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जेएनयू: आंदोलन सही, तरीका गलत

11/12/2019

जेएनयू: आंदोलन सही, तरीका गलत


त दो दशकों में विश्वविद्यालय के छात्रावास के शुल्क में पहली बढ़ोतरी के खिलाफ जेएनयू के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। शुल्क में यह वृद्धि छात्रावास के रखरखाव, मेस कर्मचारियों, रसोइयां और स्वच्छता सहित इंटरनेट की सुविधा के लिए है। यह ठीक है शिक्षा मूलभूत अधिकार है। ऐसे में शिक्षा तक पहुंच हर गरीब की होनी चाहिए। इसके लिए इस तरह प्रबंध करना होगा, जिसमें अत्याधिक फीस शिक्षा की सर्वसुलभता में बाधक न बने। इस तथ्य पर नजर डालें तो प्रथम दृष्टया छात्रों का विरोध प्रदर्शन जायज लगता है। लेकिन जब हम और आप प्रदर्शन के स्वरूप उनके नारों पर नजर डालेंगे, तो महसूस होगा कि यह विरोध फीस वृद्धि की आड़ में किसी और उद्देश्य के लिए है। अब बात करते हैं फीस वृद्धि के औचित्य को लेकर। वर्तमान में, जेएनयू में लगभग 7,500 छात्रों में से लगभग 5,600 छात्र छात्रावासों में रहते हैं।

सस्ती शिक्षा बिना बाधा के सर्वसुलभ हो, इसके लिए पूरे देश की सहानुभूति जेएनयू के साथ है। लेकिन छात्रों के नारों और विरोध प्रदर्शन के तरीके सवालों के घेरे में हैं।

कुल छात्र शक्ति में से, 5,371 यानी 71 फीसदी छात्रों कम से कम एक छात्रवृत्ति का लाभ उठा रहें हैं। यानी मुद्दा इतना गंभीर भी नहीं था। फिर क्यों छात्रों ने कुलपति सहित पूरे प्रशासनिक कार्यालयों की दीवारों को नारों से पाट दिया? स्वामी विवेकानंद की मूर्ति के पास अभद्र भाषा में भाजपा, संघ और जेएनयू प्रशासन के लिए अभद्र भाषा में नारे लिखे। इस कृत्य को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि जेएनयू प्रशासन व सरकार ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए। एक्जीक्यूटिव काउंसिल (ईसी) द्वारा 13 नवंबर, 2019 को हॉस्टल मैनुअल और छात्रावास फीस वृद्धि की मंजूरी के बाद जेएनयू प्रशासन द्वारा इस पर विचार करने के लिए उच्चस्तरीय कमेटी (एचएलसी) का गठन किया गया था। इस कमेटी ने अध्ययन कर 26 नवंबर को जेएनयू प्रशासन को रिपोर्ट सौंप दी और इस रिपोर्ट को जेएनयू ने मानने का ऐलान भी कर दिया। यह दूसरी बार है, जब प्रशासन ने फीस वृद्धि के बाद छात्रों को राहत देने का फैसला किया। इस बार प्रशासन ने सामान्य श्रेणी के छात्रों को भी राहत दी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से जारी किए गए बयान के मुताबिक अब छात्रों को सर्विस और यूटिलिटी शुल्क में 50 प्रतिशत छूट मिलेगी, वहीं बीपीएल श्रेणी के छात्रों को 75 प्रतिशत छूट मिलेगी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने बयान जारी कर साफ किया है कि समिति ने हॉस्टल की अनुमानित सर्विस और यूटिलिटी फीस की जांच की, जो 2000 रुपये प्रति माह (बिजली और पानी के 300 रुपये फीस सहित) है। उसे 1000 रुपये प्रति माह करने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा एचएलसी कमेटी ने बीपीएल श्रेणी के छात्रों को अतिरिक्त लाभ देते हुए उन्हें 75 प्रतिशत छूट दी है। विश्विद्यालय ने कहा है कि इसके साथ ही कमेटी ने पात्र बीपीएल छात्रों के लिए सर्विस और यूटिलिटी शुल्क में 75 प्रतिशत छूट दी, उन्हें अब 2000 की जगह मात्र 500 रुपये शुल्क देने होंगे। नई शुल्क दरें जनवरी 2020 से लागू होंगी। बढ़ी फीस वापस हो इस पक्ष में तो कैंपस के सभी छात्र एक मत हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जेएनयू इकाई अध्यक्ष दुर्गेश कुमार ने ‘यथावत’ से बातचीत करते हुए कहा कि विद्यार्थी परिषद का स्पष्ट मत हैं कि यहां किसी प्रकार की फीस वृद्धि न की जाए। हम अपना आंदोलन लोकतांत्रिक तरीके से कर रहे हैं।

हमारी मांग है कि हॉस्टल मैनुअल को जल्द से जल्द वापस लेने का ऐलान हो, ताकि कक्षाएं सुचारू रूप से शुरू हो सकें। कुमार ने कहा कि यहां एक महिला प्राध्यापक को वामपंथी संगठनों के छात्रों ने 30 घंटे से अधिक बंदी बनाया। बीमार प्रोफेसर के एंबुलेंस को रोका। इन संगठनों के लोग वार्डन के घरों में जाकर उन्हें परेशान किए। उन्हें डराया धमकाया। यह सब निंदनीय हैं। वहीं जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने साफ कहा कि जब तक पूरा हॉस्टल मैनुअल वापस नहीं लिया जाएगा, वो लोग विरोध प्रदर्शन करते रहेंगे। घोष ने साफ कहा है कि कैंपस में सिर्फ वन फीस स्ट्रक्चर ही रहेगा। जेएनयू के संगणकीय एवं समेकित विज्ञान संस्थान के शोध छात्र राम नयन का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वो छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए अधिक से अधिक प्रोत्साहित करे न कि फीस बढ़ा कर उनकी शिक्षा बाधित करे। यहां के शोध छात्र अब्दुल वासिद ने मीडिया पर नारजगी जताया। वासिद ने कहा मीडिया छात्रों की मूल समस्याओं पर संवेदनशील नहीं है।


 
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