने चाहिए। जिस दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी भारत यात्रा के दौरान दिल्ली में पहुंचे उस दिन यहां पर बलवा करवा दिया गया, अव्यवस्था और अराजकता फैला दी गई। ऐसी घोषणाएं भी दंगाई पहले से कर रहे थे। ट्रंप दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति हैं। वे भारत में दोनों देशों के आपसी संबंधों को मजबूती देने के सिलसिले में आए थे। उस दिन सुरक्षा बल उनकी यात्रा से जुड़े स्थलों पर थे। बस तब ही दिल्ली की एक घनी बस्ती में दंगे भड़का दिए गए। यह साजिश नहीं थी तो और क्या थी?
निश्चित रूप से सारा देश सरकार की तरफ देख रहा है कि वह कितनी तेजी से दंगों के गुनाहगारों को सजा दिलवाती है। दिल्ली दंगों से समूचा देश दहल गया है। दंगों के बाद से ही दिल्ली बुझी-बुझी सी दिख रही है। यकीन मानिए कि अभी यहां की जिंदगी सामान्य तो कतई नहीं हुई है। इस बीच रंगों का पर्व होली भी बिना किसी उत्साह के निकल गया। देश और दिल्ली तब सामान्य होगी जब दिल्ली के गुनाहगारों के साथ कायदे से न्याय होगा।
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)


 
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